वो वक़्त…

Posted by AK Singh
February 3, 2018

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ज़िन्दगी शायद चंद पलो की ही तो होती हैं, ऐसा हमे अक्सर लगता हैं पर उस वक़्त के बारे में हम सोचते हैं जब इस भीड़भाड़ में हम खुद को अकेला पाते हैं।चेहरे पर हंसी लिए हम दिन रात घूमते हैं पर वाकई वो असली हैं या हम मजबूर हैं, खुद से पूछ लिजिये शायद जवाब मिल जाये।

आज की इस आधुनिकता का हिस्सा हैं हम पर फिर भी अकेलेपन, डर और तनाव से ग्रसित हैं। हर दिन की वही दिनचर्या पर दोषी हर दिन कोई नया। हम इन चीज़ों से वाक़िफ़ भी हैं और हम अपनी समस्यायों को जानते भी हैं पर फिर भी उसका सामना हम नहीं कर पाते आखिर ऐसा क्यों होता हैं?

आधुनिकता के इस दौड़ में हमने खुद को कितना अकेला कर लिया हैं। घर में लकीरें नहीं हैं पर न जाने कितने घरो का बटवारा हमने किया हैं। वो अपराध की भावना से हम क्यों परेशान हैं? आपस के लोगो से वो चर्चा हम क्यों नहीं कर पाते हैं?

सवाल शायद खत्म ही न हो और हर कोई आके अपनी एक नई व्याख्या कर जाएगा पर जवाब हर किसी के नए हो आपके लिये। इन सभी का समाधान शायद हर किसी के लिये अलग हैं। हमे ये समझना जरूरी हैं कि कौनसे तरीके से हम खुद को खुश रख पाएंगे और अपने आप को उस सोच से दूर रख पायेंगे। सोचिये की आपको गाना पसंद हैं तो आप गाइये, उस वक़्त आप अपने सुर-ताल के बारे में मत सोचे बस गाते जाइये और खुल कर गाइये। आप बस ये सोचना शुरू करे कि मैं इन चीज़ों को पूरा कर सकता हूँ और बस जुड़ जाइये और जहाँ कही आपको लगे कि आप थक रहे हैं या आप नही कर पाएंगे बस थोड़े पल रुकिए और अपनी पसंदीदा शौक जिसमे आपका मन भरे नाकि दुसरो का वो करे। ये चींजे आपको तरोताज़ा रखेंगी और आप एक बार फिर अपने लक्ष्य को पाने में लग जाएंगे।

याद रखियेगा कोई और सिर्फ आपको कह सकता हैं मगर करना आपको हैं। अपने तरीके ढूढ़े और बस वही करें। दूसरों के शब्दों से आकर्षित हो मगर अपने जीवन में शब्दों के रंग खुद भरे और आप पाएंगे कि आपका वो बुरा वक्त भी ढल गया।

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