भारत ही नहीं चीन में भी आसान नहीं है समलैंगिक जोड़ों के लिए प्यार की राह

Posted by Rachana Priyadarshini in GlobeScope, Hindi, LGBTQ, Society
February 17, 2018

हमारा समाज आज भी समलैंगिकता को स्वीकार नहीं कर पाया है। समलैंगिक समुदाय के लोगों को हमारे यहां अपराधी की नज़र से देखा जाता है। इस नज़रिए की वजह से हर साल सैकड़ों-लाखों ज़िंदगियां बर्बाद हो जाती हैं। न जाने कितनी शादियां टूट जाती हैं और कितने पति-पत्नी साथ रहते हुए भी अंजानों की तरह ज़िंदगी बिताने पर मजबूर हो जाते हैं।

समलैंगिक रिश्ते छुपाने के लिए चीन में हो रही हैं फर्ज़ी शादियां

कुछ समय पहले एक खबर आई थी कि समलैंगिक रिश्तों को छिपाने के लिए चीन में फर्जी शादियां हो रहीं हैं। कारण कि चीन में भी भारत की तरह समलैंगिक विवाह गैर-कानूनी है और समलैंगिकता अभी भी एक टैबूड सब्जेक्ट है। ऐसे में समलैंगिक जोड़ों के ऊपर सामाजिक दबाव बना रहता है। वहां खुले तौर पर अपनी सेक्शुअल ओरिएंटेशन ज़ाहिर करना अपराध माना जाता है। ऐसे में खुलेआम किसी समलैंगिक व्यक्ति के प्रति प्यार ज़ाहिर करना उनके पारिवार तक को मुसीबत में फंसा सकता है।

2001 तक चीन में समलैंगिकता को मानसिक रोग माना जाता था। इससे पहले 1997 तक चीन में समलैंगिकता एक अपराध था, इस वजह से समलैंगिक समुदाय के अधिकारों के लिए काम करने वाले कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार तक कर लिया गया था।

चीन के किंगदाओ यूनिवर्सिटी द्वारा की गयी एक स्टडी में पता चला है कि चीन के दो करोड़ गे पुरुषों में से 90 प्रतिशत ने महिलाओं से शादी की हैं, लेकिन उनकी पत्नियों को अपने पतियों के सेक्शुअल ओरिएंटेशन के बारे में पता नहीं है। दूसरी ओर, गे पुरुष और लेस्बियन महिलाएं एक-दूसरे से कथित तौर पर ‘कोऑपरेटिव शादियां’ कर रहे हैं। इसमें उनकी मदद करने के लिए हाल के वर्षों में खासतौर पर कई वेबसाइट्स बनाई गई हैं। ऐसी ही एक वेबसाइट chinagayles.com का दावा है कि उसके चार लाख से ज्यादा यूज़र्स हैं और उसने बीते 12 वर्षों में ऐसी 50 हज़ार से ज़्यादा शादियां करवाई हैं। हालांकि, ये कितने लोग हैं इसका सही-सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन ऐसा हो रहा है, इसका स्पष्ट प्रमाण ज़रूर है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के ज़माने से हुई थी शुरुआत

अपने सेक्शुअल ओरिएंटेशन को छिपा कर फर्जी शादियां करने की शुरुआत 20वीं शताब्दी में मुख्यत: द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले हुई थी। उस वक्त ऐसी शादियों को लैवेंडर मैरिज (Lavender Marriage) का नाम दिया गया। लैवेंडर मैरिज का मतलब वैसी शादियों से है, जिसमें पति या पत्नी में से कोई एक या फिर दोनों समलैंगिक (homosexual) या उभयलैंगिक (bisexual) हों और दूसरे पक्ष को इस बात की जानकारी नहीं हो। कई लोगों ने इसे ‘सुविधा विवाह’ ( marriage of convenience) की संज्ञा भी दी, क्योंकि इस तरह के विवाह में विवाहित जोड़ों के बीच किसी तरह का भावनात्मक संबंध नहीं होता।

दरअसल उस दौर में समलैंगिकता को अपराध या पाप समझा जाता था। ऐसे लोगों के लिए अच्छी नौकरी मिलना या फिर एक फेमस पब्लिक फिगर के तौर पर अपनी पहचान बनाना मुश्किल था। इसी वजह से ऐसे लोग अपने सामाजिक रूतबे को कायम रखने के लिए फर्जी शादियां कर लेते थे। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी शादियां लंबे समय तक नहीं चल पाती होंगी या फिर अगर चल भी गयीं, तो दोनों पार्टनर में से किसी एक की ज़िंदगी नर्क बनकर रह जाती होगी।

अविश्वास की बुनियाद पर टिका विश्वास का रिश्ता

हमारे भारतीय समाज की भी फिलहाल जो स्थिति है, उसमें ज़्यादातर मां-बाप अपने बच्चों की समलैंगिक प्रवृति को लेकर नकारात्मक सोच रखते हैं। यही वजह है कि इस बात के पता चलने पर भी वे अपने बच्चों को ज़बरदस्ती विपरीत लिंग के व्यक्ति से विवाह करने पर मजबूर करते हैं। ऐसी शादियों को परिणाम क्या होगा, यह हम और आप बेहतर समझ सकते हैं।

चिकित्साविज्ञान के अनुसार समलैंगिक होना किसी तरह की बीमारी नहीं है। मनोविज्ञान कहता है- जिस तरह किसी व्यक्ति का आकर्षण अपने विपरीत लिंग के प्रति होता है, उसी तरह कोई व्यक्ति सामान लिंग के प्रति भी आकर्षित हो सकता है। इसमें हॉरमोनल डिस्बैलेंस या एबनॉर्मैलिटी की कोई बात नहीं। पिछले कुछ सालों में भारत में ऐसे भी कुछ मामले देखने को मिले हैं, जहां माता-पिता ने अपने बच्चों की ऐसी इच्छा का सम्मान करते हुए उनकी होमोसेक्शुएलिटी को स्वीकार किया है। इससे न केवल उनके बच्चे घुट-घुट कर जीने से बच गए, बल्कि उनके साथ-साथ किसी अन्य व्यक्ति की ज़िंदगी भी बर्बाद होने से बच गई, जिससे वह उनका रिश्ता जोड़ते।

 

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