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पद्मावत एक जीवित इतिहास

Posted by Ranjan Kumar Raj Aryan
February 9, 2018

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‌पद्मावती पहली फिल्म नहीं है जिस पर राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ है, लेकिन यह घटना इस मामले में अनोखा है कि सेंसर बोर्ड की अनुमति और उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद पद्मावती का विरोध जारी रहा। यहां तक की जहां पद्मावती रिलीज हुई वहां भी सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए थे।तो क्या अब मुट्ठी भर लोगों के कारण सब जगह पुलिस की पहरेदारी जरूरी है? कुछ राज्य तो ऐसे थे जहां पद्मावत रिलीज ही नहीं हुई यहां दो  बातें गौर करने योग्य हैं पहली तो कि कानूनी और संवैधानिक संस्थाओं के फैसले को लागू करवाने में सरकार असफल रही है तो यह उसकी सोची समझी राजनीति का हिस्सा है। वोट बैंक की राजनीति के कारण ऊग्र अराजकतावादी तत्वों पर अंकुश नहीं लगाना चाहती। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने तो सेंसर बोर्ड के फिल्म को पास करने से पहले ही अपने-अपने राज्यों में प्रतिबंध लगा दिए थे यह चिंता का विषय इसलिए है कि अगर सरकार को ही फिल्म के बारे में निर्णय लेना था तो सेंसर बोर्ड का गठन क्यों किया? यदि ऐसे ही सारे मामलों को राज्य सरकार अपने हाथ में लेने लगेगी तब तो फिर न्यायालय,  तमाम जांच एजेंसियों तथा नियामकों का औचित्य ही समाप्त हो जाएगा। हमारा देश लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत कार्य करता है सभी संस्थाओं का अपना विशेष कार्य है अतः उन्हें अपना काम करना चाहिए।
दूसरी बात की करणी सेना जैसे संगठन केवल और केवल पद्मावत के विरोध पर क्यों उतर आए थे? जबकि सेंसर बोर्ड ने इतिहासकारों के एक दल से इस बात की पुष्टि करवाई कि राजपूतों के सम्मान को इस फिल्म से जरा भी ठेस नहीं पहुंचती। इसका मुख्य कारण है संविधान का सामाजीकरण न हो पाना, संविधान का घर-घर तक न पहुंच पाना यही कारण है कि लोगों में संविधान और संविधान के द्वारा स्थापित संस्थाओं में विश्वास नहीं जगता।
कुछ लोग कह रहे हैं कि पद्मावत का इतिहास से कोई लेना-देना नहीं नहीं है। परंतु यह पूरी तरह सच नहीं है इस फिल्म को समझने के लिए हमें पंडित जवाहरलाल नेहरू के द्वारा  इतिहास पर व्यक्त विचारों पर गौर करना चाहिए। उन्होंने कहा था

  • “इतिहास महज लड़ाइयों का या थोड़े से राजाओं या सेनापतियों का नाम नहीं है। इतिहास का काम है कि हमें किसी मुल्क के आदमियों का हाल बताए कि वह किस तरह रहते थे, क्या करते थे और क्या सोचते थे, किस बात सुनने से ऊन्हें खुशी होती थी, किस बात से रंज होता था या उनके सामने क्या क्या कठिनाइयां आई और उन लोगों ने कैसे उन पर काबू पाया। इतिहास इस तरीके से पढ़ें तो हमें उससे बहुत सी बातें मालूम होगी। अगर उसी तरह की कोई कठिनाई हमारे सामने आए तो इतिहास के जानने से हम उस पर विजय पा सकते हैं।”

पद्मावत फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जो हमें बताते हैं कि उस दौर के भारतीय समाज और खासकर हिंदू धर्म में कई समस्याएं थी जिसके कारण पद्मावती जौहर करने को मजबूर हुई। उस समय नैतिक और धार्मिक नियमों का कठोरता से पालन किया जाता था।
राजपूत नियमों को अपने प्राणों से प्रिय मानते थे पर अलाउद्दीन खिलजी के लिए वही नियम बन जाता था जो ऊसके मकसद में काम आए।
महिलाओं की स्थिति बेहद दयनीय थी रणनीतिक फैसले में अगर उन्हें शामिल किया जाता तो इतिहास कुछ और होता। उदाहरणस्वरूप अलाउद्दीन निहत्थे रतन सिंह के महल में आता है और पद्मावती को देखने की इच्छा प्रकट करता है तो सैनिक उसके गर्दन पर तलवार रख देते हैं। परंतु रतन सिंह ऊसे इसलिए जाने देता है क्योंकि भारतीय समाज में अतिथि को देवता के समान माना जाता था। तो भला वह उसे मार कैसे सकता था। इस घटना पर पद्मावती कहती हैं कि जब गर्दन पर तलवार रख ही दी थी तो गर्दन को धड़ से अलग ही कर दिया होता। इस पर रतन सिंह कहते हैं की राजनीति पर चर्चा करना महिलाओं का काम नहीं है।
इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाना केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना नहीं था बल्कि उन समस्याओं पर पर्दा डालना था जो हमारे समाज में आज भी बने हुए और जिसके कारण हमने  इतनी चोट खाए हैं कि उसके घाव आज भी ताजा है। सरकार और करणी सेना जैसे संगठनों को चाहिए कि महिलाओं से संबंधित समस्याओं को दूर करने की कोशिश करें साथ ही अप्रासंगिक हो चुके पारंपरिक नियमों को दूर करें ताकि फिर कोई पद्मावती को जौहर न करना पड़े। फिल्मकारों को चाहिए कि कल्पित इतिहास और वास्तविक इतिहास के फर्क को समझें।

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