कत्लगाह

Posted by Ruhi Rajput
February 9, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

अगर आज प्रेमचंद ज़िंदा होते तो ईदगाह कुछ यूं लिखते हामिद ज़ल्दी से ज़ल्दी घर पहुँचना चाहता था और दादी के हाथ में चिमटा थमाना चाहता था । वह तेज़ तेज़ क़दमों से घर की तरफ़ जा रहा था कि किसी ने पीछे से उसकी क़मीज़ पकड़कर उसे खींचा । “रुक साले, कहाँ भागा जा रहा है ।” हामिद ने देखा वे चार जने हैं जो उससे पूछताछ कर रहे हैं । “घर जा रहा हूँ ।” हामिद ने कहा । “और यह चिमटा कहाँ से चुरा कर लाया है ?” दूसरे ने कहा । “ख़रीद कर लाया हूँ मेले से ।” चौदह वर्षीय हामिद ने मायूस होकर कहा । “झूठ बोलता है । ज़रूर चुराकर लाया है तभी भाग रहा था ।” तीसरे ने यह कहते हुये हामिद के पेट पर लात से प्रहार किया । हामिद गिर गया । गिड़गिड़ाने लगा । रोने लगा । हाथ जोड़ने लगा । चोर है, चोर है सुनकर गली में भीड़ इकट्ठा हो गयी । कोई हामिद के बाल खींच रहा था कोई लात मार रहा था कोई मुक्के मार रहा था । हामिद उस धूल भरे रास्ते पर गिर गया । उसके मुँह से ख़ून बहने लगा । अचानक भीड़ में से किसी ने उसके हाथ में कसकर पकड़े गये चिमटे को छीन लिया और उसे धरती पर पड़े हुये गिड़गिड़ाते हुये हामिद के पेट में घुसेड़ दिया । ख़ून का फौव्वारा बह निकला और कुछ देर में हामिद ने वहीं धूल में पड़े हुये दम तोड़ दिया । रास्ते में हामिद की लहू-लुहान लाश पड़ी हुई थी । चिमटा अभी भी उसके पेट में घुसा हुआ था और भीड़ भारत माता की जय के नारे लगा रही थी । और उधर हामिद की दादी मीठी सिवइयां बनाकर हामिद के इन्तिज़ार में घर के बाहर बैठी हुई थी । #क़त्लगाह

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.