Women safety in bhopal

Posted by Rakhi Raghuwanshi
February 26, 2018

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महिला सुरक्षा के खोखले वादे
राखी रघुवंशी
अपराधों की राजधानी कहे जाने वाले भोपाल में गत वर्ष एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार के मामले के बाद पुलिस द्वारा बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज न करने के मामले में पुलिस की निष्क्रिय भूमिका और मामा शिवराज सिंह के सुरक्षा के वादे की पोल खोली, वहीँ हाल ही में स्कूटर सवार 02 बहनों का कुछ लडको द्वारा पीछा करने और अन्य व्यक्ति से मदद मागने के बाद मनचलों दवरा बदतमीज़ी कर डराने का एक मामला सामने आया है. इसमें भी मनचलों ने पुलिस के पिकअप वेन को देखने के बाद भी लड़कियो के साथ छेड़छाड़ चालू रखी, जिसमे से एक मनचले का कहना था की पुलिस को तो हम अपनी जेब में रखते है. इसी तरह का एक मामला गत वर्ष भी हुआ था.
यह तब है जब महिलयों की सुरक्षा के लिए भोपाल पुलिस की 07 से अधिक तरह की टीमें लगी हुई हैं. बाबजूद इसके इस साल एक जनवरी से 17 फरवरी तक 48 दिन में 42 छेड़छाड़, 67 मारपीट, 15 ज्यादती और फ़ोन पर धमकी के 11 मामले दर्ज किये जा चुके हैं. पिछले साल भी छेड़छाड़ में ही 13 फीसदी की बढोतरी दर्ज की गयी है.
चिंतन की बात यह है की हर महीने दो महीने में इस तरह की घटनाये हमें अखबारों में पढ़ने को मिल रही है, लेकिन इनपर रोकथाम या अंकुश को लेकर कोई खास पहल पुलिस या प्रशासन की ओर से देखने को नही मिली. सामूहिक बलातकार के मामले के बाद प्रशासन की ओर से मंत्री ने लडकियों और महिलायो को रात 8 बजे के बाद घर से न निकलने की सलाह जरूर दी!!! ताकि इस तरह की घटनायो से महिला वर्ग बचा रहे, लेकिन पुरुषो पर कठोर कार्यवाही का कोई भय नही दिखा पाए. लेकिन क्या यह सब ठीक है ? क्या इस तरह के कदमों से महिलाओं को सुरक्षा मुहैया कराना संभव होगा ? जब तक लोगों की सोच में बदलाव नहीं आएगा तब तक कुछ नहीं हो सकता है। महिलाओं को भई जीने का हक है। लड़कों के जैसे उन्हें भी स्वतंत्र होकर खुले आम सड़कों पर घुमने का हक है। महिलाओं पर बढ़े रहे विभिन्न तरह के हमलों को रोकने के लिए सही और वैज्ञानिक सोच के साथ सही रास्ता अपनाते हुए समाज को इसके लिए जागरूक करना आवश्यक है। इसके साथ ही उनके स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रति ज्यादा सचेत होना होगा। सिर्फ कानून और योजनाएं बनाने से कुछ नहीं होगा उन्हें लागू करना ज्यादा जरूरी है। तभी महिलाओं को अपनी मर्यादा प्राप्त हो सकती है।
पिछले 03 वर्ष में भोपाल में माहिला अपराधों से जुड़े मामलो में तेज़ी आई है, हांलाकि आम अपराधों की दर कम हुई है लेकिन इसके उलट ज्यादती, छेड़छाड़ और अपहरण के मामले बढ़ गए हैं, महिलायों के लिए भोपाल अब सुरक्षित शहर नहीं बचा. यह हकीकत भोपाल पुलिस दवारा जारी वर्ष 2017 के आकंड़ों के विश्लेषण में सामने आई है. पिछले 03 वर्ष में भोपाल में महिला अपराधों को अगर हम देखे तो; 2015 में ज्यादती के 188, 2016 में 287 और 2017 में 301 मामले दर्ज हुए. अपहरण के 2015 में 485, 2016 में 478 और 2017 में 497 मामले, छेड़छाड़ के 2015 में 416, 2016 में 440 और 2017 में 495 मामले दर्ज हुए. इस तरह तीन वर्षो में ज्यादती के 16556 , अपहरण के 16955 और छेड़छाड़ के 15621 मामले दर्ज हुए.
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक मध्यप्रदेश इस मामले में गत वर्ष भी देश में पहले स्थान पर ही था. महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले में 4,882 की संख्या के साथ मध्यप्रदेश एक दफा फिर से देश के सभी राज्यों में सबसे पहले स्थान पर दर्ज किया गया है. एनसीआरबी के जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार 2017 में देश में 28,947 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना दर्ज की गयी. इसमें मध्यप्रदेश में 4882 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना दर्ज हुयी, जबकि इस मामले में उत्तर प्रदेश 4816 और महाराष्ट्र 4189 की संख्या के साथ देश में दूसरे और तीसरे राज्य के तौर पर दर्ज किये गये हैं. इसके साथ ही नाबालिग बालिकाओं के साथ बलात्कार के मामले में भी मध्यप्रदेश देश में अव्वल स्थान पर है. मध्यप्रदेश में इस तरह के 2479 मामले दर्ज किये गये जबकि इस मामले में महाराष्ट्र 2310 और उत्तरप्रदेश 2115 के आंकड़े के साथ क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर है. पूरे भारत में 16,863 नाबालिग बालिकाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज किये गये हैं. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक ने कहा था कि मध्यप्रदेश में हम तत्परता से ऐसे मामले दर्ज करते हैं, इसलिये प्रदेश में बलात्कार की घटनाओं की संख्या अधिक होती है.
नेशनल क्राइम रिकॉ‌र्ड्स ब्यूरो के अनुसार 1971 से 2012 तक रेप के मामलों में 880 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। 2010 के मुकाबले 2011 में रेप के मामले 8 प्रतिशत बढ़े हैं। ये आंकड़े सिर्फ रेप के खिलाफ दर्ज मामलों के हैं। हमारे समाज में बहुत सारे रेप के मामले सामाजिक व पारिवारिक दबाव, भेदभाव, बदनामी का डर इत्यादि के कारण दर्ज ही नहीं हो पाते हैं। कितने ऐसे अपराध हैं जिनके लिए हमारे कानून में सजा का कोई प्रावधान तक नहीं है। कभी उन्हें मानसिक रुप से तनाव मिलता है तो कभी पारिवारिक दवाब, कभी उन्हें सबके सामने अपमानित होना पड़ता है तो कभी बेवजह सजा मिलती है।
भोपाल में महिलायों, युवतियों और छात्रायों के साथ होने वाले अपराधों को देखते हुए कई प्रयास किये गये. इसमें महिला थाना, निर्भया मोबाइल, मैत्री स्कूटर फार्स, वी केयर फॉर यू, महिला हेल्पलाइन, मोबाइल फोन एप और शक्ति स्क्वाड के आप्शन दिए गए. डीआईजी और आईजी तक स्कूल-कॉलेज में विद्यार्थियों को अपराध और कानून की बारीकियों के बारे में जानकारी देकर जागरूक करने का अभियान चला रहे हैं. लेकिन इसके विपरीत पुलिस के अनुसार ही रात की गश्त बंद होने के कारण इस तरह के मामलो में तेज़ी आयी है.
जिस तरह के अपराध महिलाओं के साथ दर्ज हो रहे हैं, वे इस बात का संकेत हैं कि भारतीय समाज में लैंगिक भेदभाव की जड़ें अब तक हिल नहीं पा रही हैं. यह भी तय है कि महज़ पुलिस की भूमिका को केंद्र में रखकर महिलाओं के लिए समाज को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता है. हमें लैंगिक रूप से संवेदनशील सामाजिक और कानूनी न्याय व्यवस्था की जरूरत है. भारत जिस तरह की शिक्षा और सामाजिक व्यवहार का शिकार है, उसमें लैंगिक भेदभाव के चरित्र को बदलने की ठोस पहल करने की जद्दोजहद में जुटना जरूरी है.
इन अपराधों के खिलाफ न तो तत्परता से कोई कदम उठाया जाता हैं और ना ही कड़ी कार्रवाई की जाती है। इसी का नतीजा है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के जो मामले अदालत तक पहुंचते भी हैं, उनमें से 4 में से 1 में ही अपराधी को सजा मिल पाती है। प्रशासन की यही विफलता, महिलाओं व युवतियों के बीच असुरक्षा फैला रही है। अब सवाल ये उठता है कि जहां देश प्रगति की राह पर चल रहा है वहां महिलाओं की हालत बद से बत्तर हो रही है। उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं है। पहले उन्हें घर की सामग्री समझा जाता था, और अब उन्हें अपने मनोरंजन के लिए खेलकर फैंक देने वाला खिलौना। लेकिन अब बहुत हो चुका है। अब महिलाएं जाग उठी हैं,उन्हें अपना हक चाहिए। उन्हें अपने पर हो रहे इन अत्याचारों से निजात चाहिए। इसके लिए सिर्फ सरकार को ही नहीं बल्कि बुद्धिजीवियों के साथ-साथ समाज के वरिष्ठ नागरिकों को भी आगे आना होगा। सबसे पहले उन्हें अपनी सुरक्षा खुद करनी होगी। सिर्फ कानूनों से महिलाओं पर बढ़ रहे अपराधों पर लगाम नहीं लगाया जा सकता है बल्कि लोगों की सोच और मानसिक चिंता धारा में बदलाव अति आवश्यक है। लोगों के नजरिए में बदलाव जरूरी है।

राखी रघुवंशी
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