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जातिगत व्यवस्था और भेदभाव देश विकास में बाधा  सरकार के लिए एक बड़ी चुनोती-

Posted by Rameshwar Kulmiya
February 4, 2018

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लेख – देश आजाद होने के बाद भी दलित-आदिवासी वर्ग के लोग आज भी शहरों में मानसिक और गांवों में शारीरिक व मानसिक दोनों तरह से आजाद नहीं हुए है. ये लोग आज भी यातनाएं सहन कर रहे है. यह देश के लिये इससे बड़ी शर्म की बात और क्या होगी? ऐसा जातिगत भेदभाव मानवता व इंसानियत के खिलाफ़ है. ये लोगों की गंदी सोच है जो भेदभाव रखते है. इस छुआछूत और भेदभाव के कारण देश के विकास में बाधा उत्पन्न हो रही है. व्यक्ति देश के विकास की न सोचकर अपने और परिवार तक ही सीमित रह जाता है. देश विकास में उनकी सोच विकलांगता की तरह ही होती है. दलित कितने भी बड़े पद पर क्यों न बैठ जाए, किन्तु उसके मन में स्वाभिमान और दूसरों के मन में सम्मान की भावना विकसित नहीं कर पा रहा है. संविधान में भले ही जातिगत भेदभाव को ख़त्म किया जा चूका है, और कई कानून, नियम और अधिनियम बनाए जा चुके है. विचित्र बात यहाँ है की न तो आधिकांस दलित-आदिवासी को इसकी जानकारी है रो न ही कोई विभागीय आधिकारी इसे सख्ती अमल करता है. अब कुछ हद तक ऐसी घटनाएँ और अमानवीय कांड की खबरे प्रिंट-टेलीवीजन मीडिया में आ रही है, लेकिन आज भी मुख्य मीडिया में इस वर्ग का प्रतिनिधित्व नगण्य है. सोशल मीडिया में ये दलित-आदिवासी आदि शोषित वर्ग अपने मन की भड़ास निकाल रहे है. इन वर्गों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव जैसे – मंदिरों में प्रवेश निधेष, दबंगों द्वारा दलितों के घर जलना, सार्वजनिक वस्तु और स्थान का उपयोग पर पाबंदी, दलित दुल्हे को घोड़ी पर नहीं चड़ने देना, दलित प्रोफेसर को बैठने के लिए कुर्सी नहीं देना, दलित सरपंच को तिरंगा नहीं फेहराने देना, दलित-आदिवासी स्त्रियों के साथ बलात्कार करना और नंगा घुमाना, सवर्ण की वस्तु छूने पर मारपीट करना, मध्यान भोजन में दलित महिला के हाथ का बना भोजन न करना, दलित सरपंच को गोबर खिलाना, मूंछ रखने पर दलित को पीटना, छात्रों की छात्रवृति रोकना या कम देना, शिक्षण संस्थानों में दलित-आदिवासी के छात्रों के साल ख़राब करना, आरक्षण को लेकर गलत टिप्पणी करना, इन वर्गों के ऊपर थोपे गए गलत भावार्थ शब्दावली का प्रयोग कर अपमान करना, सरकारी योजनाओं के लाभ मुहैया नहीं करना, आदि ऐसी कई घटनाये है जो असहनीय व्यवहार को सहन कर रहे है. देश में ऐसी घटनाये रोजाना घट रही है. लेकिन उन्हें प्रमुखता से प्रकाशित नहीं किया जाता है. गरीब और उस पर दलित होना उनके लिए एक दोष सा प्रतीत हो रहा है. दलित-आदिवासियों की प्रतिदिन हजारों शिकायते आती है.
इस कारण ये वर्ग अपने अन्दर छुपी असंख्य, असम्भव व असाधारण प्रतिभा को उजागर नहीं कर पाते है. इस हेतु एक वर्ग के साथ-साथ भारत देश भी अन्य देशों की तुलना में पिछड़ा हुआ है. सामाजिक असमानता और गरीबी के कारण उन्हें मिलने वाला प्रतिनिधित्व के रूप में आरक्षण का लाभ भी नहीं मिल रहा है और व्यर्थ ही रखा रह जाता है. इस आरक्षण को पाने में भी उन्हें कई पापड़ बेलने पड़ते है. यहाँ सरकार के लिए एक चुनौती ही नहीं उसकी जिम्मेदारी भी है की जो ताकत व् साहस उन्हें संविधान और कानून में दिए है, उन्हें ईमानदारी से निभाए. क्योकि जो आरक्षण इस वर्ग को दिया जाता है उसका वाजीफ़ लाभ उन्हें आज तक नहीं मिला है. क्योंकि उन्हें कोई अच्छा प्लेटफार्म नहीं मिलता है. आज कुछ लोग पड़-लिख जरुर गये. लेकिन अज्ञानता, भ्रमिकता और मनसिकता से उभरे नहीं है. आज कई बड़े-बड़े संस्थानों में दलित-आदिवासियों के पद खाली पड़े है और कई शिक्षित लोग भी है लेकिन फिर भी जानकारी के आभाव में वे रुक जाते है. तथा उन खली पदों से विभागों की व्यवस्था बिगड़ रही है. आज हमारा देश युवाओं का देश है, कहते है कि यदि एक युवा रुक जायेगा तो देश रुक जायेगा, लेकिन यहाँ तो करोड़ों की संख्या में दलित-आदिवासी वर्ग के युवाओं का विकास रुका हुआ है. तो देश का विकास कैसे संभव है. इसी कारण हमारे देश में विकास की गति धीमी है. जब तक भारत देश से जातिगत भेदभाव, छुआछुत, अमीरी-गरीबी आदि का शारीरिक और मानसिक रूप से भेदभाव समाप्त नहीं होगा, भारत देश फिर से सोने की चिड़िया और विश्वगुरु नहीं बन पायेगा………………
एक राष्ट्र…एक कर …तो फिर एक जाति क्यों नहीं…….?
(रामेश्वर कुल्मिया मीडिया छात्र भोपाल, 8462072516)

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