गाँव में युवाओं की शिक्षा पर उठता सवाल

Posted by आकाश भारतीय
March 1, 2018

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मैं औरंगाबाद बिहार का हूँ । मैं गाँव में रहता हूँ वहाँ की संस्कारों से ओत प्रोत भी हूँ । मेरे साथ मेरे कुछ साथी पढतें थे पर आज पता नहीं वो पारिवारींक परेशानी  के कारण अन्य शहरों महानगरों में कमाने चले गए । अफसोस होता हैं की आखिर क्यों ऐसा हैं?  जब भी ये सब सोचता हूँ तो अपने गाँव के सामाजीक रवैए पर गुस्सा आता है । सोचता हूँ मैं आज १२ वीं में हूँ तो मेरे वो साथी जो १० वीं भी नहीं कर पाए आज मेरे साथ पढ रहे होते कुछ तो जरूर बनते आगे चलकर कहीं बाहर जाकर किसी की गुलामी ना करते । बच्चों को पढा कर कुछ कमातें और आगे की तैयारी करते । पर गाँव में भी लोग शहरों की तरह बर्ताव करने लगे हैं । आज मुझे गाँधी जी की ये बात गलत सिद्ध होती प्रतीत हो रही है की  ” भारत की आत्मा गाँव में बसतीं है । त्यौहार और अन्य खुशी के  मौक़े पर सार्वजनिंक रूप से चन्दा लीया जाता है क्यों तो सिर्फ वैश्यावों के नर्तकी देखने के लिए । दुर्गा पुजा कमीटी,  छठ पुजा कमीटी वगैरह वगैरह तो क्या उन युवाओं के लिए ये कमिटीयां चन्दा नहीं माँग सकती??  देखा जाए तो हमारे ही कुछ अभिभावक जो जी जान से वैश्यावों को बुलाते है । उन्हें ये बातें कडवीं लगती है । शर्म आती है की युवाओं को भविष्य बताने वाले लोग खुद उन्हें वर्तमान में भी नहीं जीने देते । जिन्हें जिन्दगी का सही से मतलब भी नहीं पता वो जिन्दगी सवारनें शहरों में मजदूरी करने में रहते हैं और कहीं ना कहीं उन युवकों के अभिभावक भी जिम्मेदार है और हमारा गाँव तो बस वैश्यावों के कदम पर ही सबकुछ लुटा दे रहा है । क्या चन्दा करके हम पुस्तकालय नहीं बना सकते?  मेरे पिता बताते हैं की जब वो पढतें थे तब कल्ब और पुस्तकालय बनायी थी । पर अब तो कुछ लोग बस राजनितीं करते हैं हम नवयुवकों की बात सुनतें ही नहीं पुस्तकालय की जगह रंगमंच बनवाना उन्हें प्रिय है । बस हमें उन साथियों की फिक्र होती हैं और अपने इस सामाजीक रवैयें पर शर्म आती है ।

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