भारत में शिक्षा में सुधार के लिए क्या करें ?

Posted by rock star
March 3, 2018

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भारत जो कभी विश्व गुरु कहलाता था जहाँ दुनिया भर से विद्यार्थी अध्ययन – अध्यापन के लिए आते थे और अपना कैरियर बनाते थे। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि यहाँ विश्व के अग्रणी विश्वविद्यालय थे जिनमें तक्षशिला विश्वविद्यालय इस्लामाबाद ,नालंदा विश्वविद्यालय बिहार, उदांतपुरी बिहार, ,सोमपुरा, जगददला, पश्चिम बंगाल में,नागार्जुनकोंडा, आंध्र प्रदेश में,विक्रमशिला विश्वविद्यालय, ,वल्लभी गुजरात ,वाराणसी ,कांचीपुरम, तमिलनाडु ,मणिखेत, कर्नाटक,शारदा पीठ, कश्मीर ,पुष्पगिरी, उड़ीसा में स्थापित थे जिससे स्पष्ट है कि सम्पूर्ण भारत में उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों की श्रृंखला का निर्माण किया गया था । यहाँ सौभग्य की बात ये थी कि इन विश्व विद्यलयों में इस धरा के सबसे योग्य व अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित शिक्षक थे जिनमें आचार्य चाणक्य, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य आदि शामिल हैं । इस सर्वोत्तम शिक्षा व्यवस्था का परिणाम यह हुआ कि भारत साहित्य,कला,विज्ञान, व्यापार-वाणिज्य, गणित, आदि आदि क्षेत्रों में विश्व का सिरमौर बना हुआ था जो निम्नलिखित उद्धरणों से सिद्ध होता है:-
– परमाणु सिद्धांत के आविष्कारक : आचार्य कणाद ,
-बौधायन भारत के प्राचीन गणितज्ञ और शुल्ब सूत्र तथा श्रौतसूत्र के रचयिता हैं। पाइथागोरस के सिद्धांत से पूर्व ही बौधायन ने ज्यामिति के सूत्र रचे थे,
– न्यूटन से 500 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण के नियम को जान लिया था और उन्होंने अपने दूसरे ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ में इसका उल्लेख भी किया है,
– पतंजलि एक महान चिकित्सक थे। पतंजलि रसायन विद्या के विशिष्ट आचार्य थे- अभ्रक, विंदास, धातुयोग और लौहशास्त्र इनकी देन है,
– अथर्ववेद में आयुर्वेद के कई सूत्र मिल जाएंगे। धन्वंतरि, रचक, च्यवन और सुश्रुत ने विश्व को पेड़-पौधों और वनस्पतियों पर आधारित एक चिकित्साशास्त्र दिया।
– महर्षि सुश्रुत सर्जरी के आविष्कारक माने जाते हैं। 2600 साल पहले उन्होंने अपने समय के स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के साथ प्रसव, मोतियाबिंद, कृत्रिम अंग लगाना, पथरी का इलाज और प्लास्टिक सर्जरी जैसी कई तरह की जटिल शल्य चिकित्सा के सिद्धांत प्रतिपादित किए।
• – नागार्जुन ने रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान पर बहुत शोध कार्य किया। रसायन शास्त्र पर इन्होंने कई पुस्तकों की रचना की जिनमें ‘रस रत्नाकर’ और ‘रसेन्द्र मंगल’ बहुत प्रसिद्ध हैं । इसी प्रकार यदि कला- साहित्य में भारत के महान योगदान को देंखें तो यह वैदिक काल से ही आरम्भ हो गया था..जो हमें ऋग्वेद,अथर्ववेद आदि में दिखता है और मौर्य व गुप्त काल मे परिपक्वता से सामने आता है । जब हरिषेण, शाव(वीरसेन), वत्सभट्टि वासुल – कालिदास, भारवि, भट्टि, मातृगुप्त, भर्तृश्रेष्ठ तथा विष्णु शर्मा आदि की रचनाओं को पढ़ते हैं तब हमें ज्ञात होता है कि भारत विश्व गुरु क्यों कहा जाता था।
अब यहाँ प्रश्न यह उठता है कि प्राचीन काल में भारत विश्व गुरु क्यों था ? यदि इस प्रश्न उत्तर ढूंढते हैं तो इसे निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं:-
• इन विश्व विद्यलयों को राज्य से आर्थिक सहायता अवश्य प्राप्त होती थी परंतु राज्य का कोई नियंत्रण नही होता था । ये अपना प्रबन्धन स्वयं सम्भालते थे ।
• विश्व विद्यलयों में केवल योग्य शिक्षक ही नियुक्त किये जाते थे सम्भवतः इसीलिए किसी अयोग्य शिक्षक का उद्धरण भारतीय इतिहास में नही मिलता ।
• इन सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी की शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात बहुत सटीक था ।
• भौतिक ज्ञान के साथ आध्यत्मिक ज्ञान के मध्य उत्कृष्ट संतुलन स्थापित था । परिणाम स्वरूप देश युवाओं का सम्पूर्ण मानसिक विकास होता था ।
• विद्यार्थियों को अधिकारों के साथ कर्तव्यों के पालन का ज्ञान दिया जाता था जिससे योग्य नागरिक गुणों का विकास हो सके ।
• शिक्षक अध्यापन को व्यवसाय से अधिक अपना कर्तव्य समझते थे ।
• देश भर में विशाल, ज्ञानवर्धक पुस्तकों से समृद्ध पुस्कालयों की स्थापना की गई थी ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि प्राचीन काल में भारत के विश्वगुरु होने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारक थे । परंतु अब प्रश्न उठता है कि ऐसा क्या हुआ कि वर्तमान काल में, वह भारत जो विश्व का नेतृत्व करता था, आज एक पिछलग्गू राष्ट्र बन गया है ??
तो इसका उत्तर यह है कि मध्यकाल में जहां एक तरफ प्राचीन काल से चली आ रही शिक्षा व्यवस्था को प्रताड़ना का सामना करना पड़ा वहीं दूसरी तरफ इसकी राजकीय सहायता बन्द हो गई ।
परंतु इसका अर्थ यह नही था कि मध्यकाल में शिक्षा के लिए कोई कार्य नही किया गया वरन चित्रकला, स्थापत्य कला,संगीत आदि क्षेत्रों में पर्याप्त विकास हुआ लेकिन फ़ारसी को राजकीय भाषा का दर्जा देने तथा अब तक कि उपलब्धियों को नजरअंदाज करने के चलते इसके विकास की धरा में व्यवधान अवश्य उतपन्न हो गया परंतु इसके बावजूद व्यापार-व्यवसाय में भारत अग्रिण बना रहा ।
इस समयकाल के प्रवाह में भारत जब औपनिवेशिक गुलामी के काल में पहुँचता है तब शासन का केवल एक उद्देश्य रह गया वह था शोषण। जिसके चलते भारत एक बाजार बन कर रह गया, जबकि इसकी महान शिल्प तथा हस्तकला का विनाश हो गया जो कि विदेशी सत्ता की एक सोची समझी रणनीति थी । वहीं नई खोजों तथा अनुसंधान की जो संस्कृति मध्यकाल में मन्द पड़ गई थी वह अब लगभग मृतप्रायः हो गई और साथ ही जिस शिक्षा प्रणाली का विकास किया गया वह केवल अंग्रेजों की तत्कालीन आवश्यकता पर आधारित थी। जिसने भारतीयों की स्वतंत्र सोचशैली को नष्ट करके रख दिया जिसका भुगतान भारत को आज भी करना पड़ रहा है क्योंकि इसी शिक्षा प्रणाली के चलते भारत शोध और अनुसंधान में पिछड़ता चला गया।
परंतु यहाँ यक्ष प्रश्न यह है कि ऐसा क्या किया जाए कि भारत इस रुग्ण शिक्षा व्यवस्था से निकल कर एक प्रगतिशील तथा समावेशी शिक्षा प्रणाली की तरफ अग्रसर हो सके ?
वास्तव में यह कोई सरल कार्य नही है इसके लिए समाज,सरकार,गैर सरकारी संगठन तथा विभिन्न संस्थाओं को मिलकर सतत, समविन्त, सकारात्मक परिवर्तनकरी कदम उठाने होंगें जिसमें निष्पक्षता और निष्ठा के साथ उच्च स्तर के समावेश की अतिआवश्यकता होगा । जिसके लिए निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं:-
1. प्राथमिक विद्यालय स्तर (1 -5 वीं तक) पर बच्चों को शिक्षा के बोझ से मुक्त किया जाये क्योंकि बोझ उठाने में किसी की भी रुचि नही होती । इसके लिए आरंभिक शिक्षा को जहाँ एक ओर अच्छा नागरिक बनने का माध्यम बनाया जाए वहीं दूसरी ओर इसमें मुक्त सोच को विकसित करने का आधार बनाया जाये। जबकि अनिवार्य रूप से प्राथमिक स्तर पर बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा दी जाये।
2. मध्यमिक विद्यालय स्तर(6-10 वीं तक) की शिक्षा के माध्यम से बच्चों में ज्ञान-विज्ञान के साथ इतिहास के प्रति गौरव और उत्साह को विकसित किया जाये । जिससे राष्ट्रभक्ति का विकास हो सके । इसी समय बच्चों को वैश्विक स्तर की विचार प्रणाली का विकास किया जा सकता है । जिसके लिए उन्हें देश के महान वैज्ञानिकों, इंजीनियरों,साहित्यकारों,कलाकारों आदि से मिलवाया जाए जिससे वो अपने आंतरिक गुण को पहचान कर अपने भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकें।
3. उच्च विद्यालय स्तर की शिक्षा (11-12 वीं ) को सैद्धान्तिक के साथ व्यवहारिक बनाया जाये जो की रोजगारपरक हो। जिसमें इच्छुक बच्चों को दस्तकारी का प्रशिक्षण दिया जाये जो विद्यालयी शिक्षा के पश्चात बेरोजगारों की फौज में ना शामिल हों।
4. उच्चतर शिक्षा (विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा) को शोध-अनुसंधान पर आधारित एक ऐसी शिक्षा प्रणाली बनना चाहिए जिसमें विज्ञान-वाणिज्य के साथ मानविकी विषयों का पर्याप्त संतुलन हो।
5. उच्चतर शिक्षा में सरकार केवल निष्पक्ष आर्थिक अनुदान देने तक सीमित रहे। अथवा सरकारी हस्तक्षेप नियुनतम हो।
6. इसके लिए संविधान में संशोधन करके एक संवैधानिक निकाय की स्थापना की जाये जो स्वतन्त्रता पूर्वक विश्व विद्यलयी शिक्षा का प्रबंधन करे।
7. साथ ही स्नातक से ऊपर की शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिये स्नातक तक कि शिक्षा को अनिवार्य और मुफ्त कर देनी चाहिये। जबकि इससे ऊपर की शिक्षा को पूर्ण प्रतियोगिता आधारित बना देनी चाहिए। जिससे केवल योग्य व्यक्ति ही उच्चतर शिक्षा में जायें । परिणामस्वरूप देश को उत्कृष्ट शिक्षक ही प्राप्त हो सकेंगें।
8. विश्व विद्यलयी स्तर पर शिक्षकों का चुनाव बहुत ही अपारदर्शी तरह से हो सकता तथा भाई-भतीजावाद से प्रभावित होता है जिसके चलते बहुत से योग्य प्रत्याशी बाहर रह जाते हैं । इसलिये यहाँ पर शिक्षकों की नियुक्ति संघ लोकसेवा आयोग की तरह एक स्वतंत्र संस्था के द्वरा परीक्षा के माध्यम से किया जाये ।
9. साथ ही नियुक्त शिक्षकों की योग्यता जांच के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण वा परीक्षा की व्यवस्था भी की जाये और जो योग्यता पर खरा ना उतरे उसे पदमुक्त कर दिया जाये। साथ ही शिक्षकों की उपस्थिति को बनाये रखने के लिये इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों (थम इम्प्रेषन) का प्रयोग किया जाये।
10. जिसप्रकार शिक्षक विद्यर्थियों की योग्यता की जांच करते हैं उसी प्रकार प्रत्येक सत्र में एक बार विद्यर्थियों को शिक्षकों की योग्यता का प्रमाण पत्र देने का अवसर देने चाहिये । इसकेलिए वोटिंग की व्यवस्था अपनाई जा सकती और यदि किसी शिक्षक को पचास प्रतिशत विद्यार्थी भी मत ना दें उसकी पदोन्नति रोक दी जाये।
इसप्रकार स्पष्ट है कि भारत में शैक्षिक सुधार करने के लिऐ बड़े पर परंतु कठोर कदम उठाने पड़ेंगें जिससे सम्पूर्ण शिक्षा-व्यवस्था का कायाकल्प हो सके । इसके लिए प्राचीन के साथ आधुनिक ज्ञान को मिलाकर, वैज्ञानिक और मानविकी विषयों में संतुलन स्थापित कर के किया जा सकता है जिसमें एक संवैधानिक शैक्षिक आयोग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। जबकि सरकारी अधिकारियों के लिए यह अनिवार्य कर देना चाहिये कि उनके बच्चे सरकारी विद्यलयों में ही पढ़ें इसके दो लाभ होंगें एक तो इससे सरकारी विद्यलयों की गुणवत्ता बढ़ेगी दूसरे शिक्षा का बाजारीकरण रुकेगा।

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