“लड़की की चीख सुनकर हमने कंप्लेन की, दिल्ली पुलिस मदद की जगह फोन पर वक्त बर्बाद करती रही”

Posted by Aaryan Chandra Prakash in Hindi, My Story, Society, Staff Picks
February 20, 2018

यह कल (19 फरवरी) देर रात की घटना है, दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित उर्दू हेरिटेज फेस्टिवल से मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ लौट रहा था। हम लोग राजीव चौक से करोल बाग की तरफ जाने वाली सड़क पर टहल रहे थे कि अचानक हमें कहीं से किसी लड़की के चीखने की आवाज़ सुनाई दी। सड़क सुनसान ही थी और एकाध लोग ही आस-पास थे। हम सभी दोस्त इधर-उधर कौतूहल भरी नज़रों से देखने लगे।

हमने देखा कि एक ऑटो हमारी तरफ आ रहा है, लड़की के चीखने की आवाज़ भी ऑटो के अंदर से ही आ रही थी। हम आंखें फाड़कर ऑटो के अंदर देखने की कोशिश करने लगे और ऑटो एक पल में आंखों से ओझल हो गया।

हमने केवल इतना देखा था कि ऑटो के अंदर बैठी लड़की किसी से हाथ छुड़ाने का प्रयास कर रही थी और ज़ोर-ज़ोर से चीख रही थी। अब चूंकि ऑटो के अंदर अंधेरा भी था तो दृश्य के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता, सिवाय इसके कि लड़की के चीखने की आवाज़ ही दृश्य को समझने के लिए पर्याप्त थी।

हममें से एक दोस्त ने जल्दी से पुलिस को कॉल कर दिया। जब तक ये सब नहीं हुआ था, हम सभी खूब मस्ती कर रहे थे और जैसे ही यह घटना घटी, रात की सन्नाटे में हमारी मस्ती भी शांत पड़ गई। जैसे अब भी उस अंजान लड़की की चीख हमारे कानों में गूंज रही हो। दोस्त ने पुलिस को घटना के बारे में बता दिया था और हम लोग आगे न जाकर वापस फिर से राजीव चौक की ओर लौटने लगे।

रात के आकर्षण में और कार्यक्रम के बारे में बातचीत के खयाल से थोड़ा और टहलने के लिए हम लोग राजीव चौक से करोल बाग की तरफ जो रोड जाती है, उधर की तरफ निकले थे, जब ये सब हुआ। पुलिस को दोस्त ने यही बताया था कि हमारे सामने से एक ऑटो गुज़रा है और उसमें से किसी लड़की के चीखने की आवाज़ आ रही थी। पुलिस ने कुछ और बाते पूछी और फिर फोन कट गया।

अचानक से हमें मानवता का अलग रूप दिखा था। दुनिया दिन में जैसी होती है, रात उससे ज़्यादा सफाई से मानवता का घृणित रूप दिखाती है।

हम सभी दोस्त घटना के अलग-अलग आयाम और संभावनाओं पर बात करते हुए अब नई दिल्ली की ओर आने लगे। अभी राजीव चौक के आसपास ही थे कि पुलिस ने कॉलबैक किया। उन्होंने पहले नाम पूछा और फिर पूरी डीटेल्स। हमने सब बता दिया। थोड़ी दूर जाने के बाद पुलिस ने फिर से फोन किया और पूछा, “एग्जैक्टली आपने क्या देखा था?”

दोस्त ने एक बार फिर से पूरा माजरा बताया। खैर, जब हम मिंटो रोड के पास थे तो फिर से पुलिस का फोन आया। इस बार उन्होंने हमारे पूरे बैकग्राउंड को जानना चाहा। दोस्त ने थोड़ा ऐतराज़ जताया कि बजाय उस लड़की की मदद करने के वह हमसे पूछताछ कर रहे हैं। इस पर फोन पर मौजूद पुलिस कर्मचारी ने व्यंग करते हुए कहा, “अब ज़िम्मेदार नागरिक बने हो तो ज़िम्मेदारी निभानी भी तो पड़ेगी!”

यह हमारी महान व्यवस्था की नामी पुलिस थी। उन्होंने सब कुछ पूछा, केवल बाप का नाम नहीं पूछा। फिर पूछते हैं, “तुम लोग कहीं पिये तो नहीं हो?” अब इसका क्या जवाब दें।

फिर उन्होंने पूछा अभी कहां हो? दोस्त ने कहा, “हम नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन के पास पहुंचने वाले हैं।” इस पर उधर से उन्होंने कहा, “गेट नंबर बताओ?” दोस्त ने कहा, “पहुंच कर बताता हूं।”

हमने नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर चार से पुलिस को कॉल किया और उन्हें बता दिया कि वे यहां आ जाएं। हमारे लिए यह कौतूहल का विषय था कि आखिर पुलिस हमारे पीछे क्यों पड़ी है, जबकि हमने तो किसी की मदद ही करनी चाही! कहीं न कहीं पुलिस के साथ हुए कन्वर्सेशन को पढ़ना आपके लिए भी इरिटेटिंग होगा, पर जरा सोचिए कि उस वक्त हमें कैसा फील हुआ होगा? और क्या आपको लगता है कि पुलिस के ऐसे रवैये के बाद कोई किसी की मदद करना चाहेगा या कोई पुलिस के पास मदद के लिए जाएगा।

अब बताइए, पुलिस बीस-पच्चीस मिनट बाद भी फोन करके हमसे एक ही बात पूछ रही थी जो हमने उन्हें पहली कॉल में ही बता दी थी। कुछ भी हो सकता है, वो गुंडे अब तक जाने कहां के कहां निकल गए होंगे, न जाने वह लड़की किस हाल में होगी? पर बजाय आपस में कॉर्डिनेट करके उस लड़की को बचाने के, पुलिस कर क्या रही थी? हमें बार-बार फोन करके हमारे पूरे बायोडेटा को लिख रही थी।

इसमें कोई संदेह नहीं कि पुलिस का यह रवैया भयानक होता है, वह अपनी इन बातों से डराती भी है। फिर क्यों कोई किसी की मदद करेगा?क्यों कोई खुद पुलिस के पास मदद के लिए जाएगा?

पिछले तीन साल से कुछ ज़्यादा समय में चोरी व स्नैचिंग के अलग-अलग मामलों में मैं और मेरे दोस्त पुलिस स्टेशन के चक्कर काटते रह गए लेकिन उन्होंने हमारी कोई मदद नहीं की। इस घटना में भी हमें पुलिस का वही रवैया देखने को मिला।

अब शायद दिल्ली पुलिस को सहयोग करने का ढोंग बंद कर देना चाहिए। पूरे दिन रेडियो पर दिल्ली पुलिस की तारीफ में अनाप-शनाप ऐड आते रहते हैं, जबकि यह बहुत कम पीपल फ्रेंडली हैं। आपने अनुराग कश्यप निर्देशित “रमन-राघव” फिल्म का “सच्चा बेहूदा” गाना सुना है क्या? अगर हां तो आज फिर से सुनिए, अगर नहीं तो फिर आज सुन ही लीजिये।


एडिटर्स नोट: इस मामले की जानकारी के लिए हमने आज दिल्ली के मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन में फोन किया। वहां से जानकारी मिली कि इस घटना की जांच एस.आई. करन सिंह कर रहे हैं और जिस ऑटो का इस स्टोरी में ज़िक्र किया गया है, वह अभी भी  ‘अनट्रेस्ड’ है। (बातचीत किए जाने का समय- 2:15 pm; 20-02-2018)

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