माफीनामा: जीने, प्राइवेसी और लिखने-बोलने के अधिकार का साक्षात्कार

Posted by Anil Kumar
February 6, 2018

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ये साक्षात्कार मैंने एक व्यक्ति से किया है जो गलती पता न होते हुए भी सार्वजनिक माफी चाहता है। उसको कई सूत्रों ने बताया था कि उसके बारे में कुछ ऐसा प्रचार है या कुछ ऐसे आरोप हैं जिनसे वो खुद अनभिज्ञ है।

प्रश्न – लोग आपको नफरत करने वाला या हिटलर क्यों समझ रहे हैं?

उत्तर : दरअसल, ये विचारों की दुनिया है। जैसे वाल्तेयर ने भी कहा है “मैं आपके विचारों से असहमत होते हुए भी आपके विचारों का सम्मान और रक्षा करुंगा”….   मैं अगर किसी मुद्दे पर अपना विचार रखता हूं, और उस पर खुलकर कहता हूं, अपने आप से बात कर उस विषय को समझना चाहता हूं तो उसका ये कतई मतलब नहीं कि मैं किसी दूसरे को कोई चुनौती दे रहा हूं। इसका ये भी मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि मैं किसी दूसरे को गलत कह रहा हूं। अगर मैं सवाल उठा रहा हूं तो उसका जवाब दिया जाना चाहिए, लेकिन इसका ये मतलब ये नहीं की सवालों के जवाब जरूरी ही दिए जाएं। ये आपकी स्वतंत्रता है। मेरी स्वतंत्रता सवाल पूछने और उस मुद्दे को उठाने तक में थी। किसी भी व्यक्ति की महज उसके विचारों या उसके कुछ महीनों के व्यवहार को देखते हुए उसके बारे में एक परमानेंट विचार बना लेना, उन दोनों की स्वतंत्रता में खलल है जिसके बारे में विचार बनाया जा रहा है और जिसके द्वारा बनाया गया है। किसी को हिटलर या फिर नफरत करने वाला समझकर उसके बारे में विचार बनाना कहां तक जायज है, ये तुलना गलत है।

प्रश्न – प्राइवेसी पर हमले का क्या मतलब है, आपकी नजरों में?

उत्तर – राइट टू प्राइवेसी, जैसी चीज कोई रह नहीं गई है। राइट टू प्राइवेसी का हनन हुआ है या नहीं ये परिभाषित करने की जरूरत है। दरअसल, मेरी राइट टू प्राइवेसी का हनन जब हुआ तो उसमें पर्सनल बातें, कुछ डायरी के पन्ने थे। लेकिन इसको पढ़कर किसी दूसरे इंसान ने एक अलग धारणा बनाई और उसे किसी तीसरे में वितरित कर दिया। जबकि राइट टू प्राइवेसी की मूल भावना का हनन तो उसके हाथों नहीं हुआ जो व्यक्ति ये पर्सनल बातें छिपाए हुए था या फिर कर रहा था या फिर डायरी में लिख रहा था बल्कि जिस दूसरे व्यक्ति ने उस प्राइवेसी को तीसरे व्यक्ति तक वितरित कर दिया, हनन तो उसके हाथों से हो गया। क्योंकि कई बार प्राइवेसी किसी भी दो व्यक्तियों में या फिर इससे ज्यादा व्यक्तियों तक सीमित हो सकती है लेकिन उस लिखे हुए पर या उस प्राइवेसी पर अपनी ओर से धारणा बनाकर वितरित कर देना, या किसी तीसरे व्यक्ती या इससे ज्यादा लोगों तक पहुंचा देना, स्वतंत्रता का हनन है।

प्रश्न – आप पर आरोप भी लगाए, क्या थे वो?

उत्तर – मुझे इस बारे में नहीं पता, लेकिन जिस तरह से मुझे हैरेस किया गया ये गलत था या नहीं मैं ये भी नहीं जानता, अगर ऐसा हुआ भी है तो इसका कारण भी मैं जानना नहीं चाहता। लेकिन आरोप और दोष या दोषी होने में अंतर है। मैं ये तो नहीं जानता कि ये आरोप की बात आप क्यों कर रहे हैं लेकिन एक बात कहना चाहूंगा, सजा देने का काम कानून का है। महज आरोप या किसी प्राइवेसी को किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा एक अलग प्रकार की धारणा बनाकर किसी तीसरे व्यक्ति तक पहुंचाने के बाद तीसरे या चौथे या सभी के द्वारा उस व्यक्ति को सजा देना या उसे दोषी समझ लेना, गलत है। जब तक खुद उस व्यक्ति के मुंह से ये न निकले कि हां मैंने ये किया। इसका मतलब ये नहीं किसी व्यक्ति के अंदर से अपनी सोची हुई या उस आरोप के बाद बनी धारणा को साफ तौर पर समझने के लिए लिए गए हर एक्शऩ या क्रिया की प्रतिक्रिया को उसके अपराध को छिपाने की झुंझलाहट समझ लिया जाए। क्योंकि ह्यूमन नैचर हर व्यक्ति का एक समान नहीं होता। कई बार आरोप के हैरेसमेंट के दौर से गुजर रहे व्यक्ति की झुंझलाहट ह्यूमन नैचर की एक साधारण प्रतिक्रिया हो सकती है। हो सकता है ये साधारण प्रतिक्रिया किसी दूसरे या तीसरे व्यक्ति के लिए जो इस हैरेसमेंट को देख या समझ रहा हो, उसकी नजरों में एक अजीब व्यवहार हो। जबकि इसके विपरीत किसी अन्य व्यक्ति की नजर में वो ही साधारण।

प्रश्न – आपकी हर क्रिया पर प्रतिक्रिया का दौर क्यों चला? या आपकी क्रिया पर ही लोगों ने प्रतिक्रिया क्यों दी?

उत्तर – मैं ये तो नहीं कह सकता कि प्रतिक्रिया क्यों दी, लेकिन ये कह सकता हूं कि जब किसी क्रिया पर प्रतिक्रिया होती है तो उसमें एक मानवीय विज्ञान काम कर रहा होता है। अगर किसी क्रिया को देखोगे नहीं तो प्रतिक्रिया देने का सवाल ही नहीं, अगर आपने किसी भी क्रिया पर प्रतिक्रिया दी है तो इसका अर्थ ये निकाला जाना चाहिए कि आप उस क्रिया का गहराई से अध्ययन कर रहे थे तभी आपमें एक विचार बना और आपने प्रतिक्रिया दी। यानी आपने एक समय का हिस्सा उस क्रिया पर विचार बनने के लिए लगाया।

प्रश्न – आपको ऐसा क्यों लगता है कि आरोप लगाने वाला गलत है?

उत्तर – देखिए, मुझे नहीं लगता कि सामने वाला गलत है, लेकिन क्रिया की प्रतिक्रिया ठीक उसी समय होती है, ये नकारात्मक भी सकती है और सकारात्मक भी। अगर कोई दो लोग झगड़ रहे हों, अचानक तीसरा आ जाए और उस प्राइवेसी को भीड़ में बांटकर ये कह दे कि इससे ऐसा होने वाला था या हो सकता है, तो भीड़ की धारणा तो वैसी ही बन जाएगी जैसी धारणा उस तीसरे व्यक्ति ने बनाने के लिए कही। ये धारणा एक पूर्वाग्रह को जन्म देती है यानी पहले से ही किसी के बारे में अनुमान लगा लेना और उसी अनुमान के आधार पर उस व्यक्ति के बारे में भी वो धारणा बना लेना जो उस पर सटीक नहीं ठहरती। … ये प्रक्रिया किसी दो व्यक्ति या इससे ज्यादा व्यक्तियों के लिए गलत हो सकती है। उदाहरण के लिए कहूं तो यही कहुंगा कि अगर मैं कहूं कि एक व्यक्ति दाड़ी पर हाथ रख रहा है और आंख बंद कर रहा है तो वो कुछ ऐसा सोच रहा है जो आपके बारे में है, लेकिन आप उस समय तो इस बात पर पूरी तरह यकीन नहीं करेंगे लेकिन धीरे-धीरे एक मनोवैज्ञानिक दबाव आपके मस्तिष्क को उस एक्सप्रेशन को देखने के लिए मजबूर करेगा, फिर आप उसी धारणा के अनुसार उस व्यक्ति के व्यक्तित्व के बारे में अनुमान लगाने लग जाएंगे। और फिर एक ऐसा समय आएगा जब दोनों गलत धारणा का शिकार होंगे और धीरे-धीरे सब चीज गलत होती जाएगी, और दोनों व्यक्तियों को वो धारणा एक दूसरे के प्रति सही लगने लगेगी।

प्रश्न – आपके साथ ही क्यों?

उत्तर – इस सवाल का जवाब मुझे चाहिए भी और नहीं भी। जैसे आपको चाहिए ही। क्योंकि इस सवाल का जवाब मेरे पास है नहीं। ये एक ऐसे पूर्वाग्रह का परिणाम हो सकता है जो किसी अधूरी जानकारियों और किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा बताई गई राय के आधार पर बना हो। मान लो, कोई व्यक्ति कहता है या सोशल मीडिया पर लिखता है कि, ‘पानी में डुबकी लगाकर आता हूं’ तो क्या आप इसे आत्महत्या मान लेंगे, नहीं… लेकिन कई लोगों के लिए ऐसा होगा…। अगर किसी व्यक्ति की आंखों में आंसू देखें तो एक व्यक्ति तो उन आंखों में आंसुओं को दुख समझेगा औऱ कोई दूसरा या तीसरा ऐसा भी हो सकता है जो एक धारणा बनाकर उन आंसुओं को राजनीति समझ ले। एक महज धारणाओं के इर्द-गिर्द घूमते हुए विचारों का परिणाम ही हो सकता है कि किसी व्यक्ति पर कोई ऐसा आरोप लग जाए जो वाकई चौंकाने वाला हो।

प्रश्न – तो आप उन्हें गलत ठहरा रहे हैं?

उत्तर – नहीं, वो अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन आरोप अगर एक शख्स की तरफ से हो तो सही माना जा सकता है अगर किसी व्यक्ति पर इससे ज्यादा की तरफ से ऐसी बातें निकलकर अचानक से आएं कि सब चौंक जाएं तो… इससे एक सवाल उठना तो जरूरी होना चाहिए.. कि ऐसा संभव हुआ तो कैसे, औऱ अगर हुआ तो कौन-कौन इसका जिम्मेदार हो सकता है?  क्योंकि अगर एक शख्स के बाद दूसरे, फिर तीसरे और चौथे या फिर ज्यादा लोग अचानक से उस व्यक्ति के बारे में विपरीत सोचने लगें वो शख्स सच जानता होगा जिसने उस धारणा को पहली बार पहुंचाया या ऐसी धारणा बनाई या उस क्रिया की पहली प्रतिक्रिया दी। उदाहरण के लिए कहें तो… अगर कोई शख्स किसी से कोई ऐसा फिल्मी डायलोग बोल दे या फिर ऐसा कुछ कह दे….. जो उसको पसंद न हो तो वो उसी समय उस क्रिया पर नकारात्मक प्रतिक्रिया दे सकता है। लेकिन कोई दूसरा या तीसरा शख्स ऐसा भी हो सकता है कि उस कही गई बात को भूतकाल में किसी घटी घटना से उसे जोड़ दे…और तीसरे व्यक्ति को बता दे तो ऐसे में चौथा और पांचवा व्यक्ति भी उसको भूतकाल की घटना से जोड़कर एक धारणा बना लेगा।

प्रश्न – तो आप क्या चाहते हैं?

उत्तर – मैं नहीं जानता मेरी गलती है या नहीं, लेकिन मैं फिर भी सार्वजनिक माफी मांगता हूं।

उपरोक्त साक्षात्कार जीने का अधिकार, राइट टू प्राइवेसी और खाने के अधिकार और बोलने-लिखने के अधिकार को समझने के लिए है।

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