झारखंड में 1 साल से बंद पड़े घर का बिजली बिल आया 61 हज़ार रुपया

Posted by Prince Mukherjee in Hindi, My Story
February 9, 2018

झारखंड के दुमका ज़िले के महुआडंगाल स्थित बिजली विभाग अपने सुस्त रवैये की वजह से एक बार फिर सवालों के घेरे में है। बिजली कटौती, कर्मचारियों द्वारा भ्रष्टाचार और सरकारी बाबुओं की मनमानी के बीच अब एक उपभोक्ता को बेहिसाब बिजली बिल भेजे जाने का मामला प्रकाश में आया है। ज़िले के रघुनाथगंज कुरूआ निवासी जितेन्द्र दास जो कि पिछले एक वर्षों से अपने पैत्रिक गांव सरभंगा (गोड्डा ज़िला) में रह रहे हैं, उन्हें बिजली विभाग की ओर से 61,805 रूपये का बिल भेजा गया है।

परेशान कर देने वाले बिजली बिल के साथ जितेन्द्र दास

गौरतलब है कि जनवरी 2017 में बड़े भाई धर्मेन्द्र दास की मृत्यु हो जाने के बाद से जितेन्द्र अपनी पत्नी, मां और दो बच्चों के साथ अपने गांव सरभंगा में रह रहे हैं। इस बीच जब वे अपने किसी निजी कार्य की वजह से दुमका आएं और उन्हें इस बात की खबर मिली तब बेरोज़गार जितेन्द्र हैरान रह गएं।

जितेन्द्र से इस मामले पर जब हमने बात की तब उन्होंने बताया कि बिजली विभाग द्वारा इतना अधिक बिल भेजे जाने के बाद हमारे घर में सभी टेंशन में हैं। हम पिछले एक साल से घर में नहीं थे और हमारा घर लॉक था। इसके अलावा पहले से ही हमारे घर का मीटर भी खराब हो चुका था जिसकी लिखित शिकायत हमने विजली विभाग से की थी।

जितेन्द्र आगे बताते हैं कि हम जब भी अपनी परेशानियां लेकर बिजली ऑफिस जाते थे, तब हमें जूनियर इंजीनियर, एसडीओ या फिर एग्ज़ेक्यूटिव इंजीनियर से मिलने ही नहीं दिया जाता था। या तो दरवाज़े पर तैनात गार्ड हमसे एप्लिकेशन लेकर उन्हें पैसे खिलाकर सेटेलमेंट करने की बात करता या फिर जब भी हम वहां गए, कोई पदाधिकारी मिले ही नहीं।

जनवरी 2017 में जब हमारे घर का मीटर खराब हुआ था और हम अपने गांव में थे, तब हमारी अनुपस्थिति में हमारे रिश्तेदारों ने चार दफा बिजली ऑफिस जाकर खराब मीटर को ठीक करने की अपील की। लेकिन कोई झांकने तक नहीं आया। हम बेशक वहां नहीं थे, लेकिन एक ही कैंपस में हमारे कुछ रिश्तेदार वहां मौजूद हैं।

 

जितेन्द्र आगे बताते हैं, अभी जनवरी 2018 में जब मैं दुमका आया तब चार दफा मैं भी बिजली ऑफिस गया, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है। हम जब भी वहां जाते हैं हमसे कहा जाता है कि राहुल जी से मिलकर सेटिंग करवा लीजिए। हम कहते हैं जब हमारी कोई गलती ही नहीं तो हम क्यों किसी को रिश्वत दें।

जितेन्द्र के मामले की तह तक जाने के लिए जब हम बिजली ऑफिस पहुंचे तब हमे भी पहली दफा खाली हाथ वापस लौटना पड़ा, क्योंकि वहां कोई अधिकारी मौजूद नहीं थे। जो इक्के-दुक्के कर्मचारी थे भी, उनका कहना था कि सेटिंग करवा लीजिए तब हम इस बिल को कुछ कम करवा देंगे।

बिजली ऑफिस

अगले दिन जे.ई एहसान अख्तर से 61,805 रूपये बिजली बिल आने के संबंध में पूछे जाने पर जो जवाब मिला वो इंसानियत को शर्मसार करती है। एहसान कहते हैं “आप 61,805 की बात क्यों कर रहे हो, आपके घर में हमारा मीटर लगा है, यदि बिल 2 लाख भी आ जाए तो हमारी नज़रों में वह जायज़ होगा।”

हम इस उम्मीद में थे कि बिजली ऑफिस की पूरी बिल्डिंग में कोई एक अधिकारी तो ऐसा होगा जिसके दिल में आज भी खुद्दारी होगी। मगर एसडीओ सुमन दुबे के सीनियर क्लर्क ने मेरी उम्मीदों पर पानी फेर दिया, वे जितेन्द्र से कहते हैं कि घर में फैक्ट्री चलाते हो क्या जो इतना बिल आ गया ?

बहरहाल बिजली विभाग के एसडीओ सुमन दुबे और एग्ज़ेक्यूटिव इंजीनियर विनोद कुमार से संपर्क साधने की हमने भरसक कोशिश की, लेकिन ऑफिस में उनकी अनुपस्थिति की वजह से मुलाकात मुकम्मल नहीं हो पाई।

शनिवार तीन फरवरी को बिजली विभाग के एग्ज़ेक्यूटिव इंजीनियर विनोद कुमार से मोबाईल फोन पर इस मामले में सवाल पूछे जाने पर उन्होंने ये कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि विभाग में लिखित तौर पर इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई है। जबकि जितेन्द्र दास के मुताबिक अब तक आठ दफा वे बिजली विभाग का चक्कर काट चुके हैं, और अभी हाल ही में 29/01/2018 को उन्होंने एग्जक्यूटिव इंजीनियर विनोद कुमार के सीनियर क्लर्क को इस विषय में लिखित आवेदन सौंपी है, जिसकी एक कॉपी जितेन्द्र के पास उपलब्ध है।

जितेन्द्र दास द्वारा दी गई एप्लिकेशन और साल भर में 61 हज़ार का बिल

इन सबके बीच बिजली विभाग के एग्ज़ेक्यूटिव इंजीनियर विनोद कुमार का ये कहना कि हमारे पास कोई लिखित आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है, ये वाकई में दुर्भाग्यपूर्ण है। जितेन्द्र दास का ये मामला ना सिर्फ बिजली विभाग के अधिकारियों के सुस्त रवैये की पोल खोलता दिखाई पड़ता है, बल्कि इस बात को भी बल मिलता है कि विभाग इसी प्रकार से बेबस और लाचार लोगों पर अत्यधिक बिल भेजकर सितम ढ़ाए जा रहा है।

जितेन्द्र के ही मुहल्ले में रहने वाले उनके एक पड़ोसी मुकेश दत्ता की भी कुछ ऐसी ही समस्याएं थीं। मुकेश बताते हैं कि करीब एक साल पहले बिजली विभाग दुमका द्वारा उन्हें बीस हज़ार रूपये का बिल भेज दिया गया था, जबकि वे अपने आवास पर रहते ही नहीं थे। मुकेश की माने तो अब तक उनका मामला अटका हुआ है।

उल्लेखनीय है कि जितेन्द्र ने अभी हाल ही में डीसी ऑफिस दुमका के जन-संवाद में बिजली ऑफिस के खिलाफ अपनी लिखित शिकायत दर्ज कराई है। उन्हें और उनके परिवार को न्याय मिलने का इंतज़ार है।

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