संताल आदिवासियों का प्रकृति संग संसर्ग का पर्व है बाहा बोंगा

Posted by Chandramohan Kisku in Culture-Vulture, Hindi
March 10, 2018

संतालों के दैनंदिन जीवनयात्रा के साथ प्रकृति का रिश्ता बहुत ही गहरा है, अपनी प्रियतमा के जैसी ही। वे प्रकृति के साथ हंसते हैं, बोलते हैं, रोते हैं, गाते हैं। संतालों के लिए नदी-नाला, पहाड़-पर्वत एक पूरी जीवन शैली हैं। इनके वर्ष का आगमन भी प्रकृति वंदना के साथ होता है। जब जंगल के पेड़ों से पुराने पत्ते गिरकर नए पत्ते आते हैं, पुरी दुनिया पर जब हरियाली छाती है, तब इनका नया साल आता है। लताओं और पत्तियों  के बीच रंगों और सुवास से समृद्ध पुष्प-आवरण, मानव ह्रदय में नई आशा और ऊर्जा का सृजन करता है और तब ही संताल परंपरा के अनुसार नये साल का शुभागमन होता है।

संताल अपनी प्रकृति पर नज़र बनाए रखते हैं, प्रकृति के बदलाव को देखकर ही वो अपने पर्व-त्यौहार मनाते हैं।

अन्य आदिवासी समुदायों की तरह संताल भी वर्षभर अनेक पर्व-त्यौहार बड़े ही हर्ष और आनंद के साथ मनाते हैं। सोहराय महापर्व के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पर्व बाहा पर्व ही है। बाहा का शाब्दिक अर्थ पुष्प है, इस हिसाब से बाहा पोरोब या बोंगा, पुष्प का उत्सव ही हुआ।

पंडित पी.ओ. बोडिंग साहब के अनुसार यह पर्व फाल्गुन महीने में (अंग्रेजी में फरवरी-मार्च ) जब चन्द्रमा अपने चतुर्थांश में होता है, यह पर्व तब मनाया जाता है। जब सखुआ में फूल खिलने लगता है, महुआ का फूल भी सुगंध बिखेरता है, तब मनाया जाता है बाहा बोंगा। सखुआ और महुआ के फूलों का बाहा बोंगा में विशेष पूजा सामग्री के रूप में उपयोग होता है।

संतालों के पुरखों में लिखने-पढ़ने  का प्रचलन  नहीं था, उनके पास लिखने को कोई लिपि नहीं थी, इसलिए वे अपनी पौराणिक कथा-घटनाओं को कथा-कहानी और गीतों  के माध्यम से अपनी भावी  पीढ़ी  को अग्रसरित करते थे। वे प्रकृति के बंधू थे, इसलिए बांगा की काल गणना भी प्रकृति को देखकर ही की जाती थी। बाहा बोंगा के समय गाये जाने वाले गीत बाहा सेरेंग से यह प्रमाणित हो जाता है। इन सब गीतों के रचनाकार कौन हैं, यह सटीक रूप से बता पाना बहुत ही कठिन है, पर रचनाकार कोई भी हो उसने इन गीतों में अपनी ह्रदय की भावनाओं को उद्वेलित किया है। प्रकृति का सटीक वर्णन  किया है-

हेसाक मा चोटेरे, जा गोसांई, तूदे दोय रागेकान
बाड़े मा लाड़े रे, जा गोसांई, गुतरुद दोय  सांहेदा
देश चोंग नाचुरेन, चोंग बिहुरेन, जा गोसांई, गुतरुद दोय सांहेदा
नाचुर तेहो नॅचुरेन, जा गोसांई, तूदे दोय रागेकान, बिहुर तेहोय  बिहुरेन
जा गोसांई, गुतरुद दोय दा

यह गीत संतालों द्वारा हज़ारों सालों से गाया जा रहा है। संताल युवाओं मे यह गीत बाहा बोंगा में मधुर सुर के साथ फूटता रहा है, जिसका हिंदी रूपांतरण इस तरह है-

पीपल की ऊंची डालों पर, गाती हुई तुत पक्षी,
वट की झुकी टहनियों पर, कठफोड़वा विश्राम कर रहा है
काल के परिवर्तन  के साथ, हे गोंसाई, तुत गा रही है
काल के परिवर्तन के साथ, गुतरुद (बाघिन) विश्राम ले रही है
प्रकृति के अवश्यम्भावी परिवर्तन में, हे गोंसाई, तुत ने किया स्वागत
प्रकृति के इस अवश्यम्भावी बदलाव में, हे गोंसाई गुतरुद ने लिया है विश्राम

बाहा पर्व में हर्ष-आनंद तो होता ही है, इस अवसर पर आपसी वैर और दुश्मनी भी भुलाने की परंपरा है। हिन्दू समुदाय के लोग जिस तरह होली में आपस में रंग लगाकर आपसी बैर भूलकर एक नए मधुर रिश्ते की शुरुआत करते है। ठीक वैसे ही संताल पानी से अपने प्रियजनों को भिगा देते हैं और आपसी मनमुटाव को मिटाकर प्यार भरा रिश्ता आरम्भ करते हैं।

गांवों में इस अवसर पर अपने प्रियजनों और कुटुम्बों को आमंत्रित  करते है। पानी का यह खेल ज़्यादातर जीजा-साली, जीजा-साला, देवर-भाभी, ननद-भाभी वाले रिश्तों में बहुत ज़्यादा होता है। दौड़ा-दौड़ाकर अपने करीबी लोगों पर पानी डाला जाता है। अपने से बड़ों पर भी पानी डाला जाता है, पर कुछ शिष्टचार के साथ। इस खेल से संबंधित यह गीत उल्लेखनीय है –

तेहेंग दो लोटाते दाक दोंग दुलामारे, तेहेंग दो बाटी ते दाक दोंग आरेजआमारे
लोटा दाक दोंज दुलामा बोहोग रे, बाटी दाक दोंज दुलामा होड़मो रे.
तेहेंज दोन्ज दुलामा कुञ्ज दाक बोहोग रे, तेहेंज दोन्ज बोहेलामीदाक बोहोग रे
कुञ्ज दाक इ सफायताबोन मोने माईला, डाडी दाक ए माराव ताबोन ओंतोर माईला

इस गीत का हिंदी रूपांतरण-

आज मैं लोटे से पानी डालूंगा, आज मैं कटोरे  से पानी डालूंगा
लोटे का पानी माथे में डालूंगा, कटोरे का पानी शरीर में डालूंगा
आज मैं माथे पर कुंए का पानी डालूंगा, आज मैं तुम्हे कुंए के पानी से धो डालूंगा
कुंए का पानी से मन का मैल साफ होगा, कुंए के पानी से ह्रदय का मैल साफ होगा

संतालों में बाहा बोंगा कब से प्रचलन में आया, यह कहना बहुत ही कठिन है। लोक कथाओं से पता चलता है कि बाहा, हाराता में निवास के समय से मनाया जा रहा है। लोक कथाओं के अनुसार संताल, हाराता में बहुत ही शांतिपूर्वक रहते थे। वहां भोजन-पानी की कोई कमी नहीं थी, पर वे अपने सृजनकर्ता ठाकुर जी को भूल ही गए थे। लोभ-लालच, अनैतिक काम और बुरे आचरण से उनके आंखों में धूल जम गई थी, उन्हें ठाकुर जी का स्मरण नहीं रहा। दया, दर्द और धर्म-कर्म से वो दूर भागने लगे।

ठाकुर जी मनुष्यों के ये काम और व्यवहार को देखकर बहुत क्रुद्ध हो गए। उन्होंने मानव के विनाश करने का विचार किया, पर पिलचु हाड़ाम (आदि पिता ) और पिलचु बूढ़ी (आदि माता) हाराता में भी ठाकुर जी को भूले नहीं थे। वे दोनों ठाकुर जी बातें सुनकर बहुत चिंतित हुए और उनसे ऐसा न करने का आग्रह किया पर ठाकुर जी अपनी सोच पर अड़े थे। लेकिन फिर अपने भक्त पिलचु हड़ाम और पिलचु बूढ़ी के आग्रह पर वो मानवों को एक और मौका देने के लिए राजी हो गए।

पिलचु हाड़ाम और पिलचु बूढ़ी दोनों ने मिलकर मानवों को बहुत समझाया, पर वे अपने रस्ते  से भटक गए थे। उलटे इनका ही अपमान हुआ और ठाकुर जी की पूजा करना उन्हें स्वीकार न हुआ। इससे नाराज़ होकर ठाकुर जी ने धरती से मनुष्यों को ख़त्म करने के लिए पांच दिन-पांच रात तक अग्नि वर्षा की। आग की वर्षा करने से पहले उन्होंने एक जोड़ी मानवों के साथ सभी जीवों की एक जोड़ी एक सुरक्षित स्थान पर भेज दिया था, जिससे धरती पर फिर से मानव वंश की वृद्धि हुई।

बाहा पर्व प्रकृति के साथ सत्संग का त्यौहार है। इसमें सोहराय की मस्ती नहीं है, इस अवसर पर मुर्गे की बलि चढ़ाई जाती है। उत्सव के एक दिन पहले गांव के युवाओं द्वारा जाहेर थान की साफ-सफाई की जाती है और जाहेर साड़िम का निर्माण किया जाता है। एक जाहेर ऐरा, मोड़े को और मारंग बुरु के लिए और दूसरा गोंसाई एरा के लिए। उसके बाद स्नान करते हैं और विभिन्न पूजा के सामान पर तेल का लेपन करते हैं जैसे-सूप, टोकरी, तीर-धनुष, गड़ासे, सीरम झाड़ू, कलाई पर पहना जाने वाला कड़ा, गले का हार, एक घंटी एवं सिंगा।

पूजा के प्रथम दिन तीन देवों का आविर्भाव तीन अलग-अलग व्यक्तियों में होता है। जाहेर एरा जो कि देवी हैं, फिर भी किसी पुरुष पर ही आविर्भाव होती हैं और अपना सामान टोकरी और झाड़ू ग्रहण करती हैं। मोड़ेको तीर और धनुष ग्रहण करते हैं और मरांग बुरु गड़ासे को पकड़कर जाहेर थान की और प्रस्थान करते हैं। जाहेरथान में जाहेर ऐरा झाड़ू बुहारती है और नाइके इन देवताओं को अपने साथ लाई सामग्री रखने को कहते हैं।

इसके बाद देवताओं से नाइके वार्तालाप  करते हैं, अंत में नायके द्वारा बोंगाओं को स्नान कराया जाता है। पूजा के दूसरे दिन प्रायः गांव के लोग जाहेर थान को जाते हैं। एक साल वृक्ष का चुनाव कर मोड़े द्वारा तीर चलाया जाता है। मरांग बुरु उस पर चढ़ कर साल के फूल से लदा टहनी  तोड़ते हैं और जाहेर एरा द्वारा वह फूल अपनी टोकरी में एकत्र करते हैं।

यही फूल नाइके, गांव के लोगों को भेंट स्वरूप प्रदान करते हैं। औरतें इसे अपने जूड़े में सजाती हैं और पुरुष इसे अपने कान में सजाते हैं।

नाइके द्वारा मुर्गे की बलि दी जाती है और उसे पकाकर प्रसाद स्वरूप नाइके और उनके पुरुष सहयोगी खाते हैं। पूजा की समाप्ति पर नाइके बोंगाओं के पैर धोते हैं। गांव के प्रत्येक घर के छटका में लोटे में पानी और तेल सजाया हुआ रहता है। नाइके और बोंगाओं के आगमन पर उनके पैर धोया जाता है और अवशिष्ट जल लोगों पर डाला जाता है।

संतालों के जीवन में बाहा बोंगा और बाहा अर्थात पुष्प का बहुत महत्व है। प्रकृति की संतान होने के नाते वह प्रकृति की रक्षा भी करते हैं, लेकिन आज आदिवासियों द्वारा जंगल की कटाई का विरोध  करना उन्हें महंगा पड़ रहा है और उन्हें ‘विकास विरोधी’ का उपनाम दिया जा रहा है, जो सवर्था अनुचित है।

लेखक जुवान ओनोलिया (प्रगतिशील संताली लेखकों का अंतर्राष्ट्रीय संगठन) के अध्यक्ष हैं।

फोटो आभार: फेसबुक पेज One Life to Travel

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