कनाडा के प्रधानमंत्री के राजनीतिक दौरे पर खालिस्तान एक मुद्दा क्यो बनाया गया?

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तारीख 19-फरवरी-2018, सुबह दफ्तर के लिए बहुत ज़्यादा लेट था, उस पर ट्रैफिक पुलिस ने एक जगह रोड ब्लॉक कर दिया था। कुछ राहगीरों से पूछने पर पता चला कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो, अहमदबाद की यात्रा पर हैं और महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में आने वाले हैं। मैं दूर खड़ा इस काफिले को देख रहा था और खुश भी था कि महात्मा गांधी के आश्रम में आना, एक तरह से अहिंसा को स्वीकृति देना ही है।
इसका एक और कारण ये भी था कि ट्रुडो की छवि एक बहुत सुलझे हुए और सहज नेता की है, जिन्हे कई बार सार्वजनिक जगह पर एक आम नागरिक की तरह घूमते हुए देखा गया है। उनका आम लोगों से हाथ मिलाते हुए और उनसे बात करते हुए देखा जाना काफी आम है। इस तरह लोगों के बीच घूमने का साहस वही नेता कर सकता है, जो लोकप्रिय होने के साथ-साथ इस आत्मविश्वास से भरा हो कि उसने अपने कार्यकाल में सभी फैसले जनता के हित में लिए हैं।
उस समय ट्रैफिक में फंसे होने के दौरान एक और बात ज़ेहन में आ रही थी कि ट्रुडो का ये राजनीतिक दौरा, भारतीय मीडिया की ज़ुबान पर क्यूं नहीं आ रहा है, लेकिन मुझे यकीन था कि कोई ना कोई मुद्दा तो ज़रूर उछाला जाएगा जिससे ट्रुडो का ये राजनीतिक सफर विवादों में घिर जाए। इसका एक और कारण पिछले साल कनाडा के रक्षा मंत्री सज्जन सिंह का भारत दौरा भी था। इस दौरे के दौरान जहां दिल्ली में प्रोटोकॉल के तहत सज्जन सिंह को राजकीय सत्कार दिया गया, वहीं पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सज्जन सिंह से इसलिये मिलने से मना कर दिया क्यूंकि उनके अनुसार वो खालिस्तानी विचारधारा से जुड़े हुए लोगों से सहानुभूति रखते हैं।
शायद ऐसा विवादित बयान पहले कभी भी, किसी भी भारतीय नेता ने किसी दूसरे देश के नेता के लिए नहीं दिया। यहां तक कि पाकिस्तान (जिसके साथ हमारे रिश्ते ज़्यादातर तल्ख ही रहते हैं), के नेताओं से भी भारतीय नेताओं का गले मिलना एक आम बात है और यह होना भी चाहिए। कनाडा के रक्षा मंत्री सज्जन सिंह के प्रति कैप्टेन अमरिंदर सिंह का यह रवैय्या जहां दोनों देशों के राजनीतिक रिश्तों पर चोट करता है वहीं यह सिख समुदाय को बांटने की एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश भी हो सकती है।
इस बार भी सज्जन सिंह, कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रुडो के साथ भारतीय दौरे पर आए हुए थे, तो खालिस्तान का मुद्दा उठना तय ही था। बस देखना ये था कि भारतीय मीडिया इसे कौन सी शक्ल देता है, एक-दो दिन में ही जसपाल अटवाल का नाम भारतीय मीडिया में उछाल दिया गया कि किस तरह कनाडा के प्रधानमंत्री के डिनर में मेहमानों की लिस्ट में, इनका नाम भी मौजूद था। लेकिन हमारा मीडिया अक्सर ये भूल जाता है कि खबर की ज़मीन कौन सी है?
सवाल तो ये होना चाहिए था कि जसपाल अटवाल को भारतीय वीजा कैसे दिया गया? क्यूंकि ये डिनर तो भारतीय ज़मीन पर ही हो रहा था। साथ ही अटवाल का नाम उस काली सूची में मौजूद क्यूं नहीं है, जिसके तहत कनाडा में मौजूद भारतीय कॉउंसिल भारत का वीजा देने से मना कर देती है? मेरा इशारा उस काली सूची की तरफ है, जिसके तहत कनाडा के भारतीय प्रवासियों को भारतीय काउंसिल खालिस्तानी के रूप में देखता है।
व्यक्तिगत रूप से, जसपाल अटवाल का मुद्दा व्यक्तिगत रूप से मेरे लिये हास्यपद था, एक पंजाबी जिसके बाल कटे है, सिख पगडी भी लिबाज़ में मौजूद नही है वह किस तरह खालिस्तानी हो सकता है?  जब से 1984 के ब्लू स्टार आपरेशन, 1984 के भारत सिख दंगे, ओर फिर सिख नोजवान ओर पंजाब पुलिस के बीच चला खूनी एनकाउंटर, जंहा अक्सर एक सिख ही मारा जाता था, इस काले दौर के 1977 से लेकर 1994 तक के वक़्त को समझे तो, भारतीय मीडिया का भी रोल बहुत ही पक्ष पूर्ण रहा है, खासकर सिख ओर पंजाब के खिलाफ, मीडिया के इस रुख से अक्सर सिख जानकार, भारतीय मीडिया में हिंदु उच्च जाति के काबिज होने को भी एक महत्वपूर्ण कारण मानते है. सिख जानकारों का ये अक्सर कहना है कि सिख धार्मिक गुरबाणी ब्राह्मणवाद,मनुवाद,ओर जात पात के मुद्दों को नकारने के साथ साथ बहुत तीखा प्रहार करती है, यही कारण है की ब्राह्मणवाद से लिप्त हमारा मीडिया, अक्सर खालिस्तान के मुद्दे पर बहुत जोर शोर से चर्चा करता है लेकिन 1984 के दंगे, ब्लू स्टार आपरेशन, एनकाउंटर पर अक्सर चुप रहता है, आजाद भारत में, सिर्फ दो जगह धार्मिक स्थानों को नुकशान पहुचाया गया है 1984 में भारत सरकार द्वारा अमृतसर स्थित गरूद्वारा श्री हरमंदिर साहिब ओर 1992 में गैर सरकारी संगठनों द्वारा बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करना, जंहा सरकार चुप चाप खड़ी तमाशा देख रही थी, भारतीय मीडिया, खासकर हिंदी मीडिया इन दोनों घटनाओ पर, लीपापोती के सिवा कोई गंभीर चर्चा नही छेड़ता. क्यो ?
खेर, जसपाल अटवाल के साथ साथ अगर सोचे कि क्यो कनाडा के प्रधानमंत्री को निशाना बनाया गया तो इसके कई हालात नजर आते है, उनमे से सबसे ज्यादा 2017 के पंजाब विधानसभा चुनावों में कनाडा के पंजाबी प्रवासियों का बढ़ चढ़ कर आम आदमी पार्टी को समर्थन देना, जंहा वोट से ज्यादा आप आदमी पार्टी को चंदा दिया गया, आज की तारीख़ में आम आदमी पार्टी का उभरना कही ना कहीं भारतीय राजनीति में मौजूद दोनों बड़े दल कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिये सर दर्दी है, वही अगर गोर किया जाये तो कनाडा के प्रधानमंत्री की मुलाकात के दौरान कैप्टेन अमरिंदर सिंह के माथे पर मौजूद लाल गोल टिका, जंहा ये हिंदु धर्म की मौजूदगी का एहसास करवाता है वही पंजाब में मोजूद हिंदू वोटर्स को अपनी ओर आकर्षित करने का, एक छुपा हुआ चिन्ह भी है और खालिस्तान के नाम पर हिंदू वोटर को डराने का एक जरिया भी है.
कनाडा के प्रधानमंत्री के राजनीतिक दौरे के दौरान, जसपाल अटवाल का मुद्दा ही उछालना, कही ना कही उस राजनीति का हिस्सा है जंहा हिंदू मुसलमान, ब्राह्मण और दलित के नाम पर लोगो को डराकर , असुरक्षा की भावना पैदा कर,बस वोट लेने का एक जरिया है जंहा हम अक्सर अपने मूलभूत मुद्दों से भटक जाते है, व्यक्तिगत रूप से, जंहा तक मैं जानता हूँ खालिस्तान कभी वास्तविक में मुद्दा था ही नही, ये हिंदी मेडिया ओर राजनीतिक विचारधारा जो समाज को बाटती है उसी की उपज है, ओर निशाना पंजाब के हिंदू वोटर को अपनी ओर आकर्षित करना है. अब, आप थोड़ा गूगल कीजियेगा की कनाडा के प्रधानमंत्री के राजनीतिक दौरे के समय, पंजाब में कोंन से चुनाव होने जा रहे थे, शायद फिर हम सारे घटनाक्रम को ओर बेहतर समझ पाये. लेकिन भारतीय मीडिया, खासकर हिंदी मीडिया से मुझे व्यक्तिगत शिकायत जरूर रहेगी, की आप खालिस्तान के मुद्दे पर भी सकरात्मक बहस कीजिये लेकिन 1984 का आपरेशन ब्लू स्टार, 1984 का  सिख कत्लेआम, सिख एनकाउन्टर को आप मुद्दा क्यो नही बनाते ? आप क्यो इन सभी मुद्दों पर सकरात्मक बहस नही करते ? आप क्यो पंजाब में मौजूद नशे पर बात नही करते ? इन सभी मुद्दों का भारतीय मीडिया से नदारद होना कही ना कही भारतीय मीडिया के आजाद होने पर सवाल तो जरूर खड़ा करता है साथ ही साथ एक सिख छवि में भारतीय नागरिक होने की मेरी आजादी,जिसे भारत का सविधान मुझे देता है, उस स्थिति को भी ओर दयनीय बना देता है. खासकर जब 33 साल के बाद भी सिख समाज और सिख पीड़ित, 1984 के दंगों में इंसाफ होता हुये नही देख रहे.

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