देर से चलती अवध-असम एक्सप्रेस से एक ट्रेन डायरी

Posted by Nikhil Anand Giri in Hindi, Society, Staff Picks
February 11, 2018

अगर काला धन देश में ठीक से ढूंढा जाए तो एक बड़ा हिस्सा ट्रेन के टीटी के काले कोट में मिलेगा। उसके लिए हर यात्री एक ‘शिकार’ है। उसे पता है कि जनरल डिब्बे की टिकट से जनरल डिब्बे में यात्रा करना बहुत मुश्किल है। ‘शिकार’ खुद चलकर स्लीपर में आएगा, जेब गरम है तो एसी में भी आएगा। वो किसी को मना नहीं करता गलत डिब्बे में चढ़ने से। गाड़ी के चलने का इंतज़ार करता है, फिर 100-200 रुपये में बोगी का सारा भेद खतम कर देता है। यात्री भी खुश और टीटी तो खुश होगा ही। उसका काला कोट एक ऐसी सुरंग है, जहां से पैसा सिर्फ भीतर जा सकता है, बाहर आने का कोई रास्ता नहीं।

ट्रेन करीब सात घंटे देरी से चल रही है। मेरे साथ एक मौलाना साहब हैं, मुज़फ्फररपुर उतरना है उन्हें। 5 बजे शाम में पहुंचना था ट्रेन को, रात के बारह बजने वाले हैं। मुज़फ्फरपुर में मौलाना साहब मदरसा चलाते हैं। शायद उनका बेटा बार-बार फोन पर स्टेशन आकर इन्हें ले जाने की ज़िद कर रहा है, ये बार-बार ‘इतनी रात’ का हवाला देकर मना कर देते हैं।

मैंने सलाह दी कि बेटे को आने दीजिए, इतनी रात को अकेले कैसे जाएंगे?

वो हंसते हुए कहते हैं, “मैं तो किसी तरह से चला ही जाऊंगा मगर जैसा माहौल है, आजकल रात में अकेले निकलना नए मुसलमान लड़कों के लिए ज़्यादा खतरनाक है।”

मैंने कहा, “आप खामखा मुज़फ्फरपुर की नीयत पर शक कर रहे हैं।”

वो बोले, “अभी ‘अजितपुर’ का हादसा हुए ज़्यादा दिन नहीं बीते। दिल्ली में तो प्रेम प्रसंग के नाम पर जो हत्या हुई, वो सब याद रखेंगे, मुज़फ्फरपुर ये सब पहले ही झेल चुका है। सब भूल गए, एक (हिन्दू) लड़का यहां भी मरा है तीन साल पहले, किसी मुसलमान लड़की से प्यार करता था। बहुत ग़लत हुआ उसके साथ लेकिन फिर कई मुसलमान घरों में आग लगा दी गई। पूरा बदला लिया गया, बाहर से लोग आए थे। अभी बरा-वफात पर भी कुछ ‘बाहरी’ लोग आए थे। हमारा झंडा हटाकर ‘अपना’ झंडा लगा गए।”

वो बार-बार कहते रहे कि ये सब बाहरी लोगों ने किया। मोहल्ले के (हिन्दू) लोगों ने नहीं किया, मगर वो बस तमाशा देखते रहे। मौलाना ने फिर पैगम्बर की एक कहानी सुनाई कि जब वो मक्का की गलियों से गुज़रते थे। तब उनसे नफरत करने वाली महिला अपने घर के बरामदे से कुछ न कुछ गंदा इन पर फेंक देती थी, ये धूल झाड़कर आगे बढ़ जाते थे। कुछ दिनों से महिला अपने बरामदे में कूड़ा लेकर आती नहीं दिखी तो मुहम्मद साहब अपनी टोली के साथ उसके घर गए। महिला को लगा कि ये बदला लेने आए हैं, मगर जब पता चला कि बस खैरियत पूछने आए हैं तो उसके मन से सब नफ़रत मिट गई। मौलाना ने बताया कि आजकल वो मदरसे में अपने बच्चों को ‘धूल’ झाड़कर आगे बढ़ने की सलाह देते हैं। मैंने मुस्लिम महिलाओं की स्थिति पर कुछ और सवाल पूछे, मगर तब तक मुज़फ्फरपुर आ गया।

AC बोगी में असम के युवा क्रिकेटर संजॉय ब्रह्मा मेरे साथ सफर कर रहे हैं, रणजी खेल चुके हैं असम के लिए। उनका गोरखपुर रात को 11 बजे आना था, मगर सुबह के साढ़े सात बजे तक गोरखपुर दूर है अभी। उनके लिए ट्रेन के लेट होने का मतलब था कि एक दिन की नेट प्रैक्टिस छूट गई। ऐसा पहले भी कई बार हुआ है उनके साथ। जब गोरखपुर आया तो वो हड़बड़ी में उतरे, शायद आज की नेट प्रैक्टिस मिल जाए। मैं देखता हूं कि उनका चश्मा यहीं सीट पर रह गया है। हमने फोन नम्बर एक्सचेंज नहीं किए, इस बात का अफ़सोस अब बहुत हो रहा है। उनका मैच है 12 से, मगर चश्मा बनवाने में ही आज का दिन निकल जाएगा। मैं सिर्फ अफसोस कर सकता हूं।

स्लीपर में बारसोई (कटिहार के आगे का स्टेशन) से खूब सारे लकड़ी मज़दूर चढ़े हैं, रामपुर में ठेकेदार के लिए काम करते हैं। दो-तीन महीने पैसे कमाकर अपने गांव लौटते हैं, फिर गांव में भुट्टा या कोई भी उपयुक्त फसल लगाकर वापस काम पर लौट आते हैं। ट्रेन 8 घन्टे से ज़्यादा देरी से चल रही है।

इनसे ट्रेन की दूरी पर बात कीजिये तो आसानी से समझा देते हैं कि देर होना किसको कहते हैं। कहते हैं, “हमारे लिए देरी का मतलब है एक दिन की दिहाड़ी का मारा जाना।”

ट्रेन सबके लिए एक बराबर देरी से चलती है। उसको कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसका करियर गया और किसकी दिहाड़ी। देश के बजट में इस बात पर आंकड़े आने चाहिए कि इस तरह से कितनी दिहाड़ी ट्रेन के लेट चलने से हर दिन मारी जाती है। और इस बात पर भी आंकड़े देने चाहिए कि जो ट्रेन बिहार-बंगाल के गांवों से गुज़रती है, उसमें विदेशी टॉयलेट बनाकर पैसा बर्बाद करने का क्या तुक है? सारा दबाव देसी टॉयलेट झेलता है और 10-12 घंटे की देरी से पहुंचने तक हमारी दिल्ली को बहुत-सी गंदगी भी सप्लाई करता है।

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