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मुसलमान भारत का नागरिक नहीं है, उसका तिरंगा फहराना जुर्म है?

Posted by Irfan Attari
February 16, 2018

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बीती 26 जनवरी को कांसगंज में हुई हिंसा और पुलिस की एक तरफा कार्यवाही सवालों के घेरे में है। बुधवार को कासगंज के दौरे से लौटी फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि कासगंज दंगा पूर्व नियोजित था। सत्ताधारी पार्टी के कुछ सहयोगी संगठनों ने पूरी योजना बनाकर इलाके में गणतंत्र दिवस के मौके दंगा करवाया था। दंगा करवाने का मुख्य उद्देश्य दोनों समुदाय के बीच नफरत फैलाकर आने वाले 2019 के लोकसभा चुनावों में फायदा उठाना है। दंगे के कई पहलू हैं जिन्हें देखकर लगता है कि दंगा सोची समझी साजिश के तहत करवाया गया था।
26 जनवरी को कासगंज के अब्दुल हमीद चैक पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने प्रशासन की अनुमति से एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगा झण्डा फहरा कर मिठाईयां बांटने का कार्यक्रम था। इस मौके पर इलाके को बहुत ही खूबसूरती से सजाया गया था। जगह-जगह केसरिया, सफेद और हरे रंग के गुब्बारे लटके हुए थे। कार्यक्रम का आयोजन शांतिपूर्वक चल रहा था तभी संकल्प फाउंडेशन और एबीवीपी के लोग बाइकों पर भगवा झण्डों और तिरंगा झण्डे के साथ आते हैं और रोड खाली करने को कहते हैं। मुस्लिम समुदाय के लोग उनसे कार्यक्रम में सम्मिलित होने को कहते हैं लेकिन वो लोग हंगामा कर देते हैं। दोनों समुदाय के लोगों में तीखी बहस हो जाती है और दंगा भड़क जाता है। दंगे में एक युवक चंदन गुप्ता की मौत हो जाती है और दो अन्य युवक नौशाद और अकरम गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिना इजाजत के संकल्प फाउन्डेशन, एबीवीपी और हिन्दू संगठन के लोग मुस्लिम इलाके में रैली लेकर कैसे पहुंचे? किसी भी रैली को निकालने के लिए पुलिस और प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ती है, रैली कहां से निकलेगी और किस-किस इलाके में होकर जायेगी इन सभी बातों पर पुलिस सहमति देती है और रैली को सुऱक्षा मुहैया कराती है। इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि हिन्दूवादी संगठनों से पुलिस से किसी भी प्रकार की इजाजत नहीं ली थी और पूरी साजिश के तहत मुस्लिमों द्वारा आयोजित किये गये कार्यक्रम में विघ्न डालने गये थे।
कानून की धज्जियां उड़ा कर रैली का आयोजन करने वालों के खिलाफ पुलिस और मीडिया मौन क्यों है? हिन्दूवादी संगठन के लोग जान-बूझ कर उस इलाके में क्यों गये जहां पहले से ही गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम चल रहा था। अगर हिन्दूवादी संगठन के लोग देशभक्ति दिखाने के लिए तिरंगा यात्रा लेकर गये थे तो मुस्लिमों द्वारा आयोजित तिरंगा कार्यक्रम में क्यों शामिल नहीं हुए। इन सभी सवालों से ये साफ पता चलता है कि हिन्दूवादी संगठनों के लोग दंगा करने के उद्देश्य से उस इलाके में गये थे।
दूसरा बडा सवाल ये है कि वीर अब्दुल हमीद चैक पर मुस्लिमों द्वारा मनाये जा रहे गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम को पुलिस ने किस प्रकार की सुरक्षा महैया करायी थी। पुलिस प्रशासन के कार्यक्रम को सुरक्षा देने पर नाकाम होने पर उनके खिलाफ क्या कार्यवाही हुई है। स्थानीय थाना इंचार्ज और स्थानीय प्रशासन की विफलता पर मुख्यमंत्री ने क्या कार्यवाही की है?
तीसरा बड़ा सवाल जो गोली चंदन को लगी वो किस बंदूक से निकली थी यह बात पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पता चल गयी होगी। क्या गिरफ्तार किये गये सलीम से वही बंदूक बरामद हुई है। पुलिस को कैसे पता चला कि गोली सलीम और उसके भाइयों ने चलायी थी। जबकि एक वायरल वीडियों में तिरंगा रैली का एक शख्स बन्दूक लहराता हुआ नजर आ रहा है। ये लोग बन्दूकें लेकर किसी जंग पर जा रहे थे या तिरंगा रैली निकाल रहे थे, ये कैसी तिरंगा रैली थी जिसमें हथियारों की जरूरत पड़ रही थी?
घटना के दो दिन बाद स्थानीय जिलाधिकारी ने एक शांति बैठक बुलाई और कहा कि इलाके के मुस्लिमों को अपनी दुकानें खोलनी चाहिए। दुकानें खोलने के दौरान पुलिस ने कई मुस्लिमों की गिरफ्तारी की।
दिल्ली से गयी फैक्ट फाइंडिग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में स्थानीय प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाये हैं। कमेटी का कहना है कि पुलिस एक समुदाय विशेष के खिलाफ कार्यवाही कर रही है। कमेटी का कहना है कि कासगंज दंगा पूर्व नियोजित था। चंदन को किस जगह गोली लगी और गोली किसने मारी ये अभी साफ नहीं है। इस बात को लेकर दोनों समुदायों में अंसमंजस की िस्थति बनी हुई है।
कमेटी ने कहा, बाइक पर तिरंगा रैली निकालने आये युवक दंगे के बाद अपनी मोटरसाइकिल वहीं छोड़कर भाग गये। पुलिस ने उन युवकों के खिलाफ अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की है। बिना पुलिस की इजाजत के रैली निकालने और दूसरे समुदाय के गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में विघ्न डालने पर भी पुलिस ने उनके खिलाफ अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की है। 26 जनवरी को संकल्प फाउंडेशन और एबीवीपी के लोगों ने हवाई फायरिंग करके रैली की शुरूआत की और उनके पास पुलिस के लोग मौजूद नहीं थे।
कमेटी की सदस्य बनज्योत्सना लाहिरी ने पुलिस पर पक्षपात का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि दंगें में सबसे ज्यादा नुकसान मुस्लिम समुदाय के लोगों का हुआ है। मुस्लिम व्यापारियों की दुकानों को आग लगा दिया गया और उनके दो धार्मिक स्थलों को भी आग लगा दी। जबकि हिन्दुओं के किसी भी धार्मिक स्थल को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। साथ ही उन्होंने कहा दुकाने जलाने के खिलाफ जब मुस्लिम समुदाय के लोग कासगंज पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करने गये तो पुलिस ने उनकी एफआईआर दर्ज नहीं की।
दंगे के बाद पुलिस लगातार मुस्लिम समुदाय के लोगों की गिरफ्तारी कर रही है। पुलिस दिन रात मुस्लिमों के घरों में छापेमारी कर रही है जिससे वो दहशत में जीने को मजबूर हैं। मीडिया ने भी मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई है। जो हिन्दूवादी संगठन के लोग पूरी तैयारी से दंगा करने गये थे उनके खिलाफ मीडिया क्यों चुप्पी साधे हुए है। जिन मीडिया संस्थानों ने दंगे की गलत बयानी की उनके खिलाफ सरकार क्या कार्यवाही कर रही है।
क्या मुसलमान भारत में प्रशासन की अनुमति से भी गणतंत्र दिवस नहीं मना सकते? क्या मुसलमान भारत के नागरिक नहीं हैं?
क्या ये योगी सरकार की विफलता नहीं हैं कि एक समुदाय शांति पूर्वक गणतंत्र दिवस नहीं मना सकता?
पूरी तैयारी से कानून की धज्जियां उड़ाते हुए दंगा करने गये युवकों को मीडिया और सरकार हीरो बनाने पर क्यों तुली हुई है
देश के कानून और संविधान की धज्जियां उड़ाने वाले लोगों को अगर सरकार और मीडिया हीरो बनाती रहेगी तो देश में अराजकता फैल जायेगी। भारतीय लोकतंत्र अभी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो चुका है अगर सही समय पर इलाज नहीं किया गया तो धीरे-धीरे लोकतंत्र मर जायेगा।

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