मैं औरत हूँ तुम्हारे मर्दानगी की पहचान नहीं

Posted by Deepak Bhaskar
March 8, 2018

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आज 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। आज कही मेरे नाम पर भाषण हो रहा है तो कही संगोष्ठी, पर ये सब मुझे कतई खुशी नही दे रही है। शायद! इसलिए भी, क्योंकि जो मैं चाहती हुँ वो कोई भी पूछ नहीं रहा है। यह सवाल मैंने खुद से भी पूछा है कि आखिर मैं क्या चाहती हूँ? इस सवाल के जबाब में कहीं मेरा माँ होना, कहीं मेरा बहन होना और कहीं पत्नी होना आड़े आ जाता है। मैं कहती हूँ कि मुझे मेरा हक तो बाद में देना पहले मेरी पहचान मुझे वापस दो। पहले मैं औरत हूँ उसके बाद ही तो ये तमाम रिश्ते जो तुमने गढ़े हैं, आते हैं। मैं तुमसे अलग हूँ, मेरे विचार तुमसे अलग हो सकते हैं और होते भी हैं, मेरा दुनिया को देखने का नजरिया अलग है, मैं विध्वंशकारी विचारधारा में विश्वास नही रखती, मैं तो शांति और समृद्धि में विश्वास रखती हुँ। मैं सृजन करती हूँ, विनाश तो दूर-दूर तक मेरे सोच में नहीं, मैं एक-एक को जोड़कर समाज बनाने की प्रक्रिया में लगातार प्रयत्नशील हूँ। बस! मैं चाहती हूं कि तुम, मेरा तुमसे अलग होने वाली बात का “आदर करो और उसे स्वीकार करो”। तुम बस ये करो बाकी अगर तुमने मुझे अपनी बहन, माँ, पत्नी और किसी भी रिश्ते में स्वीकार न भी किया तो भी मैं खुश रहूँगी।

हजारों साल से मैं तुम्हारी मर्दानगी की पहचान बनकर जीती आई हूँ अब मुझे खुद की पहचान चाहिए। मैं उड़ना चाहती हूं, गिरना चाहती हूँ, उठना चाहती हूं बस तुम मुझे बार-बार रोको मत। तुम्हारी मर्दानगी में ऐसा कुछ भी नही जिसे लेकर मैं खुश हो जाऊं। तुम्हारी मर्दानगी तो किसी के खून से लथपथ है लेकिन मैं इंसान हूँ मुझे किसी के खून से अपने बाल नही धोने हैं। तुमने मेरे नाम से कितने युद्ध लड़े वो भी मुझसे बिना पूछे। मैं बस यही तो चाहती हूं कि तुम मुझसे पूछो अगर तुम मेरे लिए कुछ करने जा रहे हो। किसी द्रौपदी ने तुमसे दुशाशन का खून नहीं मांगा था, वो कहानी भी तुमने लिखी। जिस पांच गाँव के लिए तुम लड़े उस पांच गांव में कौन सा गांव मेरे लिए था? मैंने सिर्फ दुर्योधन में मेरा हक छीनने वाला नही देखा बल्कि तुममें भी देखा मेरे पांडव, तुमने भी मेरे साथ वही किया। मुझे तुमसे ज्यादा नफरत है क्योंकि तुमने मेरे नाम पर खुद की लड़ाई लड़ी।

बस मैं अब कोई युद्ध नहीं चाहती, खुद मुझे तुमसे लड़ना है। मैं लड़ूंगी, किसी रावण से बाद में, पहले मुझे तुमसे ही लड़ना है। मैं लड़ी हुँ अंग्रेजों से लक्ष्मीबाई की तरह, कुर्बान हुई हूँ इस देश की मिट्टी को किसी फिरंगी से आजाद करवाने के लिए। तुम आज भी खुद के लिए सब कुछ कर रहे हो।

तुम मुझे किसी घर में, मंदिर में, देवी मत बनाओ, मुझे तुम्हारी पूजा नही चाहिए। मैं देवी नहीं बल्कि औरत हूँ, इंसान हूँ,  मुझे बस इतना समझो मैं खुद को धन्य मान लूंगी। तुम्हारी हर हरकत में, मुझे अपने तिरस्कार की बू आती है बस तुम खुद को परमेश्र्वर न समझो तो ही तुम मुझे समझ पाओगे।

तुम क्यों बार-बार कहते हो कि मुझे समझना आसान नहीं। हाँ! तुम्हारे लिए मुझे समझना आसान नहीं क्योंकि मैं इंसान हूँ  और मुझे समझने के लिए तुम्हें पति-परमेश्वर के रूप से निकलकर इंसान होना पड़ेगा। इंसान ही इंसान को समझ सकता है।

सच कहूँ, किसी पत्थर से टकराने से मुझे ज्यादा चोट नहीं लगती, जितना कभी तुमसे टकराने से लगती है। पत्थर सिर्फ शरीर को चोट पहुंचाती है तुम मेरे अंतर्मन को चोटिल करते हो। सोचो जरा, तुम्हें कोई अनजान किसी भारी भीड़ में जबरदस्ती जहाँ-तहाँ छुए, कितनी घिन आती है उस छुअन से। तुम्हें किसने कहा कि मुझे मजा आता है? क्या तुम्हें कोई गलत ढंग से छुए तो तुम्हे अच्छा लगता है, नहीं न!

मुझे परेशान कर, छेड़छाड़ कर, मुझे जलाकर, मेरा बलात्कार कर तुम  मर्द हो जाते हो शायद इसलिए भी मैं कभी मर्द नहीं बनना चाहती। किसी का उत्पीड़न कर कुछ बन जाना, कोई आदर्श तो नहीं! तुमने हजारों साल में कोई आदर्श तक स्थापित नहीं किया। तुम सोचो! हजारों साल से तुम्हारे उत्पीडन को सहने के बावजूद मैं तुम्हारे जैसा कदापि नहीं बनना चाहती, तुमसे कोई बदला भी नहीं लेना चाहती। बदला लेना तो कमजोर लोगों की फितरत है, मैं तुम्हे माफ करते आई हूँ, कभी माँ बनकर, कभी बहन, तो कभी पत्नी।

मैं कभी कमजोर अबला नहीं थी, तुम थे, तुमने अपनी कमजोरी छुपाने के लिए मुझे ही कमजोर बनाते रहे हो। मैं तुम्हारी नादानी पर हँसने के सिवाय क्या कर सकती थी। बहरहाल, अब समय आ गया है कि तुम खुद संभाल जाओ, मुझे तुम्हे आहत करने में कतई खुशी नही होगी। मैं औरत हूँ, मैं इंसान हूँ और तुम सिर्फ मर्द बनकर अब मेरे पास नही रह सकते, तुम्हें इंसान बनना ही पड़ेगा।

अच्छा सुनो! मैं बूढी होती हूँ, मेरे चेहरे पर झुर्रियां पड़ती  हैं, मेरी धमनियां चमड़े पर बाहर आ जाती हैं, मेरे बाल पककर सफेद हो जाते हैं। प्राकृतिक तौर पर समय के साथ, हर जीव के साथ यही होता है। बस! तुम्हें मैं सफेद बाल में डायन नजर आने लगती हूँ, बुढ़ापे में कुलटा दिखने लगती हूँ। मुझे तुम्हारी मूर्खता पर हसीं आती है। सुनो मुझे सिर्फ कुछ उम्र तक मत बांधो, मैं पूरी उम्र जीती हूँ। मैं सिर्फ जवान नहीं होती, बूढ़ी भी होती हूँ। खैर तुम कहाँ समझोगे, तुम्हें तो प्रकृति का यह नियम भी गंवारा नही होगा।

जाओ आज 8 मार्च को प्रण लो की तुम मेरे, तुमसे अलग पहचान वाले इंसान के तौर पर आदर करोगे और इस विभिन्नता को स्वीकार भी करोगे और मुझे तुमसे कुछ भी नही चाहिए। तुमहारी मर्दानगी का एक अंश भी मुझे नही चाहिए। बस याद रखो कि मैं औरत हूँ तुम्हारी मर्दानगी की पहचान नहीं. बाकि कोई एक दिवस नहीं बल्कि हर दिन तुम्हे मेरे बारे में नहीं बल्कि खुद के इंसान बनने के लिए सोचना होगा.

 

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