महिलाओं के विकास से विकसित होगा समाज।

Posted by Sandeep Suman
March 7, 2018

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‘हड़प्पा सभ्यता’ या ‘सिंधु घाटी की सभ्यता’, अपने नगरीय व्यवस्था वा अपने विकसित सामाजिक व्यवस्था के लिए विश्व भर में जाना जाता है। जब हमसे कोई हड़प्पा की बात करता है तो हम उसकी पक्की ईंटो से बने पक्के घरों, पक्की सड़के, किले से घिरे शहर, मोहनजोदड़ो का स्नानागार आदि हमारे आँखों के समक्ष आता है। लेकिन क्या आपको पता है हड़प्पा सभ्यता या सिंधु घाटी सभ्यता की वो विशेषता जो सामाजिक दृष्टिकोण से सबसे महत्वपूर्ण है, जिसे शायद इतिहास में ना उतनी महत्ता दी गई ना ही उस व्यवस्था पर ज्यादा खोज की गई ? वो है ‘मातृसत्तात्मक व्यवस्था’।
हड़प्पा सभ्यता या सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे बड़ी सामाजिक विशेषता उसकी मातृसत्तात्मक होना है, दुनिया में काफी कम ऐसे उदाहरण देखने को मिलते है जहाँ मातृसत्तात्मक व्यवस्था हो। लेकिन सवाल उठता है आखिर क्यों आज मैं 4500 साल पुराने उस व्यवस्था की चर्चा कर रहा हूँ ? वो इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि हड़प्पा की नगरीय वा विकसित संस्कृति को सिर्फ एक विकसित संस्कृति के रूप में ना देख ‘मातृसत्तात्मक व्यवस्था’ और ‘विकसित समाज’ की अवधारणा को साथ में देखे। क्योंकि उसके बाद की पितृसत्तात्मक सभ्यता या आधुनिक समाज को भी देखे तो आपका विकास हड़प्पा संस्कृति के विकास के समक्ष बौना प्रतीत होगा, भौतिक और सांस्कृतिक दोनों रूपो में।
आज कई कंपनियों और कई देशों के प्रमुख पदों पर महिलाएं है, वो आसमान में हवाई जहाज उड़ा रही है, अंतरिक्ष कार्यक्रमो से लेकर लड़ाई के मैदान में भी अपना झण्डा गाड़ चुकी है, लेकिन एक सवाल आज भी उठता है, क्या वो सामाजिक रूप से आज भी विकसित है ? क्या आज भी उन्हें समाज में बेटों के बराबर का दर्जा प्राप्त है ? क्या वो अपने जिंदगी के फैसले स्वमं लेने में सक्षम है ? या आज भी उनके विकास के राह में बंदिशे है ? सच्चाई ये है कि वो विकास तो कर सकती है, लेकिन एक तय ढांचे में, एक तय रस्ते और तय उम्र के पड़ाव में ही, एक तय पारिवारिक पृष्टभूमि के ही अधीन।
भूर्ण हत्या पर एक हद तक रोक तो लग गई, लेकिन उन सपनों के हत्या का क्या ? जो एक लड़की अपने जीवन में देखती है। उस स्वतंत्रता का क्या जो एक लड़की अपने माँ-बाप या पति से चाहती है ? आज भी तो क़त्ल हो रहे है, गर्भ में ना सही लेकिन उनके सपनों को उनकी इच्छाओ का तो आज भी कत्ल हो रहा है । आज उन्हें शिक्षा तो दी जा रही है, हायर स्टडी के लोए भी भेजा जाता है, लेकिन विरले ही उसमें लड़कियों की राय ली जाती है। अगर अपने पसंद के किसी लड़के से शादी की बात हो तो आज भी घर में तूफ़ान आ जाता है, प्रेम विवाह को उसके चरित्र से जोड़ दिया जाता है। किसी प्रकार की दुर्घटना हो तो सीधे-सीधे दोष महिलाओं पर मढ़ दिया जाता है। यानि आज के दौर में महिलाओं को विकास करने हक़ है लेकिन उसमें शर्ते लागु है,और तो और इसमें शर्ते नीचे छोटे अक्षरों में नहीं बल्कि बोल्ड में लिखा होता है।
अगर हम एक विकसित समाज, एक विकसित देश की कल्पना करते है तो उसमें महिलाओं की भूमिका सबसे अहम् होगी, केवल अट्टालिकाए खड़ी कर देने से, रेल सड़के बना देने से कोई समाज विकसित नहीं हो जाता। वो असल मायने में तब ही विकसित होगा जब महिलाओं का संपूर्ण रूप से उसमे भागीदारी होगी, सांस्कृतिक वा सामाजिक रूप से आपका समाज विकास करेगा तब ही वो भौतिक विकास विकास का कोई अर्थ होगा। हड़प्पा इसका सटीक उदहारण है जहाँ सांस्कृतिक व सामाजिक विकास ने एक विकसित सभ्यता की नींव रखी, और इसमें उनका ‘मातृसत्तात्मक’ सोच ने प्रमुख भूमिका निभाई। महिलाओं के विकास के बिना समाज का संपूर्ण विकास कभी संभव नहीं।

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