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हमारा रास्ता ग़लत है या नहीं, ज़रा सोचो तो सही

Posted by PREETY MAHAWAR
February 23, 2018

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कहने को यह दुनिया बड़ी खूबसूरत है लेकिन क्या हमने वाकई इसे खूबसूरत बोलने लायक छोड़ा भी है? मैं जानती हूँ आप सब के मन में एक ही जवाब है “नहीं”| सच ही तो है वहां खूबसूरती कैसे हो सकती है जहाँ बेईमानी, झूठ, लालच, हवस जैसे अनगिनत अपराध हर रोज़ खुले-आम होते हैं| ‘ग़लत’ का कोई पैमाना नहीं होना चाहिए| जो ग़लत है वो ग़लत है| लेकिन हमने खुद इसके हज़ारों पैमाने बना दिए और उसका नतीजा है की आज समाज में सभ्यता और संस्कार का नाम सुन कर खुश होने वाले भी सिर्फ चंद लोग ही बचे हैं| जहाँ श्री सीता-राम, श्री राधा-कृष्ण, चक्रवर्ती सम्राट परीक्षित, महान राजा भरत, पैगम्बर मुहम्मद साहब, असहायों के मसीहा इसा मसीह, दया की मूरत गौतम बुद्ध, संस्कारों के प्रचारक और प्रसारक तीर्थंकर महावीर जैन मुनि, करुणा के सागर श्री गुरु नानक देव जी महाराज, धर्म की दिवार गिराने वाले महान संत कबीर, आयुर्वेदाचार्य महर्षि पतंजलि, महाज्ञानी मार्कंडेय ऋषि, महान गार्गी-मैत्रयी, बाबा बुल्ले शाह, महर्षि चरक, चक्रवर्ती सम्राट अशोक, अद्वितीय साहस से भरे राजा समुद्रगुप्त, कालिदास जी महाराज और न जाने ऐसे अनगिनत महानुभावों ने जन्म लिया, उसी दुनिया में आज उनके पद चिन्हों पर चलने वाले कुछ मुट्ठी भर लोग ही शेष हैं|  

कितने शर्म की बात है आज लोग उपरी दिखावे के लिए इन्हें याद तो करते हैं लेकिन इनकी दी सीखों का पालन करना शायद भूलते से जा रहे हैं| सभी खुद को बड़े जानकार, समझदार और परम ज्ञानी समझने लगें हैं| उन्हें अक्सर ऐसा लगता है की जो वे कहते हैं वो ही सही है, बाकी तो सिर्फ गाल बजाते हैं| खुद की सोच को इतना संकुचित और सीमित कर लिया है की वे अपने उस आधे-अधूरे ज्ञान को बढ़ाने की कोशिश ही नही करते| वो जो कहें वो सही, जो सुने वो सही और उनसे भी बड़ी बात की वो जो ‘समझे’ ‘वही’ सही| यहाँ काबिलेगौर है की ऐसे लोगों के काफी यार-दोस्त भी होते हैं जो इतने ही थोथे और अल्प मानसिकता के होते हैं| ‘थोथा चना बाजे घणा’ बस यही हाल है इस खूबसूरत समझी जाने वाली दुनिया के लोगों का|

हमें इन सब से बाहर निकलने की ज़रूरत है| यह समझने की ज़रूरत है की हमारे लिए क्या सही और क्या गलत है| अपनी ज़िन्दगी को लेकर हमारी प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए इस बात का हमें स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए| बात भारत की हो या अमेरिका की युगांडा की हो या ब्रिटेन की, लगभग हर देश में ज़्यादातर युवा नशे के आदि हैं| कोई सुट्टे के धूएँ में समाया हुआ है तो कोई बियर की चुस्कियों में, किसी को फायर शॉट्स का चस्का है तो किसी को टकीला शॉट्स अपनी रईसी का गुमान लगते हैं, कोई ड्रग्स की लत में बर्बाद हो चुके हैं तो कोई बीड़ी, सिगरेट, पान और खैनी से खुद को बीमार कर रहें हैं| बेशर्मी की हद्द तो तब हो जाती है जब खुद को बड़े, आदरणीय, इज्ज़तदार, पढ़े-लिखे, समझदार, बुद्धिजीवी समझने वाले हमारे बड़े ही जब खुले आम नशा करते हैं, अपने बच्चों के सामने ही रम के पेग लगते हैं और उनसे उमीद्द करते हैं की उनके वो ही बच्चे उनकी इज्ज़त्त करे और कोई गलत काम न करें| उन महान बड़ों को यह समझना होगा की नशा करने से बड़ी गलती उससे बड़ा पाप कोई और नहीं|

क्योंकि इसी नशे से हर रोज़ हज़ारों घर टूट रहे हैं, लाखों युवा पथभ्रमित हो रहे हैं, उन्हें अपनी तनहाइयों का सिर्फ एक ही मर्ज़ समझ आता है और वो है नशा, करोड़ों लोग हर रोज़ नशे के कारण मर रहे हैं, लोग अपने असली लक्ष्य को भूल कर अपनी ज़िन्दगी को नरक में झोंक रहे हैं, उन्हें धर्म ग्रथों को पढना वेस्ट ऑफ़ टाइम लगता है और इन्टरनेट मेमिज, उसमे परोसा जाने वाला पोर्न बड़ा अच्छा लगता है, और ऐसा करने वाले खुद को धार्मिक बोलने से भी नहीं चूकते, नशे की वजह से सबसे ज्यादा समाज से संस्कारों और सभ्यता की परंपरा लगातार बिलकुल खत्म सी हो रही है|

कॉलेज तो बहुत छोटी बात है अब तो स्कूलों में भी छोटे-छोटे बच्चों की गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड्स बनना आम हो चुका है| स्कूल/कॉलेज में बच्चे पढाई से ज्यादा अश्लीलता और टपोरी भाषा को ज्यादा तवज्जों देते हैं| न बोलने का सलीका न समझने और सीखने की चाह| हमें यह सोचना है की हम युवा ही इस दुनिया का आज और सुनहरा भविष्य है| हमें चाहिए की हम हर उस चीज़ का बहिष्कार करे जो हमें गुमराह करती है| फिर चाहे वो नशा हो, बुरी संगत हो, बुरी सोच हो या फिर कुछ ऐसा जो सभ्यता और संस्कारों के विपरीत हों|

और ऐसा तभी होगा जब हम अपने ज्ञान का दायरा बढ़ाएंगे, जब हम वास्तविक बुद्धिजीवियों से मिले, उन्हें सुने, उन्हें पढेंगे, जब हम हर इंसान की बुराइयों को दरकिनार कर उनकी अच्छाइयों को अपनाएंगे, जब हम स्वयं गलत और सही का भेद समझेंगे| हम सबल तब ही बन पाएंगे जब हम वाकई अपने माँ-बाप, अपने समाज, अपने देश और खूबसूरत दुनिया से निःस्वार्थ भाव से प्रेम करें| बेईमानी का चोला उतारकर इमानदारी को अपनी ज़िन्दगी में शामिल करें| हम स्वावलंबी तभी बनेंगे जब इन्टरनेट पर बैठे फालतू कामचोरो की थ्योरीज लाइक करने से ज्यादा अपने इतिहास, अपने ग्रंथों और अच्छी किताबों को अपना दोस्त बनाएंगे| यदि हमने आज से बल्कि अभी से ऐसा करना शुरू किया तो न सिर्फ हम, हमारा परिवार, समाज, देश बल्कि यह पूरी दुनिया सही मायनों में खूबसूरत हो जाएंगे और ज़रूर होंगे|

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