सेकुलरिज्म, बस एक भ्रम?

Posted by Zaryab Afridi
March 10, 2018

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देश में पहली बार 2015 से 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाने का फैसला लिया गया। उस दिन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सेकुलरिज्म शब्द की “सही” व्याख्या बताई।

आरएसएस और उस से जुडे़ लोगों को यूं ही इस लफ्ज़ से ना जाने क्यूं चिढ़ होती है जबकि इस लफ्ज़ ने उनका कभी कुछ नुक़सान नहीं किया। उनका तर्क ये होता है कि सेकुलरिज्म इस देश के लोगों के खून में है। तो जो चीज खून में उसके काग़ज़ के होने पर उनको तकलीफ़ क्यूं होती है?

जब प्रधानमंत्री से पूछा जाता है कि उनका धर्म क्या है? तो वो कहते हैं, इंडिया। (हालांकि उनके मुख्यमंत्री लोग उनसे ज़्यादा सही जवाब देते हैं इस सवाल का)

जब उनसे उनसे पूछा जाता है आपकी किताब क्या है तो वो कहते हैं संविधान, लेकिन जब जाट आरक्षण पे कोर्ट का स्टे आता है तो रिव्यू पेटीशन की बात करते हैं।

महाराष्ट्र की तत्कालीन सरकार मराठों को 16 प्रतिशत और मुस्लिम को 5 प्रतिशत नौकरी और शिक्षा में आरक्षण देती है, मामला कोर्ट में जाता है, जिसके बाद कोर्ट सब खत्म करके मुसलमानों को सिर्फ शिक्षा में 5 प्रतिशत आरक्षण की इजाज़त देती है।

लेकिन प्रधानमंत्री जो ये कहते हैं कि मेरा धर्म इंडिया है मेरी किताब संविधान है, उनको जाट आरक्षण से कोई तकलीफ़ नहीं होती लेकिन मुस्लिम आरक्षण से इतनी तकलीफ़ होती है कि वो इसे खत्म करवा देते हैं।

मैं किसी के आरक्षण के खिलाफ नहीं हूं, पर जिस तबके के हालात के बारे में इतने सारे आयोग की सिफारिशें आईं, उनको नजरअंदाज करके खाली अपनी मनमानी करना ये कैसा सेकुलरिज्म है?

आज की राजनीति में जिस तरह ढिंढोरा पीटा जा रहा है “मैं हिन्दू हूं, मैं जनेऊ धारी हिन्दू हूं, मैं सबसे बड़ा हिन्दू हूं”  उस हिसाब से, वो दिन दूर नहीं जब सेकुलरिज्म बस संविधान के पन्नों में कैद हो कर रह जाएगा।

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