कैंसर की बीमारी के पूंजीवादी कनेक्शन का सच दिखाती है फिल्म ‘इरादा’

Posted by Uday Che in Art, Hindi, Society
February 28, 2018

जर्मन दार्शनिक एंगेल्स ने कहा था, “किसी लेखक को अगर मारना है तो उसकी रचना पर चर्चा बन्द कर दो, एक चुप्पी बना लो। उसके पक्ष या विपक्ष में कोई चर्चा ही न करो, लेखक और उसका लिखा सब मर जायेगा।” उस दौर में एंगेल्स के साथ पूंजीवादी लेखकों ने यही तरीका अपनाया था। फरवरी 2017 में आई फिल्म ‘इरादा’ एक बेहतरीन फिल्म है, इस फिल्म के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

फिल्म ‘इरादा’ कैंसर और कैंसर होने के कारण पर बनाई गई है। कैंसर के इस खेल में किस-किस को फायदा है, फिल्म में इसे बखूबी दिखाया गया है।

फिल्म ने जो मुद्दा उठाया उस पर चर्चा आज के वक्त की ज़रूरत है। लेकिन वक्त और चर्चा दोनों पर उन्हीं लोगों का कब्ज़ा है जिनके मुनाफे के कारण कैंसर आज एक महामारी का रूप ले चुका है।

केमिकल फैक्ट्रियों के कचरे को ज़मीन में रिवर्स बोरिंग के ज़रिये पहुंचाने के कारण ज़मीन के अन्दर का पानी ज़हरीला हो रहा है। यह ज़हर पीने के पानी और फसलों के माध्यम से हमारे अंदर तक पहुंच रहा है, जो कैंसर का एक बड़ा कारण है। लेकिन आम इंसान के दिमाग में पूंजीपतियों ने प्रचार के माध्यम से बिठा दिया कि कैंसर धूम्रपान और तम्बाकू से होता है। निश्चित रूप से कैंसर, धूम्रपान ओर तम्बाकू से भी होता है, लेकिन केमिकल कचरे से भूमिगत जल का दूषित होना, कैंसर को महामारी बना रहा है।

पूंजीपतियों की मुनाफे की चाहत ने ज़मीन के पानी को ज़हर बना दिया, इसका विरोध न हो इसलिए ये चुप्पी बनाई गई। आप धूम्रपान ओर तम्बाकू छोड़ सकते हैं, ये आपके हाथ मे है लेकिन आप पानी पीना कैसे छोड़ सकते हैं? ये तो आपकी ज़िन्दा रहने की ज़रूरत है!

मैंने 2 दिन पहले ही फिल्म ‘इरादा’ देखी। जैसे-जैसे फिल्म देख रहा था वैसे-वैसे देश की भयंकर सच्चाई डरा रही थी। हम एक ऐसी जगह रह रहे हैं जहां रोज़ाना कोई ना कोई इस कैंसर की चपेट में आकर तड़प-तड़पकर मर रहा है और उसको एक पूरा संगठित गिरोह लूट भी रहा है। खून बेचने वालों से लेकर कीमोथेरैपी, इंशोरेंस और पानी बेचने वालों का एक बहुत बड़ा स्कैम है इसके पीछे।

पानी किसी भी इंसान की ज़िंदगी में सबसे ज़रूरी पेय पदार्थ है, अब वो ही उसके लिए ज़हर बनता जा रहा है। कोई अगर इस ज़हर पर रिसर्च करता भी है तो लुटेरे पूंजीपति उसको शांत करवा (या मरवा) देते हैं। जिसने इस ज़हर को पैदा किया और जिसकी इस ज़हर के कारण दुकानदारी चल रही है, वो सब इसके खिलाफ बोलने वालों का मुंह बंद कर देते हैं।

कॉर्पोरेट के हाथों बिक चुका मीडिया प्रचार करता है, ‘यहां का पानी पीने से आप नहीं बच सकते। सेफ रहो, अलर्ट रहो, साफ पानी पियो।’ मतलब कि RO लगवाओ, बोतलबंद पानी खरीदो। ज़मीन या नदियों के पानी से ये ज़हर खत्म हो इस पर कोई चर्चा नहीं होती।

फिल्म ‘इरादा’ में लुटेरा पूंजीपति, खोजी ईमानदार पत्रकार को मारने से पहले कहता है – “रिवर्स बोरिंग किस चिड़िया का नाम है, ये कोई नहीं जानता।अमोनियम नाइट्रेट और क्रोमियम केमिकल, ये ज़हरीले हैं, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है। इंजेक्शन लगाकर सब बेहोशी में जिए जा रहे हैं। शनिवार-रविवार को बीवी के साथ डिनर, गर्लफ्रेंड के साथ डिस्को बस यही ज़िंदगी है। इस ज़हर की उनको आदत सी पड़ गई है, इसलिए मेरा बिजनेस सही है। क्यूंकि कोई मेरे बिजनेस पर सवाल नहीं उठाता।”

वैसे पूंजीपति ठीक ही कह रहा है, आज ये ही तो हालात हैं। पंजाब के कई इलाकों में घर-घर से कैंसर के कारण मौत हो चुकी हैं, लेकिन क्या आपने कभी इसके प्रति विरोध के स्वर सुने? सुनेंगे भी नहीं।

कभी पंजाब की धरती क्रांति और क्रांतिकारियों को पैदा करती थी लेकिन आज हालात क्या हैं? रोज़ाना इस बीमारी की चपेट में आकर लोग मरते हैं, लेकिन पंजाब का आवाम पूंजीवाद के नशे में चूर है। 

क्योकि पूंजीवाद ने आपकी नशों में बड़े शातिराना तरीके से अपने नशे को पहुंचा दिया है।

पिछले 20 साल में 3 लाख किसान आत्महत्या कर गए जिसका हम जगह-जगह पर जिक्र करते हैं, लेकिन पिछले 20 साल में कैंसर से भी लाखों लोग मर गए और इसका कोई सर्वे नहीं, कोई जिक्र नहीं, कोई लड़ाई नहीं!

कुछ सालों में कैंसर के मरीज़ों को नज़दीक से देखा है। कैंसर के कारण होने वाला असहनीय दर्द, गरीब परिवारों में रुपयों के अभाव और बेबसी। कैसे धीरे-धीरे घर से इंसान भी जाता है और उसके साथ ज़मीन, रुपये, गहने सब कुछ चला जाता है। ईमानदारी से कैंसर से मरने वालों का सर्वे करवाया जाए तो एक बहुत बड़ी भयानक सच्चाई सामने आ सकती है।

बहुत पहले कहानियों में सुनते थे कि एक बार किसी इलाके में एक जिन्न आ गया। वो गांव से दूर जंगल या पहाड़ में रहता था और आस-पास के गांव वालों से हर रोज़ एक इंसान को खाने के लिए लेता था। उसके साथ मे भेड़, बकरी, गाय, फल जैसे और भी बहुत से सामान भेजे जाते थे। फिर एक दिन उस गांव में एक इंसान आता है जो उस जिन्न को मारकर वहां के लोगों को बचाता है।

ये कहानी बहुत जगह सुनी है, फिल्मों में भी है और महाभारत में भी ऐसी ही एक कहानी का ज़िक्र मिलता है। लेकिन सवाल ये है कि उस जिन्न को किसने पैदा किया? इसका जवाब उन कहानियों में भी नहीं है।

ये कैंसर का जिन्न भी कुछ ऐसा ही है जो हर रोज़ इंसानों और मवेशियों की बलि ले रहा है। इसको किसने पैदा किया ये ज़रूर हमें मालूम है।

पूंजीपति की पूंजी कमाने की हवस ने ही इस जिन्न को पैदा किया है। इस हवस पर लगाम लगाने की ज़िम्मेदारी हमने जिनको सौंपी वो नेता, पुलिस, नौकरशाह, मीडिया और कानून सभी इस लूट के हिस्सेदार बने बैठे हैं।

कुछ दिन पहले एक मित्र से लड़ने के तरीकों पर चर्चा चल रही थी कि इस कैंसर वाले मसले पर कैसे लड़ा जाए। क्योंकि ये मामला बहुत बड़ा है, 1 गांव या 10 गांव मिलकर भी इस लड़ाई को जीत नहीं सकते। मेरा दोस्त भी उन्हीं गांवों में से एक से था जहां हर घर से ये बीमारी बलि ले चुकी है। वो साथी इस मुद्दे पर लड़ भी रहा है। इस फ़िल्म ने भी हमें लड़ने का तरीका बता दिया और वो है शहीद-ऐ-आज़म भगत सिंह का रास्ता ‘बहरो को सुनाने के लिए धमाके की ज़रूरत होती है।’

‘मदारी’ के बाद ‘इरादा’ एक बेहतरीन फिल्म है जो समस्या को उठाती है। पूंजीपति-पुलिस-मीडिया-राजनीति के नापाक गठबंधन को बेबाक तरीके से दिखाती है और इसके साथ समस्या के समाधान का क्रांतिकारी रास्ता भी दिखाती है।

फिल्म में भटिंडा से बीकानेर के बीच एक चलने वाली पैसेंजर ट्रेन (जिसमे 60% से ज़्यादा कैंसर के मरीज़ आते-जाते है) का चित्रण रोंगटे खड़े करने वाला है। भारत की ट्रेनों में अक्सर नमकीन, छोले, पॉपकार्न, मूंगफली, पापड़ बेचने वाले मिलते है। लेकिन इस ट्रेन में खून बेचने वाले, इंशोरेंस बेचने वाले, कीमोथेरेपी का पैकेज बेचने वाले मिलते है जिसे फ़िल्म में बहुत ही अच्छे तरीके से दिखाया है। खून बेचने वाला आवाज़ लगा रहा है कि 2 के साथ 1 फ्री, आज का रेट 150-150…

फिल्म ने रक्तदान कैम्पों पर भी सवाल उठाया है। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह की दमदार आवाज में दुष्यन्त कुमार की ये लाइनें लाजवाब हैं-

“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है ये सूरत बदलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।”

दमदार और असरदार डायलॉग फ़िल्म की कहानी को बेहतरीन बनाते हैं, इसकी एक बानगी है –

“चूहे मारने वाली दवाई से आप बच जाओगे, लेकिन यहां के पानी से कभी नहीं बच पाओगे।”
“यहां का पानी ही नहीं, खून भी लुटेरे पूंजीपति की जागीर है।”
“ये शहर जितना ज़मीन के ऊपर है उतना ही ज़मीन के नीचे है।”

वो पत्रकार जो अपनी सच्चाई के कारण मौत के मुहाने पर खड़ा है, वो पूंजीपति को कहता है- “तुम्हे लगता है कि तुम सच को दबा दोगे, कोई ना कोई सच को जरूर सामने लाएगा, सच छुपेगा नहीं।”

हमें भी लगता है कि आने वाले समय मे लोग मज़बूती से लड़ेंगे और इस लुटेरी कौम का सर्वनाश कर देंगे।

 

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