बच्चों को सीखने में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं

Posted by Abhimanyu Kumar
February 28, 2018

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गाँधी फेलोशिप यात्रा के दौरान क्लासरूम इमर्शन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के दौरान हर एक फेलो को एक निश्चित समयावधि तक एक शिक्षक के दायित्व एवं कर्तव्य का निर्वहन करना होता हैं। मुझे भी इस प्रक्रिया के दौरान गुजरात राज्य के सूरत जिला अंतर्गत आदिवासी बाहुल्य उमरपाडा तालुका के उच्च प्राथमिक स्कूल, सरवन फोकड़ी में दायित्व निर्वहन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कक्षा तीन में गणित विषय के शिक्षक के रूप पांच सप्ताह के लिए स्कूल परिवार का हिस्सा बना। इस स्कूल परिवार में मेरे अलावे प्रधानाध्यापिका, पांच शिक्षक सहित 136 बालक/बालिकाएं अध्ययनरत थी।
प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य था कि शिक्षक की भूमिका एव दृष्टिकोण, शिक्षक एवं छात्रों के सम्बंध को समझना और छात्रों के सीखने के परिणाम में कैसे इजाफा लाया जाए। जिससे उनमें शैक्षणिक, भावनात्मक एवं सृजनात्मक विकास को सुनिश्चित किया जाए। शिक्षक के भूमिका में मैंने यह महसूस किया कि बच्चों को सीखने में कठिनाइया कहा आ रही है। यह सब जानने के लिए हमे बच्चे को समझने की जरूरत है क्योंकि हम (शिक्षक) उनको समझेंगे नही तब तक उन्हें हम कुछ भी सीखा नही पायेंगे। क्योंकि उनमें शैक्षणिक विकास हेतु उनसे भावनात्मक सम्बन्ध जरूरी है। हर एक दिन मैं अपने कक्षा के बच्चों से बात करता उनके अनुभव सुनता। बच्चे गुजराती/वसावा (स्थानीय भाषा) में बोलते। मैं भी हिंदी बोलते-बोलते गुजराती के कुछ शब्द और वाक्य बोल दिया करता। इस दौरान हमने महसूस किया कि गणित शैक्षणिक विषय के रूप में हमारे जीवन के हर पक्ष में व्याप्त है। जितना यह विद्यार्थी जीवन मे उपयोगी है। उतना ही अन्य लोगों के लिए भी क्योंकि गणित हमारें रोजमर्रा के जीवन मे समाया हुआ है एवं समतामूलक समाज के लिए यह आवश्यक भी है। प्रोसेस के अंतिम दिन तक गुजराती भाषा मे गणित के हर एक शब्द को सीखने का प्रयासरत रहा। जो ये मिथ्या को तोड़ने में मदद किया कि अध्यापन कार्य सिर्फ किसी को सीखाने भर से खत्म नही हो जाता है यह कार्य तो सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का एक अभिन्न हिस्सा मात्र है। सीखने के लिए विविध प्रकार का अभ्यास जरूरी होता है और कक्षा में अभ्यास का मतलब ही सीखना होता है। सीखने का सम्बंध रुचि/पसन्द से है। अगर अभ्यास रुचिकर नही हो तो बच्चे नही करते है जिससे उनकी समझ विकसित नही हो पाती है। क्योंकि समझ आपके ज्ञान का परिणाम है सीखने के गति का परिणाम नही अर्थात कक्षा में कुछ बच्चे होते है जो अभ्यास को जल्दी से या आसानी से कर लेते है। वही कुछ बच्चे होते है जो अभ्यास को थोड़े लेट से करते है या उन्हें करने में कठिनाइ आता है। ऐसे में अभ्यास को रुचिकर बनना बेहद जरूरी होता है। अगर अभ्यास कार्य रुचिकर हो तो हम उन्हें आसानी से समझा पाते है। इसके लिए कक्षाओं में पाठ का योजना बच्चे पसन्द के ध्यान में रखकर बनाना, लर्निंग कॉर्नर अर्थात सीखने का कोना एवं समूह निर्माण करना, समूह में छात्रों का सही समायोजन हो इत्यादि बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसलिए प्राथमिक कक्षा में विविध प्रकार का रुचिकर अभ्यास कार्य जरूरी होता है। शिक्षा ही वह मात्र पीयूष की अविरल धारा है जिसके पान मात्र से ही सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक असमानता की बुनियाद हो मिटाकर कर समतामूलक समाज की अवधारणा को विकसित किया जा सकता है। प्रक्रिया के अंतिम दिनों में अनयास ही अध्यापिका बोली कि मेरे बच्चे गणित जितना भी सीखे आपसे लेकिन हिन्दी बोलने एवं समझना उससे कही ज्यादा सीख रहे है और लेंगे भी।
“बदलाव अथवा परिवर्तन एक बहुत बड़ी स्थिति है, जीवन के हर क्षेत्र में समय के साथ वैचारिक एवं व्यवहारिक बदलाव आते रहते हैं। इन बदलावों का प्रभाव हमारी कार्य शैली मे स्पष्ट दिखाई देता है।’’

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