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सार्वजनिक स्तनपान पर हमारे भारतीय समाज के पुरुष वर्ग की आपत्ति?

Posted by Himanshu Priyadarshi
March 12, 2018

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आज के समय में हमारे भारतीय समाज में हर तीसरी चीज टैबू(वर्जित या निषिद्ध कार्य) बनती जा रही है या यों कहें कि उसे टैबू के रूप में खोजा जा रहा है। हाल ही में केरल की एक मैगजीन ‘गृहलक्ष्मी’ के कवर पृष्ठ के लिए एक मॉडल द्वारा सार्वजनिक रूप से एक बच्चे को दूध पिलाते हुए माने ब्रेस्टफीडिंग कराते हुए तस्वीर देने के लिए उस मॉडल और मैगजीन दोनों की बहुत आलोचना की गई, तरह-तरह की तोहमतें मढ़ी गयीं, इसे प्रिसिद्धि पाने का घटिया और बेहूदा तरीका बताया गया और साथ ही भारतीय संस्कृति तथा रीति रिवाजों पर गहरी चोट मानी गयी अथवा बताई गई, हालांकि ऐसा है नहीं लेकिन बताया तो ऐसा ही गया है और आपत्ति जाहिर करने वालों में उंगली उठाने वालों में समाज का अधिकांश हिस्सा पुरुष वर्ग का है वो भी पितृसत्तावादी समाज का, उस पितृसत्तावादी समाज के जिसके लोग घटिया से घटिया रस्म-रीति-रिवाज़ और परम्पराओं पर इतना चौंड़ियाते हैं कि शरीर फटने को आ जाये…….इस समाज के लिए हर वो चीज निषिद्ध है जिससे महिलाओं की आज़ादी बढ़े और वे अपने हर अहसास को महसूस कर पाएं….चाहे वो मां की ममता का अहसास हो, चाहे भाई-बहन के प्यार का, चाहे पति-पत्नी के प्रेम का अहसास हो, लेकिन अधिकतर महिलाएं इस सबसे महरूम ही रह जाती हैं और अधिकतर पुरुषों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता वो इसलिए कि हमारा समाज अभी तक पितृसत्ता की जंजीरों में जकड़ा हुआ है और इसीलिए समाज में जब भी बदलाव की कोई भी पहल शुरू की जाती है तो चोट पितृसत्तात्मकता अथवा पुरुषप्रधानता को ही पहुंचती है पर सकारात्मकता ये है कि युवा पीढ़ी पर पितृसत्ता का असर न के बराबर है। यदि सार्वजनिक तौर पर माँ द्वारा बच्चे को दूध पिलाने को वर्जना के तौर पर लिया जा रहा है तो कहीं न कहीं ये सब समाज में स्त्री के स्तनों को उसकी अस्मिता और परिवार की इज़्ज़त के साथ जोड़कर देखे जाने के कारण ही है, दूसरा  कारण ये भी है कि पितृसत्तावदी पुरुष स्त्री को सिर्फ अपनी सम्पत्ति समझते हैं इंसान नहीं और वे नहीं चाहते कि कोई मर्द उसकी पत्नी या बहन से बात करे या देखे (ऐसे में इंसान होने के नाते स्त्रियों के भी अपने जज़्बात होते हैं इस बात को हमेशा ही भुला दिया जाता है) तो माँओं द्वारा सार्वजनिक रूप से स्तनपान कराना पुरुषों के लिए नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त ही होगा  लेकिन कोई भी स्त्री जब अपने बच्चे को दूध पिलाती है तब वह आम स्त्री नहीं होती बल्कि केवल मां होती है जिसकी सारी ममता उस वक़्त सिर्फ अपने बच्चे के लिए उमड़ रही होती है न कि किसी मर्द के लिए तो अपनी और बच्चे की सहूलियत के लिए मां चाहे जैसे दूध पिलाये ढककर या उघाड़कर…..किसी तीसरे को इस मामले में उंगली उठाने की कतई कोई आवश्यकता नहीं है।

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