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साम्प्रदायिकता ,एक साजिश

Posted by Chandrveer Chaudhary
March 1, 2018

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साम्प्रदायिक शक्तियां हिंदुस्तान में बहुत पहले से मौजूद हैं। गांधी जी और भगत सिंह के लेखन से पता चलता है कि हालत तब भी ऐसे ही रहे होंगे। उस वक्त इस मानसिकता ने देश को बीमार बनाने का काम किया था, ये ताकतें उस समय के किसान मजदूर और स्वतंत्रता आंदोलनों के विपरीत खड़ी थी। तभी तो भगत सिंह जैसे नवयुवक को ‘सांप्रदायिकता और उसका इलाज’ नाम से लेख लिखना पड़ा था।

वो जानते थे कि ये मानसिकता हमारे लिए खतरनाक ही नही बल्कि समाज के भविष्य के लिए घातक है, वो इसके दुष्प्रभावों से वाकिफ थे।भगत सिंह आज भी उतने ही प्रासंगिक है जितने कि अपने समय में थे, क्योंकि तब से आज तक कुछ भी नहीं बदला है, हालात वहीं के वहीं हैं।आए दिन कहीं न कहीं, कोई न कोई सांप्रदायिकता का शिकार होता रहता है।

भगत सिंह और महात्मा गांधी में वैचारिक मतभेद थे, लेकिन इसके बावजूद उनमें कई समानताएं भी थी, जैसे कि दोनों ही साम्प्रदायिकता के घोर विरोधी थे। भगत सिंह भी अहिंसा का सर्वोपरि मानते थे, लेकिन आज के दौर में भगत सिंह को गांधी के सामने खड़ा करने की कोशिश की जाती है। इन दोनों ही महापुरुषों को अंधेरे में धकेल कर गोडसे जैसे हत्यारे को नायक साबित करने की कोशिश की जाती है।

ये बात मेरे मुल्क के नौजवानों को जाने क्यों समझ में नहीं आ रही है? जो भगत सिंह की विचारधारा का समर्थक होगा, वो गांधी जी का भी सम्मान करेगा। लेकिन अधिकतर समाज को भगत सिंह का चेहरा तो याद है लेकिन विचारधारा का कोई ज्ञान नहीं है। जब भी महापुरुषों को भुलाना हो तो उनको किताबों से हटाकर सिर्फ मूर्तियों में सीमित कर दो। ये किसी राजनेता द्वारा शहीदों के अपमान करने का सबसे आसान तरीका है।

इसी नायाब तरीके से कुछ लोग फर्ज़ी लोगों को देशभक्त साबित करने की फिराक में हैं। उन लोगों को नायक की तरह पेश किया जा रहा है जिन्होंने तब से लेकर आज तक हुकूमत की चापलूसी ही की है।

साम्प्रदायिकता असल में किसी एक धर्म को खत्म करने की मुहिम नहीं बल्कि सत्ता पाने का षड़यंत्र है, जिसमें मासूम लोगों (जो किसी भी धर्म के हो सकते हैं) को शिकार बनाया जाता है। भारत जैसे ‘लोकतान्त्रिक’ देश में यह तरीका बहुत हद तक कारगर भी है।आज भी समाज की ज़मीनी समझ में सामाजिक सौहार्द है, लेकिन वो सामाजिक सौहार्द मीडिया और नेताओं द्वारा कराए गए दुष्प्रचार से लड़ने में कमज़ोर साबित हो रहा है।

आप जिस टीवी को पैसे देकर देख रहे हैं, आप को पता ही नहीं कि वो आपको कितना ज़हरीला बना रहा है। खबर पढ़ने वाला एंकर आपके भीतर के इंसान की हत्या करता चला जा रहा है और आप को कोई फर्क ही नही पड़ रहा, है क्योंकि आप खुद से नहीं बल्कि टीवी से संचालित हो रहे हैं।

खैर नौजवानों को भगत सिंह के चेहरे से आगे, उसको समझना चाहिए। हर चीज़ का समाधान मिल जाएगा, अगर विचार किया जाए तो। मारो-मारो के शोर से बाहर निकला जाये तो। और हां एक बात और, साम्प्रदायिक लोग मानसिक रूप से बीमार है, उन्हें वक्त रहते इलाज की ज़रूरत है और उनका इलाज है कि आप उन्हें नज़रअन्दाज़ करते चले जाएं, उन्हें सुनना बंद कर दें।

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