•विचार मंथन•अभी तो पार्टी सुरू हुई है।

Posted by pro.abhishek_chimankar
February 14, 2018

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सीनेट परिवर्तन पैनल का जन्म होने से,साथ ही उसमें जीत का शहरा बांध लेने से आंबेडकरी यूथ में एकता के साथ ही नवचेतना का भरपूर संचार हुआ। आंबेडकरी यूथ की ओर से ये शब्द अभी सुने जा सकते है कि अभी तो पिक्चर सुरु हुई है,इस तरह एलगार के शब्द आने वाले चुनाव में मास्टर स्ट्रोक की तरह काम कर सकते है। एक साथ होकर विजय प्राप्त करना,इस तरह का प्रयोग आंबेडकरी समाज के लिए कुछ नया नहीं है, परंतु संघटित होकर संघटन को मजबूत रखना यह कार्य आंबेडकरी युवाओं के लिए सबसे बड़ा आव्हान रहा है, चुनाव के पश्चात हमारे लिए हमारी एकता को टिकाए रखना हर बार हमें अयशस्वी साबित करता आया है,इसमें शक की भावना,भेदभाव,साथ ही प्रतिस्पर्धा, और उसमे अपने संघटन को टिकाए रखने हेतु जो स्पर्धा चल रही है,आे आंबेडकरी समाज की राजकीय अधोगति का कारण बनती नजर आती है।आंबेडकरी समाज अपने विरोधियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने बजाए स्वत: ही आपस में प्रतिस्पर्धा का दौर चला देता है, जिसमे वह स्वतः के समाज को अत्यधिक व्यस्त रखता है जिससे समाज का राजकीय विकास साथ ही सामजिक स्तर और आर्थिक और धार्मिक अस्तित्व को धोका निर्माण होता है ।आंबेडकरी समाज के हर संघटन को जीवित रख पाना सर्वसामान्य जनता की शक्ति से परे है,आंबेडकरी समाज के अंदर जितने भी संघटन है,उन्होंने हमेशा ही राजनैतिक तौर पर आंबेडकरी पक्ष को आर्थिक तौर जीवंत रखने हेतु,नौकरदार वर्ग की बामसेफ ने,हमेशा ही अपनी अहम भूमिका निभाई है। आंबेडकरी समाज के अंदर नौकर वर्ग ने हमेशा से ही आंबेडकर के नाम जितने भी अलग अलग संघटन है ,उनका हमेशा ही आर्थिक तौर पर साथ दिया है, जिससे यह अनेक संघटन आज भी जीवित बचे हुए है, यथार्थ तौर पर कहा जा सकता है कि – इन नौकरदार वर्ग के कारण ही आंबेडकरी समाज के आंदोलन का रथ आगे नहीं ले जाया सकता है। इसके साथ ही जो बामसेफ अनेक टुकड़ों में जिस तरह बटा है और जिस तरह आंबेडकरी संघटन अनेक गटो में आज बटे है,उनकी नाल अगर बामसेफ अपने हाथो में ले लेती है,तो सभी संघटनों को एक छत्र के नीचे लाया जा सकता है,और साथ ही इन पर नियंत्रण करने वाली एक प्रभुसत्ता का निर्माण किया जा सकता है। आंबेडकरी समाज का युवा वर्ग जिस तरह आज भ्रम की भांति देखता है,और जिस तरह अस्तव्यस्तता का उसमे निर्मान हुआ है, यह प्रभुसत्ता ही उसे खत्म कर आंबेडकरी युवाओं में नवचेतना का उत्स्फूर्त ताकत का निर्माण कर सकती है,हमारे अस्तित्व का प्रभाव हमारे बटे हुए समाज को फिर से आत्मबल से जीवित कर सकता है। हमारे एकता के प्रभाव से ही हमारे जब विरोधको में, जिस तरह भय का संचार हुआ,वहीं हमारे लिए हमारी जीत का कारण बना और उसी समय असल में हमारी जीत हुई,फिर भी विजय का आस्वाद यह निर्णय पर ही, चखा जा सकता है, फिर भी हमारे लिए विजय और पराजय उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी,फिर भी हम सभी एक साथ मैदान में हमारे वीरोधको से एक साथ लडे,उस सनातनी व्यवस्था के विरूद्ध एकता कि मशाल जलाई ,और उस मशाल को ज्वलंत रखना हमारा पहला ध्येय होना चाहिए, हमने एक क्रांतिकारी नारा दिया,”आता पर्यन्त लढलो बेकिने – पण आता लढू एकीने” इस तरह की गम्भीरता को हमने हमारे रक्त संचार में अगर नहीं उतारा तो हम वाकई में भीम के लगते जिगर नहीं हो सकते है,और सनातनी व्यवस्था जिस तरह हमपर आधे इधर और आधे उधर बोलकर हस्ति है,और हमारी लाचारी का भरपूर फायदा उठाती है। आंबेडकरी विचार ही सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धा, इस सनातनी व्यवस्था का बन सकता है,इस विचार को सिद्ध करने का अवसर हमें इस विजय से प्राप्त हुआ है, परंतु एकता कि जो नाल बांधने में अगर हम अयशस्वी सिद्ध हुए तो हमारा भविष्य आंबेडकर के सोचे हुए   समाज और विचारो का नहीं रहेगा, इस पर धार्मिक,राजकीय,आर्थिक,सामाजिक और शैक्षणिक गुलाम बनाने का प्रयत्न बड़े पैमाने पर जबरदस्त सुरु है,”हम बचेंगे तो लड़ेंगे” यही बोलकर हम सभी को एकत्र आना होगा,और खुद को बचाने हेतु एकसाथ लडना होगा,यही इस काल की परिस्थितियां है। सम्पूर्ण जगत में वैज्ञानिकवादी विचारो का समुद्र होने के पश्चात भी हमारी अधोगति क्यों ? इस पर गहन अध्ययन हमें करना होगा। यह जो विजय हमे प्राप्त हुआ है यह हमारे समाज को मिला हुआ अवसर है,और इस अवसर को हमने स्वर्णिम क्षणों में नहीं बदला तो हमारा आनेवाला भविष्य आंबेडकरी समाज के सामने बहुत बड़े प्रश्नों का निर्माण कर,प्रश्नचिन्ह खड़ा करेगा। जो झुकता है उसका सर कलम किया जाता है,जो लड़के मरता है,उसे शहादत दी जाती है।उसे ही इतिहास में जगह मिलती है,जो लड़ता है। हम लडे और हमने पहली बार नागपुर के इतिहास में जीत का परचम लहराया,यह जीत हमारे विचारो की है, यह जीत हमारे अस्तित्व की है,यह है,यह जीत हमारे अस्तित्व को जगाने की है,हम जागे जरूर,पर अब सबेरा बाकी है,  ‘कि अभी तो पार्टी सुरु हुई है’।

यह लड़ाई प्रतिस्पर्धा में संख्या बढ़ाने की कतई नहीं थी,बल्कि दो विचारधाराओं के प्रभाव की थी।

यह लड़ाई आंबेडकरी एकता और उसके विचारो की आत्मीयता जागरूक करने की थी,और यही हमने करके दिखाया,इस विजय के आगाज से हमने एकता की मिशाल कायम कर,आे ताकत हमने पैदा की है,

परंतु कहते है न कि बुरी नजर नहीं लगनी चाहिए,

उसी भांति यह कहावत यहां भी उसी तरह लागू होती है,फिर भी प्रयत्नों की गगन चुंबी मिशाल हमें कायम रखनी है,और इस नीले तूफ़ान का चक्रव्यूह जिस तरह बटे हुए गुटों की सीमा तोड़ कर आगे बड़े,

उसका आज समय आ गया है।

नीले सुनामी का तूफ़ान और उसका प्रभाव देश की एकता और उसकी अखंडता,साथ ही स्वतंत्रता, समता,बंधुभाव और न्याय का राज्य स्थापित करने में इसका उपयोग पुरेपुर तरीके से होना चाहिए,

तभी इस नीले तूफ़ान के माध्यम से न्यायवादी राज्य सम्पूर्ण भारत वर्ष में निर्माण होने से कोई सत्ता रोक ना सकेगी,लेकिन घर का भेदी लंका ना ठहा दे ऐसा होने भी न पाए।

 

प्रा.अभिषेक चिमनकर

abhishekchimnkar@gmail.com

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