राजनीति बनाम समाज सेवा

Posted by वली सैफी
March 1, 2018

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सत्ता हासिल करने के लिए हमारे नेता आज कुछ भी कर सकते हैं। ठीक उसी तरह जैसे डुबता हुआ व्यक्ति बाहर निकलने के लिए हाथ पैर मारता है। यह कहना गल्त न होगा कि अब पूर्ण तरीके से राजनीति का अपराधी करण हो चुका है। राजनीति ओर अपराध का काफी समय से एक गहरा रिश्ता है। समय समय पर मंत्रियों, विधायक, सांसदो पर अपराध के आरोप लगते रहे हैं। पार्टी कोई भी हो लगभग सभी राजनीतिक दल पहले चुनाव जीतने के लिए कुछ ऐसे लोगो का सहारा लिया करते थे जिनकी छवि अच्छी नहीं होती थी, परन्तु आज वही लोग राजनीतिक पार्टीयों से टीकट लेकर चुनाव लड रहे हैं। अब चूंकी राजनीतिक पार्टीयों का कोई धर्म ईमान तो है नहीं सो उन्होने ऐसे लोगो को ही मंत्री बनाना शुरू कर दिया, 

सुप्रीम कोर्ट ने एक फेसले में कहा कि उमीदवार की पूरी जानकारी आम होनी चहिए तो ताकि वोटर को पता होना चाहिए कि वह कितना पढा लिखा है उसकी छवि कैसी है, क्राईम केस कितने हैं। पब्लिक की फजीहत से बचने के लिए राजनीति दलों ने कहना शुरू कर दिया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट उसे दोषी साबित न कर दें उसे अपराधी नहीं कहा जा सकता, अब आज के समय में तो राजनीति पार्टीयों में यह होड लग गई कि कौन कितने अपराधियों को जीता कर संसद या विधान सभा में भेजता है।

राजनीति के अपराधीकरण से अपराधी एक विशेष समुदाय के हीरों बनने लगा, जिसकी अपराधी की जगह जेल में होनी चाहिए, उसे पुलिस की सुरक्षा प्रदान करी जा रही है इससे बडी विडंबना ओर क्या होगी कि अपराधी जेल में रहते हुए भी चुनाव जीतने लगे।  यानी अब कहा जा सकता है कि राजनीति में अपराधी नमक के समान, सब्जी नमक के बिना बेकार ओर राजनीति बहुबलियों के बिना बेकार, अब वह राजनीति नहीं रही जिसे कभी समाज सेवा के तौर पर देखा जाता था,

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