40 हज़ार दोरला आदिवासियों को बेघर करने का प्लान क्यों बना रही है केंद्र सरकार

Posted by Saurabh Raj in Culture-Vulture, Hindi, Human Rights, Politics, Society
February 23, 2018

जहां भी जाओ आजकल एक ही बात सुनने-देखने को मिल रही है विकास विकास और सिर्फ विकास। चारों ओर विकास की ही गूंज है। कॉलेज की कैंटीन से लेकर भारत के किसी सुदूर गांव के खेत में काम कर रहे किसान, सब विकास की ही बातें कर रहे हैं। बुद्धिजीवियों के बीच नित्य विकास की नई-नई परिभाषाएं भी गढ़ी जा रही हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने विकास की जो परिभाषा प्रस्तुत की है, उसके अनुसार, “विकास का तात्पर्य है- सामाजिक व्यवस्था, सामाजिक संरचना, संस्थाओं, सेवाओं की बढ़ती क्षमता जो संसाधनों का उपयोग इस प्रकार से कर सके ताकि जीवन स्तर में अनुकूल परिवर्तन आए।”

लेकिन आज देश के एक बड़े तबके ने विकास की इस अंधी दौड़ में सड़क और पुल-पुलिया के निर्माण को ही विकास मापने का पैमाना बना लिया है।

इस पैमाने में नकारात्मक प्रभावों को हाशिये पर धकेल दिया गया है और विकास का यह गतिचक्र अचानक एक बड़े तबके के विनाश का कारण बनने लगा है।

कुछ ऐसा ही हाल है आंध्रप्रदेश राज्य की सीमा से लगे छत्तीसगढ़ के बस्तर के दक्षिणी क्षेत्र का। भारत सरकार की पोलावरम बांध बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजना, छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी बस्तर के हज़ारों आदिवासियों के विनाश का कारण बन चुकी है। इस योजना के कारण कोंटा ज़िले के लगभग 40 हज़ार दोरला आदिवासियों का घर उजड़ना तय माना जा रहा है।

साल 1975 में तत्कालीन आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और ओडिशा सरकार ने इस परियोजना का करार किया था, जिसे 2009 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दे दिया।

लेकिन असली विवाद की शुरुआत मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद शुरू हुई। इस बांध की ऊंचाई, निर्माण शुरू होने के समय 150 फीट प्रस्तावित थी। 2014 में केंद्र सरकार ने 177 फीट की ऊंचाई के साथ बांध निर्माण की अनुमति दे दी, जिससे डूब क्षेत्र में भी भारी बढ़ोतरी हो गई।

जानकारों के मुताबिक बांध की ऊंचाई 45.75 मीटर से अधिक होने पर सुकमा ज़िले के राष्ट्रीय राजमार्ग का एर्राबोर से कोंटा के बीच 13 किलोमीटर का हिस्सा और लगभग 6000 हेक्टेयर से अधिक ज़मीन डूब जाएगी। पोलावरम परियोजना के इसी स्वरुप में पूरा होने से दोरला जनजाति के विलुप्त होने और उनकी संस्कृति के पूरी तरह से नष्ट हो जाने का खतरा है।

विलुप्त होने के कगार पर खड़े दोरला जनजाति के सैंकड़ों लोगों ने आदिवासी संघर्ष और विद्रोही नक्सलियों के गढ़ में शान्ति स्थापना के लिए अपना खून पानी की तरह बहाया है।

बस्तर के लोग इन जवानों की वीरता की कई कहानियां सुनाते नहीं थकते हैं। बस्तर के जंगलों में प्रचलित कहानियों को अगर आधार मानें तो इस धरती से करीब 550 जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी है, जो कि सरकारी रिकॉर्ड से भी गायब है।

उनकी शहादत को तो छोड़िए, भगवान श्रीराम की दुहाई भी इस क्षेत्र को जलमग्न होने से नहीं बचा पा रही है। पौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान श्रीराम ने त्रेतायुग में महाकाल को यहीं मनाया था, जिसके कारण उस गांव का नाम इंजरम रख दिया गया। इंजरम अर्थात ‘अभी राम आकर गए हैं।’ जिसके कारण इस क्षेत्र में पुरातात्विक एवं धार्मिक रूप से बहुमूल्य धरोहरों की भरमार है। लेकिन धर्म भी दोरला आदिवासियों की संस्कृति को नहीं बचा पा रहा है।

कुल मिलाकर 40 हज़ार दोरला आदिवासियों का बेघर होना तय माना जा रहा है। बहुत जल्द ही दोरला संस्कृति को विकास की आहुति चढ़ा दिया जाएगा।

शायद इन 40 हज़ार आदिवासियों के मन में हज़ारों सवाल होंगे। आखिर वे ही इस विकास की कीमत क्यों चुकाएं? उनका ही समाज बार-बार कुर्बानी क्यों दे? इस बांध के निर्माण के बाद उनका क्या होगा? उनकी जनजाति का क्या होगा? छत्तीसगढ़ की सरकार के पास उनके पुनर्वास की अब तक कोई स्पष्ट नीति क्यों नहीं है? लेकिन शायद ये हज़ारों सवाल विकास के इस कोलाहल में दब जाएंगे। सरकारें फीता काटेंगी, एक बड़ा तबका इस विकास का जश्न मनाएगा और दोरला जनजाति इस विकास की भागदौड़ में इतिहास के पन्नों में विलुप्त हो जाएगी।

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