आजकल की लड़कियों पर नजर डालें तो, अगली सदी लड़कियों की।

Posted by Ritu Singram
March 7, 2018

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हर साल हम 8 मार्च को प्रत्येक महिला के सम्मान में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मानते हैं। सही मायने में महिला दिवस तब ही सार्थक होगा जब विश्व भर में महिलाओं को मानसिक व शारीरिक रूप से सम्पूर्ण आजादी मिलेगी, जहाँ उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं करेगा, जहाँ उन्हें दहेज के लिए लालच में जिंदा जलाया नहीं जाएगा, जहाँ कन्या भ्रूण हत्या नहीं की जाएगी, जहाँ बलात्कार नहीं किया जाएगा, जहाँ उसे बेचा नहीं जाएगा।
हम लड़कियां भी सब कुछ कर सकती हैं हममें शक्ति की कमी नहीं है कमी है तो सिर्फ इक्छा शक्ति की या संकल्प की। अगर आजकल की लड़कियों पर नजर डालें तो हम देखते है कि ये लड़कियां आजकल बहुत बाजी मार रही हैं। इन्हें हर क्षेत्र में हम आगे बढ़ते हुए देख रहे हैं। विभिन्न परीक्षाओं की मेरिट लिस्ट में लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। किसी समय इन्हें कमजोर समझा  जाता था, किन्तु इन्होंने अपनी मेहनत और मेधा शक्ति के बल पर हर क्षेत्र में प्रवीणता अर्जित कर ली हैं। इनकी इस प्रतिभा का सम्मान किया जाना चाहिए।
इतिहास पलट कर देखे तो महिलाओं ने प्रत्येक क्षेत्र में अपना परचम लहराए हैं चाहें वह केकैयी हो जो कि युद्ध में विषय परिस्थितियों में राजा दशरथ का सहयोग करती है चाहें सीता हो जो कि आज भी महिलाओं के लिए आदर्श है सती सावित्री जिन्होंने अपने प्रयास से मृत्यु को पराजित किया या वीर पुरूष छत्रपति की माता जीजा बाई हो। रणभूमि में अंग्रेजों को अकेले धूल चटाने वाली वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई हो या रानी दुर्गावती और रानी अवंतिका हो या वर्तमान में लड़कियों की आदर्श श्रीमती इंदिरा गांधी, कल्पना चावला और किरण बेदी के बीच में कुछ महिलाएं आज भी इतनी बेचारी, लाचार और अबला क्यों कहलाती हैं?
आज जब पुनः स्त्री शक्ति को लेकर जो देश में बातें हो रही हैं तो मुझे लगता हैं कि हमारा देश उक्त महिलाओं को विस्मृत कर रहा हैं। महिला तो सदैव से ही शक्ति स्वरूप हैं। हाँ, यह बात है कि महिलाओं ने अपनी शक्ति का प्रतिष्ठापन घर से बाहर तभी किया है जब इसकी आवश्यकता महसूस हुई। नारी का सारा जीवन पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में ही बीत जाता है। पहले पिता की छत्रछाया में उसका बचपन बीतता हैं। पिता के घर मे भी उसे घर का कामकाज करना होता हैं तथा साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखनी होती हैं। उसका यह क्रम विवाह तक जारी रहता हैं।
उसे इस दौरान घर के कामकाज के साथ पढ़ाई-लिखाई की दोहरी जिम्मेदारी निभानी होती हैं जबकि इस दौरान लड़कों को पढ़ाई-लिखाई के अलावा और कोई काम नहीं रहता हैं। इस नजरिए से देखा जाए, तो नारी सदैव पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तो चलती ही है, बल्कि उनसे भी अधिक जिम्मेदारियों का निर्वहन भी करती हैं। नारी इस तरह से भी सम्मानित हैं। आज जब हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था का बोलबाला हैं तब पुनः हर क्षेत्र में सुधार करने के लिए लड़कियों को अपनी शक्ति का प्रतिष्ठापन करना होगा क्योंकि अगली सदी हम लड़कियों की हैं। जहाँ वह सिर उठा कर अपने महिला होने पर गर्व महसूस करें न कि पश्चाताप, कि काश मैं एक लड़का होती।

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