“दिशा की जल्द शादी न हुई होती तो हमारी दोस्ती बरकरार रहती”

दीपा:

हमारा रोज़ का रूटीन था- एक साथ जाना, एक साथ खाना, एक साथ घर आना। दिशा बीमार पड़ जाती तो मैं भी स्कूल नहीं जाती। अगर मम्मी कभी भेज भी देती तो स्कूल में मन नहीं लगता। जब मैं पांचवी क्लास में पढ़ती थी तो वह एक बार बहुत बीमार पड़ गई, इस वजह से उसने स्कूल जाना छोड़ दिया था। मैं रोज़ उससे मिलने जाती, दिशा का इस तरह लेटे रहना मुझे अच्छा नहीं लगता था। जब स्कूल में सब बच्चे लंच कर रहे होते थे, तब मैं अकेली एक डेस्क पर बैठी रहती। इस तरह एक महीना बीत गया। मुझे बाद में पता चला कि उसे टाइफाइड हो गया था।

हम दोनों बड़े होने लगे थे और आठवीं क्लास में हमारा सेक्शन अलग-अलग हो गए। मेरे पीछे वाली क्लास दिशा की थी, जब मेरा पीरियड खाली होता तो उसकी क्लास होती और जब उसका पीरियड खाली होता तो मेरी क्लास लगी होती। इस वजह से हम एक-दूसरे से मिल नहीं पाते थे, लंच टाइम ही हमार सहारा था जिसमें हम एक-दूसरे से मिल पाते थे। जिस दिन हम खाना नहीं लाते थे उस दिन ग्राउंड में घूम-घूमकर बातें करते। लंच के खत्म होने की घंटी बजती तो सबसे पहले मुंह से निकलता- “कितनी जल्दी बंद हो गई आधी छुट्टी!” हमें जितना वक्त मिलता उतना कम था।

सालों तक ऐसे ही चलता रहा, 12वीं पास करने के बाद हम कॉलेज जाने के बारे में सोचने लगे। कॉलेज के बारे में सुनती थी कि कॉलेज की लाइफ बहुत अच्छी होती है, नए-नए दोस्त बनते हैं। कोई भी ड्रेस पहन कर जाओ कोई नहीं रोकता। लाइफ को नए तरीके से जीने का मौका मिलता है।

जब पता चला कि एडमिशन शुरू हो गए हैं, तो पापा ने कहा कल जाकर फॉर्म भर देना। मैं तुरंत दिशा के घर गई तो देखा उसके पापा टीवी देख रहे थे और उसकी मम्मी बगल में बैठकर सिलाई कर रही थीं। दिशा ने उनसे दबी आवाज में कहा, “मम्मी, कॉलेज के एडमिशन चालू हो गए हैं, दीपा के मम्मी-पापा ने तो हां कर दी है और यह कल फॉर्म भरने जा रही है।” यह सुनकर उसकी मम्मी ने उसके पापा की ओर देखा और उसके पापा ने कहा, “चलो ठीक है, तुम भी करवा लो।” यह सुनकर मैं और दिशा बहुत खुश हो गए।

अगले दिन हमने अपने और साथियों के साथ जाकर एडमिशन करवा लिया। अब हम उस दिन के इंतज़ार में थे जब हमारी क्लास शुरू होनी थी। हर दिन कुछ न कुछ सुनने को मिलता था कि कॉलेज से मैसेज आएगा और आपको किस कॉलेज में और कब जाना है। यह मैसेज एक-दो महीने में आ सकता है, ऐसा लोग बताते थे। हमारी पढ़ाई सिर्फ संडे को होगी, क्योंकि हम नॉन कॉलेज से पढ़ाई करेंगे रेगुलर से नहीं।

मेरा और दिशा का मिलना-जुलना अब कम हो गया था। एक दिन शाम के वक्त वह मेरे घर आई ओर मुस्कुराते हुए कहने लगी, “तुझे पता है मेरे कॉलेज का मैसेज आ गया। मेरे कॉलेज का नाम हंसराज कॉलेज है।” मैंने कहा, “यार मेरा तो अभी तक नहीं आया।” अगले दिन दोपहर को पापा का फोन आया कि तुम्हारा कॉलेज का मैसेज आ गया है। दिशा और मेरा नाम एक ही कॉलेज में आया था। उसने कहा, “चल अब संडे से दोनों साथ चलेंगे! तू क्या पहनेगी उस दिन?” मैंने कहा, “जींस टॉप खरीदूंगी, वही पहनकर जाउंगी।” वह बोली, “मैं भी जींस टॉप पहनूंगी।” एक ही कॉलेज में हमारे नाम आने से मम्मी-पापा सब खुश थे।

अब बस संडे का इंतज़ार था जो पांच दिन बाद आने वाला था। इन पांच दिनों के अंदर कपड़े, पर्स सब कुछ लेना था। शनिवार रात के आठ बजे दिशा मेरे घर आई ओर बोली, “क्या-क्या लेकर जाना है?” मैंने कहा, “मैं तो एक डायरी, पेन ओर लंच बॉक्स ले जाउंगी और तुम भी यही रख लेना। कॉलेज के लिए सुबह 7.30 बजे निकल जाएंगे। अभी तो पता नहीं कितना टाइम लगेगा, पहला दिन जो है। कल कॉलेज जाने के बाद ही पता चलेगा टाइम का।” रात को ही हमने सब कुछ तैयार कर लिया।

सुबह आंख जल्दी खुल गयी, नहा-धोकर मैं पूरी तरह तैयार हो गई। मम्मी ने मेरा टिफ़िन तैयार कर दिया था, दिशा अपने पापा के साथ मेरे घर आई। हम दोनों कंधे पर बैग टांगकर निकल पड़े। स्टैंड पर खड़े होकर हम दोनों बस का इंतज़ार करने लगे, बस आई और हम बस में बैठ गए। जब हम कॉलेज पहुंचे तो कॉलेज के बाहर बहुत भीड़ थी। 9.00 बजते ही कॉलेज का छोटा गेट खुला और एक मैम चेहरे से रौब झलकाती हुई हर बच्चे का आई-कार्ड चेक करके उन्हें अंदर भेज रही थी।

स्कूल से अलग कॉलेज की मस्ती अच्छी लग रही थी, दिशा के साथ आते-जाते, बातें करते ऐसे ही दिन बीत रहे थे। इधर कुछ दिनों से दिशा कॉलेज भी नहीं आ रही थी। एक दिन दिशा की बहन से एक खबर मेरे कानों में पड़ी कि उसकी शादी होने वाली है, यह सुनकर मुझे बिल्कुल यकीन नहीं हुआ, क्योंकि अभी वह 18 साल की ही है।

अगली सुबह मैं उसके घर गई तो वह टी.वी. देख रही थी। मैंने उससे कहा, “यार तेरी बहन कह रही थी कि तेरी शादी होने वाली है। तूने मुझे बताया भी नहीं।” मैं उस पर बरस पड़ी, “तू मुझे अपना नहीं मानती, तभी तूने मुझे नहीं बताया!” वह कहने लगी, “मुझे पता नहीं था कि वे आएंगे, कल वो आए भी थे।” मैंने कहा, “यार तू इतनी जल्दी शादी क्यों कर रही है?” उसने कहा, “अभी बस बात चल रही है पर शादी तीन साल बाद होगी, अभी बहुत दिन है।” उसकी बातों को सुनकर मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि एक वही मेरी पक्की दोस्त थी जो मुझे समझती थी।

वह अपनी शादी को लेकर बहुत खुश और मस्त थी पर मैं दु:खी, क्योंकि वह बस उनकी बात करती या फिर फ़ोन पर लगी रहती। जब भी मैं उससे मिलने उसके घर जाती थी तब मैं देखती थी कि वह कान में फ़ोन लगाए हंस-हंस कर बातें कर रही है। मैं उसकी मम्मी के पास बैठी कानों से उनकी बातें सुनती और उसे गौर से देखती, जब बोर-सा महसूस करती तो चुपचाप घर आ जाती।

अब उसके पास मेरी बातें सुनने का वक्त नहीं था। हम जब भी साथ-साथ कॉलेज जाते तो वह उन्हीं की बातें बताती- वे ऐसा बोलते हैं, वे यह कहते हैं, वे मिलने आए थे और भी पता नहीं क्या-क्या कहती जाती थी। मैं उसकी बातें सुन-सुनकर इतनी बोर हो जाती कि इधर-उधर देखने लगती। मुझे जलन-सी महसूस होती क्योंकि वह हमेशा उनकी तारीफ करती रहती थी। वह कॉलेज की क्लास भी अटैंड नहीं करती, बस बातों में लगी रहती। मैं भी उसे अकेला छोड़कर अपनी क्लास अटैंड करती।

कुछ महीनों बाद उसकी बहन से पता चला कि फरवरी में दिशा की शादी है, कार्ड भी छप गए हैं। शादी गांव में है क्योंकि उसका पूरा परिवार वहीं रहता है। मैंने कहा, “लेकिन तेरी बहन तो बोल रही थी कि तीन साल बाद शादी होगी, इतनी जल्दी क्यों?” वह बताने लगी, “शादी अभी कर देंगे और जब तक पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती तब तक दीदी हमारे साथ रहेगी। जीजू भी यही कह रहे हैं कि आगे की पढ़ाई मैं करवा दूंगा, इसलिए सब तैयार हो गए, दिशा दीदी को भी कोई ऐतराज़ नहीं है। वह इस फ़ैसले से बहुत खुश है।”

यह सुनकर मैं सोचने लगी कि दिशा को क्या हो गया है, पहले तो बड़ी-बड़ी बातें करती थी कि मैं ये करूंगी, वो करूंगी। अब क्या हो गया इसे?
धीरे-घीरे हमारी बात बंद हो चुकी थी, शायद इसी चक्कर में वह मुझे शादी का कार्ड भी देने नहीं आई। कुछ हफ्ते बाद वह शादी करके गांव से लौटकर दिल्ली आई। मैंने एक बार सोचा कि मिलकर आती हूं, फिर सोचने लगी अभी नहीं फिर कभी।

एक हफ्ते बाद मैं उससे मिलने उसके घर गई, वह टी.वी. देख रही थी। उसे देखकर मैं थोड़ी-सी खुश थी क्योंकि वह बहुत सुंदर लग रही थी। उसके पास बैठते हुए मैंने कहा, “यार इतने दिन हो गए और तू मेरे घर नहीं आई, क्या हुआ?” वह बोली, “कुछ नहीं, अभी मैं कहीं नहीं जाती।” मैंने कहा, “क्या हुआ? तू मेरे घर तो आ ही सकती है और बता सब ठीक है न?”

मैंने उससे उसकी ससुराल के बारे में पूछा, उसके पति के बारे में बात की लेकिन वह बहुत चुप थी। मैंने बात बदलते हुए कहा, “पता है, अप्रैल में हमारे फर्स्ट इयर के पेपर होने वाले है, तैयारी भी करनी है। ये भी नहीं पता कि सेंटर कहाँ पड़ेगा और तू बता सब ठीक है घर में?” वह कुछ भी नहीं बोल रही थी, मैं जो पूछती बस उसी का चुपचाप जवाब देती। आज वह पुरानी वाली दिशा नज़र नहीं आ रही थी।

एक दिन अचानक वह मेरे घर आई और बोली, “दीपा, परसों हिंदी का पेपर है, डेट शीट निकलवा ली? चल निकलवा ले, मैं भी निकलवाने जा रही हूँ।” मैंने घर से पैसे लिए और हम जल्दी से एक कैफे में गए, वहां बहुत भीड़ थी क्योंकि सब अपनी डेट शीट निकलवाने आए हुए थे। मन में टेंशन थी कि पता नहीं सेंटर कहां पड़ेगा। जब डेट शीट निकलवाई तो देखा हम दोनों का सेंटर एक ही जगह पड़ा था। मैंने अपने घर में यह बात बताई तो पापा कहने लगे, “तुम्हारे साथ मैं जाऊंगा।”

पेपर वाले दिन जब वह मेरे घर आई तो बोली मेरे पति भी चल रहे हैं। मैंने कहा, “अरे पापा तो जा रहे हैं न हमारे साथ, तो ये क्यों जा रहे हैं?” जितने दिनों तक पेपर हुए हम साथ जाते तो थे लेकिन बस में एक-दूसरे के पास नहीं बैठ पाते थे और न ही बात कर पाते थे क्योंकि उसके पास उसका पति ही बैठता था। वह उसको कभी अकेला नहीं छोड़ता।

सब कुछ बदल गया था – उसका हंसना, बोलना, बात करने का तरीका। अब वह बहुत चुप रहने लगी थी। इसी बीच वह एक प्यारे से बच्चे की मां भी बन गई, उसकी ज़िम्मेदारियां बढ़ गई। मुझे हमेशा लगता है कि उसने सही नहीं किया इतनी जल्दी शादी करके। उससे मिलना अब बिल्कुल खतम हो गया था, उड़ती-उड़ती खबर मिली कि उसकी अपने पति से नहीं बनती और वह अलग होने की सोच रही है।


 

दीपा, 19 साल की हैं, खिचड़ीपुर में रहती हैं। पिछले पांच सालों से अंकुर कलेक्टिव से जुड़ी हैं। इन्हें किताबें पढ़ने और लिखने का शौक है।