भूख के बदले मौत देने वाले लोकतंत्र को एक दवा चाहिए जिससे गरीबों को भूख ना लगे

Posted by Rajeev Choudhary in Hindi
February 27, 2018

किसी ने कहा है, उसने रोटी चुराई तो वो चोर हो गया, साहब लोग मुल्क खा गए कानून लिखते-लिखते। बहराल केरल में खाने-पीने की चीज़ें चुराने वाले एक चोर मधु की भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी।

हत्या के बाद मधु की माँ ने कहा है कि अगर उनका बेटा जंगल में ही रह रहा होता तो उसकी जान इस तरह नहीं जाती। कहा जा रहा है उनकी यह बात उन लोगों के मुंह पर ज़ोरदार तमाचे की तरह है जो गरीबों-आदिवासियों को नीची नज़र से देखकर तथाकथित विकास की तारीफ के पुल बांधते रहते हैं।

ये शर्मनाक कांड उस देश में हुआ जहां किसी नेता के ऊपर मात्र स्याही डालने या गाड़ी पर कोई पत्थर लगने से लोकतंत्र की हत्या हो जाती है। मुझे नहीं पता ये लोकतंत्र की हत्या है या उसे जीवेम शरदः शतम्  का आशीर्वाद? पर यह सत्य है करने वाले यदि हत्या ही करना चाहते थे तो दो रोटी देकर मधु की भूख की हत्या भी कर सकते थे पर हमेशा के लिए एक भूखे की हत्या कर दी गई।

पर क्या इससे गरीब भूख भी खत्म हो गयी? वो आज भी समाज के सामने मुंह खोले खड़ी है कि काश एक दिन मेरी भी हत्या हो और मैं हमेशा के लिए इस देश से मुक्ति पा जाऊं।

कहा जा रहा है मधु पर 2016 में चोरी करने के आरोप में केस दर्ज था। वह अक्सर चावल तथा खाने-पीने की अन्य चीज़ों की चोरी आस-पास की दुकानों से करता रहता था। लेकिन इस बार कुछ लोगों के समूह ने पास के जंगल से मधु को पकड़ लिया और उसको बांधकर इस कंक्रीट के जंगल की सड़कों पर बुरी तरह से पीटा और एक इंसान की भूख को हमेशा के लिए सुला दिया।

आज उन लोगों को सोचना होगा जो भागवत कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण के माखन चुराने की कथा को भक्ति में लीन होकर ओत-प्रोत ह्रदय से बखान करते हैं कि थोड़े से चावल चुराने पर पीट-पीटकर यदि आज किसी की हत्या कर दी जाती है तो मान लो यदि कोई घी मक्खन चुराए तो उसका क्या हाल होगा?

मधु की माँ दुखी है अफसोस भी कर रही होगी कि बेटे को एक माँ की ममता तो परोस सकी पर गरीबी के चलते दो रोटी न परोस सकी। बताया जा रहा है मरने वाला मधु अट्टपड़ि मानसिक बिमारी से जूझ रहा था।

जो लोग मधु के हत्यारों को लेकर किसी विशेष समुदाय को दोषी ठहरा रहे हैं उन्हें भी सोचना चाहिए कि बात हत्यारे उबैद, हुसैन और अब्दुल करीम की नहीं बात एक मानसिकता की है जो सुर में सुर मिलाकर कभी गाय के लिए तो कभी रोटी के लिए देश में हिंसा को अंजाम तक पहुंचा रही है।

मुझे उम्मीद है अब “नॉट इन माय नेम” वाले एक बार फिर पहलू खान की हत्या की तरह मधु की हत्या पर भी जंतर-मंतर पर आकर प्रदर्शन करेंगे। अवॉर्ड वापिस करने वाले भी इस पर कोई छुट-मुट तमगा वापिस करेंगे?

शायद ही इस पर कोई राजनीतिक दल या बुद्धिजीवी ज़ुबान खोले, क्योंकि मामला भूख से जुड़ा है और यहां राजनीति के शास्त्र में भूख कोई मुद्दा नहीं माना जाता, क्योंकि अभी राष्ट्रोदय कार्यक्रम चल रहा है, राष्ट्र रक्षा यज्ञ के लिए मिट्टी ढोई जा रही है और वैलेंटाइन के विरोध में लाठियों को तेल पिलाया जा रहा है।

लेकिन उन नेताओं को इस पर ज़रुर सोचना चाहिए! जो अखलाक के घर लाखों के चेक लेकर गये थे, रोहित वेमुला की माँ को सात्वना प्रकट करने गये थे, जो पहलू खान के परिवार के लिए मोटी सहायता राशि की मांग करते हैं शायद उनका यह मानवीय फर्ज़ बनता है कि एक-दो किलो चावल उस आदिवासी माँ के सामने भी रखे, जिसने दो रोटी की भूख के लिए अपना बेटा खोया है। इस मामले में सरकार और विपक्ष को लगातार अपने आप से सवाल करने होंगे।

केवल सरकार ही नहीं आम नागरिकों को भी सवाल करना होगा कि बिन आधार कार्ड के झारखंड के सिमडेगा ज़िले में भूख से 11 साल की लड़की की मौत हो जाना, केरल के पलक्कड़ में थोड़े से चावल के लिए मधु की हत्या हो जाना, उड़ीसा के कालाहांडी में भूख से लगातार मौत की खबरें आना, उत्तर प्रदेश के देवरिया के लार कस्बे के पशुपति राजभर के दो मासूमों की भूख से मौत होना यह दर्शाता है कि समस्या क्षेत्रीय नहीं बल्कि राष्ट्रीय है।

किसी अखबार के भरोसे मत बैठिये, वो जापानी तेल और मर्दानगी की दवा बेच रहे हैं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सहारा भी छोड़ दीजिये, वह कटरीना की दिलकश आदाएं, तैमुर का बर्थडे गिफ्ट, रणवीर सिंह का नया लुक, कोहली-पंड्या के चर्चे और नेताओं की विवादित बयानबाज़ी से आगे इस भूख से मरते गरीब तक आपको नहीं ले जाएगी।

सरकार को देखना चाहिए कि नये भारत के निर्माण और विदेशी कंपनियों के बढ़ते भारत के आंकड़ों पर कहीं यह भूख तमाचा तो नहीं जड़ रही है। देश के कर्णधारों को आनंद की अनुभूति से बाहर आकर इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हाथ-पैर मारने की ज़रूरत है।

बड़े शहरों में वैभवपूर्ण जीवन जीने वालों के लिए रोटी और पानी की क्या कीमत होगी नहीं जानता लेकिन जब भी कोई डॉक्टर के पास अपने बच्चे को भूख बढ़ाने की दवा दिलाने जाये तो डॉक्टर से ज़रूर पूछियेगा कि गरीब लोगों की भूख कम करने की दवा कब तक बाज़ार में आ जाएगी ताकि उसे बेमौत मरना न पड़े …….

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