प्रशासन की संवेदनहीनता से नफ़रत के जाल में फँसते विश्वविद्यालय के छात्र

Posted by ABHINAV PATHAK
March 9, 2018

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विश्वविद्यालय को हमारे देश में एक ऐसे कुम्हार की तरह देखा जाता है जो छात्रों के व्यक्तित्व को आकार देते हैं।ये छात्र विश्वविद्यालय से निकलकर राष्ट्र हित में अपना योगदान देते हैं।

लेकिन कई बार इनमें कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं। ऐसी ही एक घटना घटी बापू की कर्मस्थली चंपारण में।जी हाँ, वहीं चंपारण जहाँ से महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिए सत्याग्रह की शुरूआत की थी। 10 जनवरी 2017 को जब देश के तमाम सरकारी संस्थानों में होली की छुट्टी हो रही थी,चंपारण के महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र अबीर लगाने का दंड चुका रहे थे।
घटना के एक साल बीत जाने के बाद भी छात्र बताते हैं कि 10 मार्च उनके लिए किसी ब्लैक डे सेे कम नहीं।

                       चित्र आभार : द टेलीग्राफ

क्या है मामला: दरअसल बिहार के मोतिहारी में स्थापित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय में 10 मार्च को होली की छुट्टी हो रही थी। इसी दिन कुछ छात्र एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाने लगे। अबीर का कुछ अंश विश्वविद्यालय के फर्श पर गिरा जिससे विश्वविद्यालय प्रशासन नाराज हो गया और विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अरविंद अग्रवाल ने छात्रों को बुलाकर बुरी तरह फटकारा और उनसे 1000 रुपए का दंड शुल्क लिए।छात्रों के मुताबिक इसके लिए उन पर एफआईआर दर्ज कराने की बात भी कही गयी। यही नहीं विश्वविद्यालय के एक छात्र का कहना है कि उसके अबीर लगे हाथों की फ़ोटो भी ली गई। छात्र बताते हैं जेल के भागे किसी कैदी की तरह उनके हाथों की तस्वीर ली जा रही थी। इन सभी बातों को याद करके यहाँ के छात्र 10 मार्च को अपने जीवन का एक काला दिन मानते हैं। साथ ही छात्र बताते हैं कि उनके कुलपति सर ने छात्रों को एन्टी रैगिंग केस में करियर बर्बाद करने की धमकी भी दी।जब छात्रों ने प्रशासन के इस फैसले का विरोध किया तो उन्हें जेएनयू के छात्र नेताओं से प्रेरित बताया गया।

छात्र बताते हैं कि अभिभावकों के साथ हुए एक बैठक में कुलपति डॉ. अग्रवाल ने कहा कि छात्रों ने विश्वविद्यालय की स्वच्छता को नुकसान पहुंचाया है जिसके कारण उनसे 1000 रुपये का दंड शुल्क लिया जा रहा है।इसके साथ ही उन छात्रों को 1 सप्ताह के लिए विश्वविद्यालय से निष्कासित करने का फरमान भी जारी हुआ था जिसे विरोध के बाद वापस लेना पड़ा।

प्रशासन की संवेदनहीनता की यह पहली घटना नहीं है। पिछले वर्ष बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में छात्राओं के प्रति उदासीनता भी इसकी एक बानगी है।
देश की सरकार उच्च शिक्षा पर खासा ध्यान दे रही है। हाल ही में पेश हुए बजट में वित्त मंत्री ने 24 नए मेडिकल कॉलेज खोलने की मंशा जताई है। ऐसे में सवाल उठता है कि हजारों करोड़ खर्च करने के बावजूद अगर विश्वविद्यालय में छात्रों को डराने और धमकाने की बात सामने आती है तो इस पर खर्च हो रहे संसाधनों की क्या अहमियत रह जाती है।

विश्वविद्यालय में देश के युवाओं के भीतर आत्मविश्वास और संवैधानिक अधिकारों की समझ पैदा की जाती है ताकि वे समाज को सही दिशा देने में अपना योगदान दे सकें। लेकिन अबीर गुलाल लगाने के कारण अगर इन नौनिहालों साथ एक अपराधी सा व्यवहार होगा तो वे समाज के एक टूटे हुए और नफ़रत से भरे हुए इंसान बनकर विश्वविद्यालयों से निकलेंगे।

इसके लिए शिक्षण संस्थानों और सरकार को ध्यान देने की जरूरत है ताकि देश का भविष्य नफ़रत के जाल में ना फँसे।

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