याद है ‘गांधी ने क्या कहा था’?

Posted by Syedstauheed in Art, Hindi, Society
February 1, 2018

सांप्रदायिकता का खबर बन जाना खतरनाक नहीं है, खतरनाक है खबरों का सांप्रदायिक बन जाना। देश में विभिन्न समुदायों में तमाम तनावों और असहज हालातों के बीच राजेश कुमार का नाटक ‘गांधी ने कहा था’ हमेशा प्रासंगिक रहेगा। जनवादी नाटककार राजेश कुमार नुक्कड़ नाटक आंदोलन के शुरुआती दौर से सक्रिय हैं। अब तक उनके दर्जनों नाटक एवं नुक्कड़ नाट्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। अस्मिता और देश की अनेक नाट्य मंडलियों द्वारा ‘गांधी ने कहा था’ के कई सफल मंचन हुए हैं। महात्मा गांधी के व्यक्तित्व एवं विचारों की उपयोगिता दर्शाता इससे सुंदर नाटक शायद ही कोई और हो।

नाटक की कहानी आज़ादी के पहले के समयकाल की है। देश में हो रहे सांप्रदायिक दंगों से गांधी जी दु:खी हैं, इसे रोकने के लिए वह नागरिकों को समझा रहे हैं। वह फिलहाल नोआखली की एक मुस्लिम बस्ती में ठहरे हुए हैं।

गांधी जी के बारे में सुनकर कई लोग उनसे मिलने आ रहे हैं। इन घटनाक्रम के बीच पुराने गांधी समर्थक ‘तार्केश्वर पांडे’ भी उनसे मिलने आते हैं, जिनका बेटा ‘सूरज’ भी दंगो में मारा गया है। गांधीवादी सिद्धान्तों की सामूहिक अवहेलना से तार्केश्वर पीड़ित हैं, वह नहीं चाहते कि यह सांप्रदायिक महौल किसी और मासूम की जान ले।

तार्केश्वर की व्यथा सुनकर बापू उन्हें एक मुस्लिम बालक को गोद लेने की सलाह देते हैं। उस समय तार्केश्वर एक मुस्लिम बालक को अपनाने का संकल्प लेते हैं। समुदायों के आपसी मतभेद को सदा के लिए दूर करने की सिर्फ यही दवा थी।

बापू की सलाह पर तार्केश्वर एक मुस्लिम बच्चे आफताब को गोद ले लेते हैं। तार्केश्वर की पत्नी ‘सुमित्रा’ रूढ़ीवादी विचारों के प्रति विश्वास रखती हैं, आफताब को लेकर वह पति से नाखुश है, किंतु अभी-अभी संतान खो चुकी ‘मां’ समय के साथ आफताब को स्वीकार कर लेती है। तार्केश्वर आफताब का पालन-पोषण मुस्लिम रीतियों के अनुसार करने का निर्णय लेते हैं और आफताब सभी धर्मों का सम्मान करने वाला युवक बनकर उभरता है। हालांकि रह-रहकर मुस्लिम समुदाय के प्रति उसकी गहरी संवेदना भी प्रकट होती है।

आफताब मुस्लिम समाज के प्रति सामान्य पूर्वाग्रहों से बहुत दु:खी है और समुदाय की पीड़ा समाप्त करने का संकल्प लेते हुए वह अतिवादी रास्तों को अपना लेता है। आफताब समझता है कि अतिवादी मार्ग से ही मुसलमानों का दु:ख खत्म होगा, लेकिन आतंक का मार्ग सदैव अंधकार की ओर ही ले जाता है। आफताब भवावेश में अतिवादी संगठन में शामिल होकर हिंसा का रास्ता अपनाता है, जो कि पिता तार्केश्वर से मिले सत्य-अहिंसा समान महान गांधीवादी मुल्यों की अवहेलना थी।

आफताब अंजाने में सांप्रदायिक दंगों का कारण बन जाता है, लेकिन अगर सुबह का भूला शाम को घर वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। आफताब को पिता से मिली शिक्षा का एहसास होता है और वह अपनी तरह दंगों में किसी भी बच्चे को अनाथ न होने देने का संकल्प लेकर सांप्रदायिक सद्भाव को जीवन का लक्ष्य बनाता है।

नाटक के विचार और संवाद दोनों बहुत प्रभावी हैं जो सांप्रदायिक तनाव के बीच यह बार-बार बापू के विचारों की हत्या न करने की अपील करते हैं।

सांप्रदायिकता के संकट पर लिखा गया यह नाटक ‘महात्मा गांधी’ के व्यक्तित्व और उनकी शिक्षा के महत्व को रेखांकित करता है। यह नाटक सांप्रदायिकता की आईने में संतान को खो चुके तार्केश्वर एवं माता-पिता खो चुके आफताब को एक सूत्र में पिरोने का सुंदरतम उदाहरण है।

राजेश कुमार का नाटक ‘गांधी ने कहा था’ हमसे गांधीवादी विचारों पर गंभीरता से मंथन करने की अपील करता है। सांप्रदायिकता की रोकथाम और परस्पर सद्भाव स्थापित करने में बापू के विचार आज भी बहुत कारगर हैं और हमेशा रहेंगे। शांति और परस्पर सहयोग के बिना विकसित समाज की स्थापना नहीं की जा सकती। शांति व सद्भाव को नज़रअंदाज कर किया गया विकास, दरअसल विकास है ही नहीं।

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