Youth Ki Awaaz is undergoing scheduled maintenance. Some features may not work as desired.

देश अंबेडकर की मुर्तियों से ही खुश है, लेनिन की मुर्ती इस देश से दूर ही रहे तो अच्छा है…

Posted by kavirajpalsingh
March 7, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

-देश में हर गली हर चौराहों पर मुर्ती लगाने की परंपरा बर्षों से चली आ रही है, हमने और आपने कई चौराहों पर गांधी, सुभाष, भगत, आजाद, अंबेडकर जैसे क्रांतिकारी और महापुरुषों की मुर्तियां देखी होगी…लेकिन कुछ लोग जन भावनाओं को दरकिनार कर लेनिन और कई अन्य विदेशियों की मुर्ती लगाकर देश में माहौल बिगाड़ने का काम करते है, आपको याद होगा कि ये वही लोग है जो देश में रहकर देश के विरोध में नारेबाजी करते है, और सैनिकों को गालियां देते है, इन लोगों के बारें बातें तो बाद में विस्तार से की जा सकती है फिलहाल हम इसी विषय पर चर्चा करते है, आपने अभी हाल ही में ग्वालियर में नाथूराम गोडसे की मुर्ती लगाने की खबर तो सुनी ही होगी जिसे पूरे समाज के विरोध के बाद हटवा दिया गया….क्योंकि इस देश में गांधी और नाथूराम गोडसे को एक साथ नहीं पूजा जा सकता है, यही आज समझना होगा मार्कसवादियों को जो लेनिन की तुलना अंबेडकर से करके समाज को बाटने का काम कर रहे है, उन लोगों आज सोचना पड़ेगा कि देश के लिये अंबेडकर ने सिर्फ संबिधान ही नहीं लिखा बल्की ऐसे कई काम किये जिनके लिये देश उनके योगदान को भुला नहीं सकता, वहीं बाहरी लेनिन के पूरे जीवन का इतिहास सौ बार भी खंगाला जाये फिर भी कोई भी ऐसी बात नहीं निकाली जा सकती जिस कारण इस देश का नागरिक उन्हें पूज सके, लेनिनवाद को मानने वालों को बताना पड़ेगा कि लेनिन ने इस देश के लिये ऐसा क्या किया है जिस कारण उसे पूजा जाये, 

वह कौन सा देश भक्त था जिसकी मुर्तियों को अपने देश में स्थापित किया जाये…और जिन लोगों को आज लेनिन की मुर्ती टूटने पर दुख हो रहा है उन लोगों को तब दुख क्यों नहीं हुआ जब मार्कसवादी विचारों को मानने वाले ही लोगों ने हिंदूओं का कत्लेआम किया, हिंदूओं को जबरन प्रताड़ित किया, त्रिपुरा, मेघालय, केरल जैसे अनके राज्यों में आज भी रिकॉड खंगाले जाये तो सैकड़ों की संख्या में हिंदूओं का कत्लेआम के सबूत मिल जायेंगे…और इनका विरोध जब किसी की हत्या पर बाहर नहीं निकला तो फिर इनके विरोध पर प्रश्न उठेंगे, प्रश्न उठेंगे इनके उस मौन पर जो शहीदों की याद में बनाये गये अमर जवान पर चोट पुहंचाने पर भी नहीं खुला, प्रश्न उठेंगे इनकी उस खामोशी पर जो गौतम बुद्ध की मुर्ती टूटने पर भी नहीं टूटी….और जिन देशों की दुहाई देकर ये अपनी विचारधार फैलाते है इन्हें आज ये बताना ही होगा कि इनके लिये आजाद, चंद्रशेखर, प्रताप, पहले है या फिर बाहरी लेनिन…और मार्कसवादी

 

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.