हर रचनाकार का अधिकार है किताब से मिलने वाली रॉयल्टी

Posted by Neeti Singh in Books, Hindi
February 12, 2018

साहित्य को संजोना है तो साहित्यकार की चिंता करनी चाहिए।

जब भी कोई लेख लिखा जाता है तो उम्मीद की जाती है कि केवल कुछ घटनाओं या समस्याओं का ज़िक्र न हो बल्कि उनसे निपटने के साधन और समाधान भी बताए जाएं क्योंकि घटना का ज़िक्र तो समाचार पत्र भी करते हैं। बिल्कुल सही है ये, हम सभी को ऐसे मुद्दों को भी आगे लाना चाहिए जो समाज में कुछ सकारात्मक परिवर्तन ला रहे हों। ऐसा ही एक अति गंभीर और न के बराबर बात किये जाने वाला मुद्दा है “प्रकाशन जगत में रॉयल्टी का मुद्दा”

आज भी हमारे समाज में लेखकों, कवियों, रचनाकारों, और शायरों आदि से पूछा जाता है कि “आप और क्या करते हैं?” ये “और” शब्द यह बयां करता है कि लेखन अपने-आप में जीविका का साधन नहीं है।

ज़्यादातर देशों में ऐसा नहीं होता है, वहां राइटर होना अपने-आप में एक पेशा है। लेखकों से किसी अन्य पेशे में होने की उम्मीद करना हमारे देश में लेखन की सोचनीय एवं लेखकों की माली हालत का सुबूत है। हमारे बीच अनेक ऐसे साहित्यकार हुए हैं जो आर्थिक बदहाली में जीते हुए भी साहित्य की सेवा करते रहें लेकिन साहित्य सृजन से कभी इतना नहीं कमा पाए कि उनके घर पर रोज़ी-रोटी का इंतज़ाम हो सके। फलतः उन्हें अन्य वृत्तितों के सहारे अपना व अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

हम सभी जानते हैं कि देश के मानिंद लेखकों की भी आर्थिक हालत कुछ खास अच्छी नहीं रही है और यदि रही है तो उसका कारण उनका अन्य व्यवसाय या क्रिया से भी संबंधित होना है, अन्यथा की स्थिति में उनकी हालत से कोई भी अपरिचित नहीं है। प्रतिष्ठित प्रकाशकों की स्थिति धनकुबेर जैसी हो गयी है जबकि रचनाकारों को अपनी कलम का उचित मूल्य तक नहीं मिल पाता। अजीब स्थिति तो यह है कि तमाम रचनाकार स्वयं भी अपनी लेखनी से कमाई करने के विरोध में खड़े दिखाई देते हैं। हांलाकि यह तब कि स्थिति है जब लेखन के अतिरिक्त भी जीविकोपार्जन का साधन उपलब्ध होता है। तब उन्हें लगता है कि विद्या या माँ सरस्वती को बेचना पाप है। ऐसे तमाम लेखकों से मैं परिचित हूं जो बहुत अच्छा लिखते हैं पर अपने लेखन से धनार्जन के पक्ष में नहीं हैं।

वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जो फुल टाइम राइटर बनना चाहते हैं लेकिन हमारा समाज या यूं कहें कि प्रकाशक समाज उन्हें इतनी भी रकम नहीं देता कि वो जी-खा सकें। ऐसे में इलाहाबाद शहर के युवा शायर एवं कवि बागी विकास ने एक बीड़ा उठाया है कि वो रचनाकारों को उनका अधिकार यानि “रॉयल्टी” दिलाकर रहेंगे। इस कार्य को करने के लिए उन्होंने अपना स्वयं का प्रकाशन खोला है जिसका नाम है “वर्तनी पब्लिकेशन” (मैं इस प्रकाशन की सह-संस्थापिका भी हूं)।

यह पब्लिकेशन वर्तनी के प्रति अत्यधिक सचेत है और भाषा की शुद्धि पर ध्यान केंद्रित करती है ताकि लोगों को शुद्ध और सही रूप में भाषा का ज्ञान हो सके। विदेशी किताबों में भाषागत अशुद्धियां न के बराबर होती हैं जबकि इक्का-दुक्का प्रकाशनों को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी भारतीय प्रकाशन भाषाई अशुद्धियों के प्रति उदासीन दिखाई देते हैं, यह एक चिंतनीय विषय है।  इन सबके मद्देनज़र पचास प्रतिशत रॉयल्टी का मुद्दा उठाकर बागी विकास ने प्रकाशन जगत में हलचल मचा दी है क्योंकि अब तक प्रकाशक रचनाकारों को या तो फूटी कौड़ी नहीं देते थे या बड़े रचनाकारों को ज़्यादा से ज़्यादा दस प्रतिशत रॉयल्टी देते थे।

एक कवि और रचनाकार होने के नाते बागी विकास ने यह बीड़ा उठाया है और प्रकाशन जगत में अपनी पहचान तेज़ी से बना रहे हैं। वर्तनी पब्लिकेशन से प्रकाशित पहली साहित्यिक पुस्तक “खुरचन” ने काफी सराहना बटोरी और बिकी किताबों के अनुसार राइटर (अन्नू सिंह) को रॉयल्टी की रकम भी दी गई। यह एक सकारात्मक कदम है जो लेखन जगत में आवश्यक सुधार लाकर रहेगा क्योंकि साहित्य को संजोने के लिए साहित्यकार को संजोना आवश्यक है।

इस मंच से हम आप सभी युवा रचनाकारों को आपके अधिकार के प्रति जागरूक करते हुए आपसे यह कहते हैं कि आपका लेखन, आपका समय, आपकी बुद्धिजीविता अनमोल है जिसकी कीमत कोई भी नहीं दे सकता फिर भी आपको आपका अधिकार “रॉयल्टी” मिलनी ही चाहिए। आप सभी एकजुट होकर रॉयल्टी के मुद्दे पर बात करिये और वर्तनी पब्लिकेशन की इस पहल को सार्थक करने में अपना योगदान दीजिए। देश के सभी प्रकाशकों को यह बात समझनी होगी कि रचनाकार की आजीविका हेतु उन्हें उचित पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए।

वर्तमान समय में हमें बागी विकास जैसे युवाओं की ज़रूरत है जो इस तरह के अनछुए पहलुओं पर गौर करते हैं और रचनाधर्मिता के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए आगे आते हैं। इस मुहिम को जन-जन तक पहुंचाना और रचनाकारों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना ही मेरे इस लेख का उद्देश्य है, क्योंकि “रचनाकार का अधिकार है रॉयल्टी”

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