दिल्ली में अपनी राजनीतिक अनदेखी के लिए क्या जस्टिन ट्रुडो खुद ज़िम्मेदार हैं?

Posted by saurabh kumar in Hindi, Politics
February 28, 2018

कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो का हालिया भारत दौरा काफी विवाद में रहा। कहा गया कि भारत सरकार उन्हें तरजीह नहीं दे रही है। और शायद खालिस्तान लंबे अरसे बाद इतनी चर्चा में आया हो।

कनाडा के प्रधानमंत्री परिवार समेत सात दिवसीय भारत दौरे पर आए। जिस तरह मोदी प्रोटोकॉल तोड़ने के लिए जाने जाते हैं, उनसे अपेक्षा थी कि प्रोटोकॉल तोड़ वो ट्रुडो की आगवानी करने एयरपोर्ट जा सकते हैं। लेकिन आगवानी तो दूर  उन्होंने स्वागत के लिए ट्वीट करना भी मुनासिब नहीं समझा। उस वक्त मोदी कर्नाटक के चुनावी दौरे में व्यस्त थे। ट्रुडो की आगवानी के लिए कोई महत्वपूर्ण मंत्री को न भेजकर सरकार ने कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को भेजा।

उसके बाद ट्रुडो ताजमहल देखने आगरा गए, वहां भी स्वागत के लिए आदित्यनाथ नहीं पहुंचे, जो कि कुछ दिन पहले आगरा में ही बेंजामिन नेतन्याहू के साथ देखे गए। इससे संदेश गया कि नई दिल्ली ट्रुडो को नज़रअंदाज़ कर रहा है।

कनाडा में काफी संख्या में भारतवंशी रहते हैं, जिसमें बड़ी तादाद सिखों की है। उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति अच्छी है। पंजाबी कनाडा की तीसरी आधिकारिक भाषा है। जस्टिन ट्रुडो भारतवंशियों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। वो भांगड़ा करते हैं, लंगर छकते हैं। मज़ाक में उन्हें जस्टिन सिंह कहा जाता है। तो फिर क्या कारण है कि नई दिल्ली उनसे नाराज़ है?

जस्टिन ट्रुडो को उदारवादी नेता माना जाता है। वो महिला हक को लेकर मुखर हैं, उनके कैबिनेट में पचास फीसदी महिला मंत्री हैं। जब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प ने शरणार्थियों के लिए नियम सख्त किया, तो ट्रुडो ने कनाडा का दरवाज़ा खोल दिया। समलैंगिकों से सरकारी भेदभाव पर वो माफी मांगते हैं, 1914 में हुई  कोमगोटा प्रसंग पर वो कनाडा की ओर से माफी मांगते हैं। यानी कुल मिलाकर ट्रुडो #कूल वाली जेनरेशन के ब्रांड अंबैसडर हैं।

भारत से हरेक साल काफी संख्या में लोग कनाडा जाते हैं। जिसमें अधिकांश उच्च शिक्षा या बेहतर नौकरी की तलाश में जाते हैं। भारत में खालिस्तानी आंदोलन खत्म होने पर अधिकांश सिख एक्सट्रिमिस्ट कनाडा, ब्रिटेन जैसे देशों में शिफ्ट हो गए। इनमें से आज कुछ लोग काफी अच्छी स्थिति में हैं। कुछ बड़े मंत्री भी हैं, जिस पर एक बार ट्रुडो ने मज़ाक में कह दिया था कि मेरे कैबिनेट में मोदी से ज़्यादा सिख मंत्री हैं। कनाडा में सिखों की आबादी पांच लाख के आस-पास है जो कि वहां की जनसंख्या का डेढ़ प्रतिशत है।

इन मंत्रियों पर खालिस्तानी अलगाववादियों से सहानभूति रखने का आरोप लगता है, जिस पर भारत एतराज़ भी जताता है। पिछले साल हरजीत सिंह सज्जन जब भारत आए तो पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने उन पर खालिस्तानी समर्थक होने का आरोप लगाया और मिलने से इनकार कर दिया।

ट्रुडो पर भी खालिस्तानी अलगाववादियों के प्रति नरमी रखने का आरोप लगता है। पिछले साल वो टोरंटो में खालसा डे परेड में शामिल हुए जिसमें खालिस्तानी आंदोलन के दौरान मारे गए अलगाववादियों को शहीद के तौर पर पेश किया जाता है। उनके शामिल होने पर भारत ने आपत्ति जताई थी। पिछले दिनों कनाडा के गुरुद्वारा में जब भारतीय अधिकारियों पर बैन लगा दिया गया, तो उनकी सरकार ने कुछ नहीं किया, जबकि उनके मंत्रिमंडल में कुछ बड़े सिख चेहरे हैं।

हो सकता है वो जगमीत सिंह के उभरने से अपने इस वोट बैंक के प्रति आश्वस्त नहीं हो। जगमीत सिंह कनाडा की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी, न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी के अक्टूबर 2018 में होने वाले चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं।  उन्हें खालिस्तानी समर्थक माना जाता है। वो 1984 के दंगों की वजह से काँग्रेस की आलोचना करते हैं, वो मोदी और आरएसएस पर मुस्लिम विरोधी होने का आरोप लगाते हैं।

1985 के एयर इंडिया बम धमाके के मास्टरमाइंड की तस्वीरें जब कुछ गुरुद्वारों में लगाए गएं तो उन्होंने आलोचना करने से इनकार कर दिया। जबकि ये कनाडा के इतिहास की सबसे बड़ी आतंकी घटना है। आमतौर पर भारत अपने प्रवासियों की सफलता को लेकर काफी भावुक होता है, लेकिन फिर भी 2013 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने उन्हें वीज़ा देने से मना कर दिया।

यहां तक कि जसपाल अटवाल  जिसे 1986 में पंजाब के मंत्री मलकियत सिंह सिद्धू की हत्या की कोशिश के लिए दोषी पाया गया था। उसे भी ट्रुडो के मुम्बई डिनर में आमंत्रित किया गया था। ट्रुडो की पत्नी के साथ जसपाल अटवाल की फोटो पर भी विवाद हुआ, हालांकि विवाद होने पर आनन-फानन में डिनर रद्द कर दिया गया। और कनाडा सरकार ने एक स्पष्टीकरण जारी किया, शायद कनाडा देखना चाह रहा था कि भारत कहां तक बर्दाश्त कर सकता है।

अच्छी बात रही कि भारत ने पर्याप्त संदेश कनाडा को दे दिया है। अमरिंदर सिंह ने भी कनाडा के खालिस्तान के प्रति रुख को लेकर एतराज़ जता दिया। उन्होंने नौ एक्सट्रीमिस्ट की लिस्ट भी ट्रुडो को दी। पीएम मोदी ने भी कहा कि राजनीतिक उद्देश्य के लिए धर्म का दुरुपयोग बंद होना चाहिए। हम उन्हें बर्दाश्त नहीं करेंगे जो देश की एकता और अखंडता को चुनौती दे। भारत ने कनाडा के सामने एक लकीर खीच दी जो शायद बेहद ज़रूरी भी था।

कहा जा रहा है कि वोटबैंक के चक्कर में वो इंडिया आए। उन्हें समझ लेनी चाहिए कि अब खालिस्तान पंजाब में कोई मुद्दा है ही नहीं। पिछले साल आप पर पंजाब चुनाव में खालिस्तानियों के प्रति नरम होने का आरोप लगा। अरविन्द केजरीवाल एक पूर्व खालिस्तानी अलगाववादी के घर पर ठहरे भी, जिसकी अमरिंदर सिंह ने आलोचना की। अकाली दल जैसी पार्टी जिसकी पूरी सियासत सिख आइडेंटिटी के इर्द गिर्द है, ने भी केजरीवाल की आलोचना की और अंततः AAP चुनाव हार गई।

कनाडा को देखना चाहिए कि क्या उसके फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का कोई नाजायज़ फायदा तो नहीं उठा रहा है? ट्रुडो को अपना मंत्रिमंडल देखना चाहिए कि इसका कोई सदस्य किसी दूसरे देश की अखंडता को चुनौती तो नहीं दे रहा है। फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन भारत में भी है। हमारा संविधान हमें अहिंसक तरीके से मांग करने का अधिकार देता है, लेकिन इसी संविधान के अनुसार हम राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने को प्रतिबद्ध हैं। इस संबंध में भारत ने कनाडा को पर्याप्त संदेश दे दिया।


सौरभ Youth Ki Awaaz के फरवरी-मार्च 2018 बैच के ट्रेनी हैं। 

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