Youth Ki Awaaz is undergoing scheduled maintenance. Some features may not work as desired.

पकोड़े बेचने की सलाह देने वाले राजनेताओं से गरीब बच्चों की भविष्य के लिए क्या आसा रखे

Posted by Somnath Tiwary
February 8, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

क्या गरीब बाल मजदूर को भविष्य सुधारने का हक़ नहीं?

मेरा नाम सोमनाथ है और मे झारखंड के रांची सहर में रहता हूँ, मै जिस कॉलेज में पढ़ाई करता हू उसके आसपास बिग बाज़ार, मैक्स जैसे कई बड़ी बड़ी शॉपिंग मॉल है

एक दिन अचानक कुछ दोस्तों के साथ में उन शॉपिंग मॉल के तरफ चल पड़ा, जहां अचानक मुझे कई छोटे छोटे बच्चे दिखाई पडे़ जिनकी संख्या 10-15 थी

उन छोटे छोटे बच्चों ने फटे पुराने कपड़े पहन रखे थे और सभी के हाथ में दर्जन भर गुब्बारे थे, तथा जो लोग कार या मोटरसाइकिल से उतरते या फिर सड़क पर जो लोग रहे थे वह बच्चे उन्हे रोक रोक कर उनसे गुब्बारे खरीदने की ज़िद कर रहे थे, इतने में ही एक कार हमारे सामने आकर रुकी जिसमे एक परिवार के लोग थे जिनके साथ दो छोटे छोटे बच्चे भी थे, ठीक उसी वक़्त एक छोटा बच्चा जिसकी आवाज भी कंठ से नहीं फुट रही थी वह गुब्बारे को बेचने के लिए उनके समीप खड़ा हो गया

उस वक़्त मेरी आत्मा सहम उठी और मै समझ नहीं पा रहा था कि जिस देश में बच्चों को भगवान का रूप माना जाता है उस देश में छोटे बच्चों की इतनी दर्दनाक दसा है

यह केवल गुब्बारे बेचने वाले बच्चों तक ही सीमित नहीं है बल्कि जब मैंने बाल मजदूरी को गहराई से जानने का प्रयास किया तो मुझे चाय वाला छोटू से लेकर, होटलों में प्लेट साफ करते,सब्जी बेचते, स्टेशनओ में भीख मांगते, ट्रेन में झाड़ू लगाते तक दिखाई दिए

ऐसे में एक ही सवाल उठता है कि क्या हमारे देश के नेता जनकल्याण के नाम पर लंबी लंबी बातो से जन का कल्याण हो पाएगा?

बचपन इंसान की जिंदगी का सबसे हसीन पल होता है न किसी बात की चिंता और न ही कोई जिम्मेदारी, बस हर वक़्त अपनी मस्तीयो में खोए रहना खेलना कूदना और पढ़ना

लेकिन सभी का बचपन ऐसा हो यह जरूरी नहीं

 

2011 के जानगणना के आधार पर जारी किए गए आंकड़ों के मुताबित भारत में 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते और 78 लाख बच्चे ऐसे हैं जिन्हें मजबूरन बाल मजदूरी करना पड़ता है

आंकड़ो के अनुसार बाल श्रम करने वाले 78 लाख बच्चों में 57 फीसदी लड़के तथा 43 फीसदी लड़किया है

इन आंकड़ों में बाल श्रम में लड़कियों के अनुपात कम होने का कारण पुरुष प्रधान समाज को बताया गया है

पुरुष प्रधान समाज होने की वजह से भारत की कुल काम काजी आबादी में महिलाओं का हिस्सा 27 फ़ीसदी है

अंत में मैं अपने देश कि संपूर्ण मंत्रीमंडल से यही गुजारिश करूंगा कि ठहाके न लगाकर इस गंभीर विषय पर ध्यान जरूर दे

 

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.