चीन से मुकाबला करना है तो चीन से ही सीखना होगा कि मार्केट कैसे बनाते हैं

पिछले दिनों कहीं पढ़ा कि भारत बार-बार पाकिस्तान का राग अलापता रहा है, लेकिन उसका वास्तविक और बड़ा शत्रु चीन है। सवाल बड़े और छोटे का नहीं, सोचने के तरीके का है। अगर हम यह सोचते हैं, बोलते हैं और बर्ताव कराते हैं कि कौन मेरा शत्रु है और कौन मित्र तो हमारी सोच धीरे-धीरे शत्रुता और मित्रता में अपने-आप ढलने लगती है। जो मित्र है वह भी शत्रु हो जाता है और जो शत्रु है वह भी मित्र। ज़ाहिर है भारत और चीन के बीच भी उसी तरह के सीमा विवाद हैं, जैसे भारत और पाकिस्तान के बीच। दोनों देशों के बीच की सीमाएं, सीमाएं नहीं है, बल्कि नियंत्रण रेखाएं हैं। किसी की नज़र में कश्मीर धंसा है तो किसी की नज़र में अरुणाचल। दोनों ही अपनी लपलपाती जीभ भारत की ओर फैलाए हैं। परन्तु…

यह परन्तु… ही वह बिंदु है जहां ठहराना हर भारतीय के लिए विवशता है। हमारे बाज़ार, हमारे दिए, पटाखे, रंग, तीज और त्यौहार सब पर धीरे-धीरे चीन पैर पसार रहा है और हम उसे चुपचाप देखने को विवश ही नहीं, उसके सहभागी भी हैं।

हम दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार हैं, दुनिया के तमाम देशों की हममें रुचि है। लेकिन, सीमाई रूप से कोई उतना करीब नहीं है, जितना कि चीन।

वह दुनिया के तमाम बाज़ारवादी देशों की तुलना में हमारे आधिक नज़दीक है और हमारे बाज़ार में गहरी रुचि रखता है। इस सन्दर्भ में चीन को इस बात से कोई समस्या नहीं कि भारत मित्र है या दुश्मन। सीमाई विवादों के बावजूद वह भारत की अर्थव्यवस्था में अच्छी खासी दखल बना चुका है।

सामरिक दृष्टि से भारत को घेरने की कोशिश के बावजूद और तमाम चीन विरोधी राष्ट्रवादी नारों के बावजूद हम उसके आर्थिक हितों के पोषण में सहायक हैं। पर समस्या हमारी ओर है, हम ऐसी नीति बना पाने या लागू कर पाने में असफल रहे हैं जिससे हम इस व्यापार को दोतरफा लाभ का सौदा बना पाएं। पाकिस्तान हो या चीन दोनों ही मोर्चों पर हमारी आर्थिक नीतियां असफल रही हैं। हम अपनी अकड़ और जकड़ में अपने आर्थिक हितों का नुकसान कर रहे हैं।

इस बात को हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं। चीन ने पिछले कुछ वर्षों में अपने देश के तमाम विश्वविद्यालयों में हिन्दी भाषा के अध्ययन और अध्यापन का काम शुरू किया हैं। ना केवल वह बड़ी संख्या में वह अपने विद्यार्थियों को हिन्दी सिखा रहा है बल्कि हिन्दी पढ़ने के लिए बड़ी संख्या में उन्हें भारत भी भेज रहा है। वहां के भाषा पाठ्यक्रमों को देखकर हमारे लिए यह समझना मुश्किल नहीं है कि उनके भाषा शिक्षण का उद्देश्य क्या है?

ये पाठ्यक्रम बहुद्देश्यीय प्रकार के होते हैं, जिनमें अधिकतर भाषा के अनुप्रयोग की शिक्षा दी जाती है। चीनी विद्यार्थियों को पढ़ाते हुए कई बार मुझे अनुभव हुआ कि वे एक सामान्य हिन्दी विद्यार्थी की तुलना में, भारत के बारे में कितना अधिक जानते हैं और जानने की इच्छा रखते हैं। ज़ाहिर है कि यह केवल, रुचि या उत्सुकता तक सीमित नहीं है, इसका संबंध उद्देश्य से भी है।

उनकी शिक्षा का उद्देश्य केवल भाषा के साहित्य तक पहुंचाना नहीं, बल्कि भाषा के ज़रिये बाज़ार में अपनी पैठ बनाना है और इसके लिए वे व्यापक तैयारी में लगे हैं। वे भारतीयों की मनोरचना, संस्कार या जीवन-संदर्भों को गहराई तक जानना चाहते हैं और जानते हैं, ताकि वे उसके अनुरूप अपने उत्पाद और उसके विज्ञापन तैयार कर सकें। मेरे लिए यह आश्चर्यजनक था कि एक ग्रेजुएशन की चीनी छात्रा ने मुझे बाताया कि वह अपने शीत अवकाश में भारतीयों के लिए एक क्विज (प्रश्नावली) का निर्माण कर रही है और उसकी वेबसाइट संचालित कर रही है।

क्या हम किसी भारतीय ग्रेजुएट से यह उम्मीद कर सकते हैं कि वह पाकिस्तानी या चीनी नागरिकों के लिए क्विज का निर्माण कर सके? यही नहीं, उसने यह भी बताया कि उसके बनाए सामान्य प्रश्न भी भारतीयों के लिए मुश्किल रहे। कुछ प्रश्न उसने मुझे भेजे भी और मैंने पाया कि ये अपने देश के प्रति हमारी उदासीनता की गवाही देने वाले प्रश्न थे। इस बात से यह पाता चलता है कि वहां हमारे बाज़ार में घुसपैठ की कितनी गहरी तैयारी हो रही है, जिसे हम केवल मित्र और दुश्मन राष्ट्रों के सांचे में देख और सोच रहे हैं।

हम बार-बार झुकते हैं, हाथ बढ़ाते हैं और फिर भी असफल होते हैं और चीन अपनी सारी दुश्मनी के बावजूद भी सफल है। निश्चित तौर पर हमारी ऐंठ के साथ हमारी कूटनीतिक तैयारी का अभाव दिखाता है।

हम केवल पूर्वाग्रहों में जी रहे हैं और चीन अपनी ठसक के साथ हम पर हावी भी है और हमारे बेडरूम से किचन तक बिछा भी है।

निश्चित तौर पर दुश्मन और दोस्त के परंपरागत आग्रहों से बाहर निकलकर हमें दोहरे दखल की कोशिश करनी होगी। अपनी सरहदों पर तैनात हिन्दी समझने वाले चीनी सैनिकों का जवाब हमें भारतीय चीनी भाषी सैनिकों से देनी होगी और उनकी बाज़ार की भाषा, जीवन और समाज की समझ तक अपनी पहुंच बढ़ानी होगी। बिना इसके हम दोहरी मार ही झेलेंगे, सीमा पर भी और बाज़ार में भी।

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