राजस्थान में सरकार हर बार क्यों बदलती है?

Posted by Anil Kumar
February 6, 2018

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राजस्थान में कई दशकों से ऐसे मुद्दे हैं जो आज तक सुलझ नहीं पाए। कर्ज़ में दबे किसानों की हालत बद से बद्तर होती जा रही है, वो  आत्महत्याएं कर रहे हैं। वहीं ज़्यादातर परिवार जो ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं उनकी पीढ़ियों के लिए अच्छी गुणवत्ता और बेहतर इनफ्रास्ट्रक्चर वाले स्कूलों की कमी। कई स्कूल ग्रामीण क्षेत्र की पहुंच से दूर हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित स्कूलों का इनफ्रास्ट्रक्चर और गुणवत्ता ऐसी नहीं है कि भविष्य में मुंह खोले खड़ी बेरोजगारी से देश के भविष्य को बचाया जा सके। इन मुद्दों पर राजनीति होती है, सत्ता और विपक्षी दल एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं। जो जनता में अविश्वास को पनपाता है।

पिछले कुछ वर्षों के विधानसभा चुनावों के नतीजों पर नजर डालें तो ये साफ तौर पर सामने आता है कि हर टर्म के बाद सरकार का बदलना जारी है। राज्य में 200 विधानसभा सीटें हैं।  वर्ष 2003 में 120 सीटें भाजपा ने जीतीं तो कांग्रेस के पास 56 सीटें आईं और बाकी पर अन्यों ने जीत दर्ज की। वर्ष 2008 में कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा औऱ करीब 96 सीटों पर विजय प्राप्त की तो वहीं भाजपा की झोली में करीब 78 सीटें आईं। वर्ष 2013 में भाजपा ने 162 सीटों के साथ भारी भरकम जीत दर्ज की। वहीं कांग्रेस के पास 21 सीटें ही रह गईं। इन परिणामों में कभी भाजपा सरकार बनाती है तो कभी कांग्रेस। हर पांच साल में कार्यकाल पूरा होने के बाद होने वाले चुनावों में कांग्रेस या भाजपा, दोनों में से एक पार्टी सत्ता पर काबिज हो जाती है।

राजस्थान में सरकार बदलने का सिलसिला इस तरह क्यों है जैसे कोई मनुष्य अपना वस्त्र धारण कर उसके बाद दूसरा वस्त्र धारण करता है। इस सवाल के जवाब में हमें थोड़ा मानवीय अर्थशास्त्र को समझना होगा। हर मनुष्य अपनी सूझ-बूझ से चीजों को चुनता है, लेकिन एक ऐसा समय आता है जब वो उससे असंतुष्ट होता प्रतीत होता है। यही असंतुष्ट होने की प्रक्रिया ही राजनीतिक पार्टी के चुनाव में राजस्थान में अहम भूमिका निभाती है। लेकिन इसका तात्पर्य ये नहीं कि सिर्फ यही एक कारण है। दरअसल, मूल कारण तो उस संतुष्टि की वजहों में छिपा है। मूल कारणों को जानने के लिए हमें जनता की असंतुष्ट होने की वजहों को टटोलना होगा।

पहली वजह

राजस्थान की करीब 7 करोड़ जनसंख्या में से करीब 75 फीसदी हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है। जिसके लिए बेहतर स्कूली शिक्षा नहीं है। ज्यादातर जनसंख्या का जीवन यापन करने का जरिया खेती है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले किसानों की खेती किसानी ग्लोबल वार्मिंग के चलते जलवायु के शुष्क होते जाने के कारण लगभग बर्बाद हो चुकी है। अच्छी उत्पादकता के लिए किसानों को इतना रुपया खर्च करने के साथ ही मेहनत लगानी पड़ती है कि उसकी तुलना में फसल की वाजिब कीमत मंडी में उन्हें नहीं मिल पाती। मिल भी पाती है तो लागत तक वसूल नहीं हो पाती। मजबूरन किसानों को कर्ज में दबना पड़ता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक  वर्ष 2017 के दौरान दो माह के भीतर ही 8 किसानों ने आत्महत्या की। वहीं इस रिपोर्ट रिपोर्ट के मुताबिक  वर्ष 2017 के बजट सत्र के दौरान गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बताया था कि 2008 से 2015 तक 2870 किसानों ने आत्महत्या की है। हालांकि वर्ष 2015 में आत्महत्या की संख्या तीन बताई। जो घटता हुआ है। लेकिन इसके विपरीत देखा जाए तो वर्ष 2017 में दो माह के भीतर 8 किसानों ने आत्महत्या कर ली।

दूसरी वजह

नई दुनिया में प्रकाशित रिपोर्ट 2017  कहती है कि  राजस्थान राज्य में  50 हजार 993 स्कूलों में 36 लाख 48 हजार 994 छात्र पढ़ते हैं। करीब 36 लाख छात्रों की आबादी पर करीब 50 हजार स्कूल और भी ऐसे राज्य में जो क्षेत्रफल के मामले में सबसे बड़ा है। एक तो स्कूलों की कमी और ग्रामीण इलाकों से स्कूलों का दूर होना और एक ही छत के नीचे खराब इंफ्रास्टक्चर के कारण छात्र प्रोत्साहित नहीं हो पाते।

बीबीसी में प्रकाशित रिपोर्ट  कहती है कि वर्ष 2014 में अकेले राजधानी जयपुर में ही कुल 71 स्कूलों में 9,399 नामांकन थे, जिसमें से 840 बच्चों ने मज़बूरी में स्कूल आना बंद कर दिया था।

इससे राजस्थान राज्य में अभिभावकों सहित दूसरे राज्य की ओऱ पलायन करना बदस्तूर जारी है। कुछ अच्छी शिक्षा के लिए तो कुछ रोजगार के लिए। कई किसान खेती को मजबूरन छोड़कर अन्य विकल्प तलाशते हैं। ये उन्हें असंतुष्ट करता है। जिसका परिणाम सरकार में कांग्रेस और भाजपा की रेस में किसी एक की जीत का कारण भी बनता है।

तीसरी वजह

कांग्रेस औऱ भाजपा के अलावा राजस्थान में कोई तीसरी पार्टी का अस्तित्व नहीं है। दशकों से कांग्रेस और भाजपा ही राजस्थान की राजनीतिक जमीन पर योद्धा साबित हुए हैं। कोई तीसरा विकल्प राजस्थान में अभी तक उभरकर सामने नहीं आया है। वहीं इन्हीं दोनों विकल्पों में जनता बेहतर विकल्प तलाशती है। जिससे इन दोनों पार्टियों में से किसी एक का सत्ता में आना तय होता है। ऐसे में पार्टियों के भीतर ही गुटबाजी शुरू हो जाती है। ये गुटबाजी मुख्यमंत्री बनने की रेस के लिए होती है। कांग्रेस में सीपी जोशी बनाम अशोक गहलोत और सचिन पायलट होता है तो भाजपा में वसुंधरा राजे सिंधिया बनाम गुलाब चंद कटारिया और अशोक परनामी। इन गुटबाजियों के चलते लोगों में अलग-अलग विचार बनते हैं, जिसका नतीजा वोट प्रतिशत के विभाजन के तौर पर नजर आता है।

चौथी वजह 

राजस्थान में जातिवाद भी एक अहम मुद्दा है। जिसको अभी हाल ही में अशोक गहलोत ने भी हवा देदी है। एक वीडियो में अशोक गहलोत ने भाजपा की वरिष्ठ लीडर और वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर आरोप लगाया है कि वे जातियों के हिसाब से लोगों से बात कर रही हैं और जातिवाद को भड़का रही हैं….

पूरा लेख यहां पढ़ सकते हैं –   https://www.ichowk.in/politics/either-congress-or-bjp-reasons-why-government-in-rajasthan-change-after-every-election/story/1/9798.html

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