रिजर्वेशन की बैसाखी नहीं, अपना हक मांगो

Posted by Rachana Priyadarshini
March 12, 2018

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तीन दिनों पहले वुमेंस डे का सेलिब्रेशन भारत सहित पूरी दुनिया में जोर-शोर से मनाया गया. लगभग हर स्कूल-कॉलेज, ऑफिस या संस्थान-संगठन में महिला मुद्दों पर खूब बहस हुई. उन्हें गिफ्ट दिये गये. पुरस्कारों से नवाजा गया और भी न जाने क्या-क्या. वहीं कई महिलाएं ऐसी भी रहीं, जिन्हें आज तक यह नहीं मालूम कि यह कमबख्त ‘वुमेंस डे’ है क्या बला, क्योंकि उनके जीवन में तो हर रोज की तरह वही खिच-खिच, वहीं पिच-पिच….
वैसे हर साल की तरह इस साल भी महिला आरक्षण का मुद्दा भी काफी जोर-शोर से उठा. इसके समर्थन में महिला संगठनों ने चीख-चीख कर नारेबाजी की. मुझे समझ नहीं आता कि महिलाएं आरक्षण की मांग करती क्यों है.
एक तरफ तो आज के दौर की हर महिला चाहे वह झुग्गियों में ही क्यों न रह रही हो, पुरुषों से बराबरी करने की बात कहती हैं. उनके साथ कंधे-से-कंधा मिला कर चलना चाहती हैं, खुद को उनसे श्रेष्ठ बताती है (महिला दिवस पर ऐसे कई मैसेज वायरल हुए, जिसमें महिलाओं को पुरुषों से श्रेष्ठ बताया गया था और महिलाएं उन्हें फॉरवर्ड करके आत्मगौरव की अनुभूति कर रही थीं) वहीं दूसरी तरफ उन्हें आरक्षण की बैसाखी भी चाहिए. मैं पूछना चाहती हूं उन तमाम महिलाओं से क्या उन्हें खुद पर भरोसा नहीं? क्या वे खुद को पुरुषों से कमतर या अक्षम मानती हैं, जो उन्हें आगे बढ़ने के लिए आरक्षण नाम की वैसाखी का सहारा चाहिए.
अरे देवियों, तुम यह क्यों नहीं समझ रही कि इस समाज ने पहले से ही धर्म-परंपरा और रीति-रिवाजों के नाम पर तुम्हें कमजोर साबित कर रखा है. अब आरक्षण देकर तुम्हें और भी कमजोर साबित करने की साजिश रची जा रही है. आज देश में जो स्थिति किसी अल्पसंख्यक या दिव्यांग व्यक्ति की है, कल को आरक्षित कोटे में आने पर वहीं तुम्हारी भी हो जायेगी. तुम्हें भी ‘दया का पात्र’ समझा जाने लगेगा. क्या तुम चाहती हो कि लोगों की नजरों में तुम हमेशा ‘अबला’ और ‘अक्षम’ ही बनी रहो? अरे, जो तुम्हारा है, तुम्हारे हक में है उसके लिए गिड़गिड़ाना क्यों? जब संविधान ने तुम्हें हर स्तर पर बराबर का अधिकार दिया है, तुम्हारे और पुरुषों के बीच लिंग, जाति, धर्म आदि के आधार पर विभेद नहीं किया है, तो तुम आरक्षण मांग कर खुद को कमजोर क्यों बना रही हो. समानता तुम्हारा हक है-हर स्तर पर. चाहे घर हो या बाहर. अगर वह तुम्हें नहीं मिलता है, तो उसका विरोध करो. उसके लिए आवाज उठाओ. आगे बढ़ो. लड़ो और तब तक लड़ो जब तक कि तुम्हें तुम्हारा वह हक नहीं मिल जाता. पर प्लीज खुद को ‘बेचारी’, ‘अबला’ या ‘निरीह प्राणी’ मान कर आरक्षण की मांग मत करो. फिर चाहे वह रेल, बस या सिनेमा हॉल की टिकट खिड़की हो या फिर संसद में जनप्रतिनिधित्व का आरक्षण हो.
कहते हैं जो इंसान रोता है, दुनिया उसे रूलाती है. जो चिढ़ता है, लोग उसे चिढाते हैं और जो खुद को कमजोर समझता है, दुनिया उसे और भी कमजोर बना देती है. तो क्या तुम मानती हो कि तुम्हारे अंदर वह क्षमता नहीं कि तुम बिना बैसाखी के चल सको. बिना आरक्षण के अपनी मंजिल पा सको. अपने सपनों को पूरा कर सको.
मेरा मानना है कि आरक्षण हमारे समाज में एक ऐसे कोढ की तरह है, जिसे जितना कुरेदा जाये, वह उतना ही विकाराल रूप लेता जाता है. पहले धर्म आधारित आरक्षण, फिर जाति आधारित आरक्षण, फिर उपजाति आधारित आरक्षण, उसके बाद क्षेत्र आधारित आरक्षण और अब लिंग आधारित आरक्षण. अगर यही हाल रहा, तो आगे इस आरक्षण के अभी और भी न जाने कैसे और कितने रूप देखने को मिलेंगे.
बंद करो ये आरक्षण की मांग यार. बंद करो खुद को कमजोर समझना और रोना-धोना. अगर तुम वाकयी इस दुनिया में कुछ अलग करना चाहती हो, अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहती हो, तो बंद करो आरक्षण की ये बकवास मांग. हर जगह, हर कहीं, हर मोर्चे पर पुरुषों के बराबर खड़े होकर अपनी क्षमता साबित करो. अपने साथ-साथ अपनी उन बहनों को भी शिक्षित और जागरूक बनाओ, जो तुमसे निचले स्तर पर हैं. फिर उन्हें भी आगे मोटिवेट करो कि वे भी अपने से निचले स्तर की महिलाओं को ऊपर उठने में मदद करें. श्रृंखला जितनी तेजी से आगे बढ़ेगी, तुम भी उतनी तेजी से ऊपर उठती जाओगी. फिर तुम्हें अपने अधिकारों के लिए किसी के आगे गिड़गिड़ाना नहीं पड़ेगा. तुम खुद उनका उपयोग करने में सक्षम हो जाओगी. फिर साल का एक दिन नहीं, हर दिन तुम्हारा होगा और उसे तुम खुद सेलिब्रेट कर सकोगी पूरे जोश और आत्मविश्वास के साथ.

हैप्पी वुमेंस लाइफ फॉरएवर…!!

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