इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अब छात्र नेता नहीं, बस पार्टी के चाटुकार होते हैं

Posted by Rajneesh dwivedi in Campus Watch, Hindi
February 13, 2018

वर्ष 2012 की बात है, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ बहाली हेतु आंदोलन चरम पर था, मैं भी उसी विश्वविद्यालय का एक छात्र था तो मेरे मन मे भी छात्रों की पंचायत की बहाली हेतु अनेक भावनाएं उमड़ रही थी। कारण भी था, क्योंकि जिस पूरब के ऑक्सफोर्ड का नाम सुन कर मैं इस विश्वविद्यालय में आया था उसके गौरव की रक्षा हेतु और एक आम छात्र होने के नाते मुझे छात्रसंघ से बड़ी उम्मीदें थी। एक प्रशासनिक अधिकारी पैदा करने वाली नर्सरी अब सूख रही थी।

आम छात्रों के पास छात्रावास नहीं था, पुस्तकालय से पुस्तकें निर्गत नहीं होती थी, कैंटीन, पीने का पानी, टॉयलेट, सांस्कृतिक गतिविधियों का अभाव और दीक्षांत समारोह का ना होना इन सारे कारणों को सीढ़ी बनाकर उस समय के छात्रनेताओं ने व्यापक छात्र समर्थन प्राप्त किया और मुझ जैसे आम छात्रों ने लाठियां खाई केवल छात्रसंघ के लिए, क्योंकि कहीं न कहीं हर छात्र वास्तव में पुराने गौरव को वापस पाना चाहता था।

खैर तब से 6 चुनाव हुए पर सारी समस्याएं जस की तस, एक आम छात्र खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा, जिस तरह से चुनावों में फॉर्चूनर और BMW और SUV के काफिले निकलते, सैकड़ो की संख्या में समर्थक और चुनावी बमबाज़ी होती उससे छात्रों की पंचायत ने अराजकता का रूप ले लिया।

वीभत्स स्थिति तब हुई जब विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के छात्र पैनल से टिकट हासिल कर, धनबल, जातिवाद, क्षेत्रवाद का विष घोला गया और छात्रों के मुद्दे पीछे छूट गए। अब तक जो नारे छात्र एकता ज़िंदाबाद थे वो अब अखिलेश भैया ज़िंदाबाद, हर-हर मोदी घर-घर मोदी इत्यादि होने लगे। इन नारों में छात्र कहीं नहीं था और वास्तविकता में जैसे लोकतंत्र में लोक गायब हो रहा वैसे ही यहां के छात्रसंघ से छात्र गायब हो गए, अब पदाधिकारी चुनाव जीतते ही ठेकेदारी और विधायकी का टिकट पाने हेतु विश्वविद्यालय के कम लखनऊ और दिल्ली में ज़्यादा चक्कर लगाते दिखे।

हाल के समय मे छात्रसंघ अध्यक्ष ने जो कि समाजवादी छात्रसभा से चुनाव लड़े थे, छात्रसंघ उद्घाटन हेतु सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी को बुलाने का निर्णय लिया। इसपर ABVP से जुड़े छात्रनेताओं ने विरोध करना शुरू किया और परिसर में फिर से टकराव की स्थिति आ गई। खैर इस विरोध के कई पहलू हो सकते हैं जिसमें एक ये भी है कि एक बार इसी विश्वविद्यालय में कुछ छात्रनेताओं ने योगी आदित्यनाथ को आमंत्रित किया था जिसका तात्कालिक छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह ने विरोध किया और उस समय की अखिलेश सरकार ने उनका पूरा साथ दिया। इसका पुरस्कार भी ऋचा सिंह जी को विधान सभा का टिकट और बाद में सपा में प्रवक्ता पद प्रदान कर दिया गया।

खैर मुख्य मसला ये कि एक विश्वविद्यालय में किसी पूर्व मुख्यमंत्री या सांसद का क्या काम, छात्रसंघ छात्रों का है और ज़रूरी है कि इसे केवल छात्रों के मुद्दों तक ही सीमित रखा जाए ना कि किसी पार्टी विशेष के अधिवेशन का रूप दे दिया जाए। हास्यास्पद ये है कि तथाकथित साम्प्रदायिक व्यक्तित्व का विरोध करने वाली पार्टी के पदाधिकारी एक ऐसे व्यक्तित्व को बुला रहे जिसके काल मे हुई नियुक्तियों और परिक्षाओं की विश्वसनीयता जांच के घेरे में है।

अच्छा तो तब होता जब छात्रों के मुद्दे पर ध्यान दिए जाते जोकि पहले छात्रसंघ चुनाव से आज तक बस मुद्दे ही रहे। विश्वविद्यालय परिसर में राजनीति छात्रों के मुद्दों पर होनी चाहिए न कि दलों के ऐजेंडे पर। मुझे लगता है कि छात्रसंघ के उद्घाटन हेतु शिक्षा, सामाजिकता या ऐसे ही किसी अन्य निर्विवाद व्यक्तित्व का चयन ज़्यादा अच्छा रहता या किसी पूर्व पदाधिकारी का जिसने आगे चलकर किसी क्षेत्र में विशेष उपलब्धि हासिल की हो।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास में कई ऐसे व्यक्तित्व हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान दे रहे हैं उनका चयन वास्तविकता में इस कार्यक्रम हेतु उत्कृष्ट होता परंतु ये देख कर दुख होता है कि छात्र प्रतिनिधि छात्रों के प्रतिनिधि न होकर पार्टी विशेष के चाटुकार होते जा रहे हैं और विश्वविद्यालय छात्रसंघ के कार्यक्रम रचनात्मक न होकर पार्टी विशेष के अधिवेशन हो रहे हैं।

जिन कंधो पर विश्वविद्यालय का गौरव वापस लाने का दारोमदार था वो दलों के नेताओ के पीछे भाग रहे, छात्रों के मुद्दे जस के तस हैं, गौरवशाली विश्वविद्यालय दिनोदिन पतन के नित नए आयाम गढ़ रहा और इस अराजकता भरे वातावरण में किसी का सबसे ज़्यादा नुकसान हो रहा है तो वो हैं आम स्टूडेंट्स, जो वास्तव में विश्वविद्यालय को पुराने स्वरूप में देखना चाहते हैं।

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