“मौहल्ला नहीं रंडीखाना था वो”

Posted by Anil Kumar
February 3, 2018

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मैं महज करीब 12-13 साल का था। क्रिकेट में रुचि रखने वाला। छत से छत कूद पतंग लूट उड़ाने वाला। पतंग जब उड़ती तो अच्छे-अच्छों की पतंग उतर जाती। 2 रुपए का डोर, 1 रुपए का मांझा और 1 रुपए की पतंग। कई बार लूटी हुई पतंग से ही काम चल जाया करता। 3 रुपए मम्मी देती थी। कई बार मांझे के पैसे नहीं होने पर पुराने मांझे से या फिर लूटी पतंग का मांझा इस्तेमाल कर उड़ाता था। फिर “छज्जा” पतंग से मोहल्ले की पतंगे क्या दूर दूर से उड़ाने वाले भी अपनी पतंग कटवा लिया करते। जब उसकी पतंग उड़ती तो लोगों के एक से एक मांझे उसके एक रुपए के मांझे के सामने सुईं धागे की डोर साबित होते। पतंग, पढ़ाई और फिर रात को सोकर सुबह 5 बजे ट्यूशन निकल जाना। पैदल, 1 किलोमीटर। गणित का ट्यूशन। ट्यूशन के बाद स्कूल और स्कूल के बाद थोड़ी पढ़ाई और फिर 4 बजते ही मम्मी से तीन रुपए मांग, पतंग मांझे का जुगाड़कर छत पर चढ़ जाता। खूब पतंग उड़ाता। इतना कि उंगलियों पर कट लग जाते, जैसे मैं खुद भी उड़ना चाहता था। बहुत दूर उड़ जाना चाहता था।

ये ऐसे जहर को न पीने और इस तकलीफ पर मरहम लगाने की एक कोशिश थी मेरी। उस बचपने में कर भी क्या सकता था। चारों तरफ ऐसा जहर मेरी नसों में डाला डाला जा रहा था जिसका मुझे अहसास नहीं था। क्योंकि वो “मोहल्ला नहीं रंडीखाना” था। इस सच के साथ मैं बड़ा होना शर्म के साथ बड़ा होना है। लेकिन आज भी ये सच मुझे सोने नहीं देता। भविष्य की नीव हिला देने वाला सच। हर घऱ में सेक्स का नंगा नाच करने वाला मोहल्ला। गली, नालों, सड़कों पर जितना कचरा औऱ गंदगी थी, उससे कहीं ज्यादा गंदगी वहां के लोगों के दिमाग में थी। इस गंदगी में कमल बनना चाहता था मैं, लेकिन हर गंदगी कमल को खिलने ही दे ये मुमकिन नहीं। कई गंदगियां कीड़ों से भरी होती हैं, दलदल…ऐसी दलदल जिसमें कमल खिलने से पहले ही गंदा, इतना गंदा हो जाता है कि बरसों तक ये दाग उस कमल को खिलने नहीं देते हैं। हो सकता है ये लेख और ये सच्चाई पढ़… पचा न पाएं। इसिलए मैं पब्लिकली भी नहीं आना चाहता। डरता हूं, उस दुनिया से जिसने मेरी शर्म को बेशर्म बना दिया। उस उम्र में कॉपी पेन होना चाहिए था और दोस्त, अच्छी बातें लेकिन मुझे नंगा कर दिया। बड़े होने से पहले ही बड़ा बनाने की खाई में धकेला जाना। मासूम था मैं। ये सच मेरे लिए जितना कड़वा है, उनके लिए उतान ही चुभने वाला। इस सच ने मेरी मुस्कराहट छीन ली। बचपन को रौंदकर समय से पहले बता दिया कि शिक्षा में कुछ नहीं रखा। मैं इन सबका विरोधी रहा। मैं बचपन से ही उनके पक्ष में अपना पक्ष मिलने नहीं देता था। वो मेरा शोषण करते गए। क्योंकि मैं लाचार था। दो अंतर्द्वंद में जीता था, उनके जैसा बन जाऊं या फिर उनसे अलग कहीं दूर भाग जाऊं। एक बार प्रयास भी किया। घर से दूर रिश्तेदार के यहां बस में बैठकर अकेले जाने की हिमाकत। इसको मेरा गलत आचरण बता दिया, कह दिया ये घर से भाग गया है लड़ाई करके। मेरे रिश्तेदारों में फोन कर दिया। मुझे मजबूरन लौटना पड़ा। लेकिन किसी ने नहीं पूछा कि मैं क्यों भागा था।

पापा महीनों घर नहीं आते थे। और वहां के रिश्ते मुझे खा रहे थे। धीरे-धीरे। यही था धीमा जहर। सेक्स की लत या प्यार के पीछे छिपी नंगी हवस। जिस उम्र में रिश्तों का महत्व समझना चाहिए था उस उम्र में सेक्स और हवस का नाच अपनी मासूम आंखों से देखना और फिर विरोध पर हर रोज शोषण का शिकार होना। ज्यादा विरोध करता तो मेरा बहिष्कार कर देते। उनका साथ देता तो शोषण। कोई चारा नहीं था मेरे पास। किताबों में मुंह दबा अपने आंसू छिपाने के अलावा। मैं इस जहर की खाई में इतने अंदर तक धकेला गया था कि सच कहने में कई साल लग गए। हिंसा के बाद घरेलू हिंसा, चिल्लाहट, चीखें, गालियां, हर दिन। घर में बंद हों तो पड़ोस में शुरू। कोई एक महिला को मार रहा होता तो कोई एक दसरे से लड़ रहा होता।

“मैं ये सच आज भी अपने आप से कहता हूं तो शर्म से आंखें झुक जाती हैं, जिंदगी ने जन्मा तो कीचड़ में लेकिन कमल क्यों नहीं बनने दिया। शायद भगवान होते धरती पर तो मैं ये सवाल करता और जोर से आवाज लगाकर पूछता, आखिर मेरे साथ ऐसा क्यों किया?, आज हालातों ने इस सच को कहने के लिए मजबूर कर दिया”

“मैं शोषित होता रहा। किसी ने नहीं देखा, मैं फिल्में देखना चाहता था, लोगों ने फिल्में देखने का मौका ही नहीं दिया।“

मेरी उम्र खेलने कूदने की थी। लेकिन जिस भी पड़ोस में टीवी देखने जाता, वहां हवस पसरी होती। उस समय ब्लैक एंड व्हाइट ही टीवी थे, वो भी पूरे मोहल्ले में एक या दो घरों में। उसके बाद कलर टीवी भी उन्हीं घरों में आए। टीवी देखने जाता। बुआओं के संबंध बनते देखना, जिदंगी का सबसे बुरा पड़ाव होने के साथ-साथ बचपन खत्म होने की कहानी थी। मासूम था मैं। मैं बचाता रहा अपने आपको। लेकिन फिर भी नहीं बचा पाया। कहीं दूर जाना चाहता था मैं। दिल्ली जैसे शहर आकर पापा के साथ रहने के लिए, अच्छा पढ़ने के लिए। ये सच आज भी मुझे सोने नहीं देता। क्योंकि मैं शोषित हुआ अपने लोगों के हाथों, समाज के हाथों। गला सूख जाता है, भाग जाने का मन करता है खुली हवा में, जब याद आता है वो बचपन चीरहरण, नंगाकर देना, मेरे गुप्तांगों को उन कुंठित महिलाओं, लड़कियों के हाथों से छूना, छूट भागने की तड़प। सबकुछ। मैं वो लड़का जो अपनी मां के सामने नंगा होने से शर्माता था उसको नंगा किया गया, विरोध के स्वर दब गए उनकी खिलखिलाती हंसी के बीच। आंखों में आंसू होते थे, बुआएं और औरते मुस्करा रहीं होतीं। मैं तड़पता था। वहां से किसी ऐसी जगह जाने के लिए जहां मुझे अपना लगे। कहता था, ऐसा मत करो, लेकिन मेरी कोई नहीं सुनता था। पकड़कर एक साथ कुंठाओं की जिज्ञासा को त्रप्त किया जाता। मासूम था मैं, दूर भाग जाना चाहता था।

“इतने बरस बाद भी अपने शोषण की खुलकर आवाज तक नहीं उठा सकता। देश में कानून शायद मुझे इसकी इजाजत नहीं देता”

उपरोक्त हैडिंग में गाली किसी को भी आहत करने के लिए नहीं लिखी गई है, इसे सिर्फ शीर्षक के तौर पर ही लें। किसी शख्स से पूछे सवालों के आधार पर लिखा गया एक  लेख है।

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