हर महिला को होनी चाहिए इन अधिकारों की जानकारी

Posted by Rachana Priyadarshini
March 7, 2018

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आजादी के 70 वर्षों बाद भी हमारे देश में महिलाओं की स्थिति शायद इस वजह से अब तक दयनीय बनी हुई हैं, क्योंकि उनमें से अधिकतर को अपने कानूनी अधिकारों के बारे में पता ही नहीं है. हर महिला को यह पता होना चाहिए कि संविधान की नजर में महिला व पुरुष समान हैं. उनमें कोई भेदभाव नहीं. कानूनी तौर से महिलाओं को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं.

1. जमीन जायदाद/पिता की संपत्ति पर हक
महिलाओं को अपने पिता और पिता की पुश्तैनी संपति में अपने परिवार के पुरुष सदस्यों के बराबर ही अधिकार प्राप्त है. अगर लड़की के पिता ने अपनी स्वअर्जित संपति के मामले में कोई वसीयत नहीं की है, तब उनके मरने के बाद उस संपत्ति में उसकी बेटी को भी उतना ही हिस्सा मिलेगा जितना बेटे तथा उनकी मां को मिलना चाहिए. यह अधिकार लड़की की शादी हो जाने के बाद भी कायम रहेगा.

2. पति की संपत्ति में हक
शादी के बाद पति की संपत्ति में महिला का मालिकाना हक नहीं होता, लेकिन पति का यह फर्ज बनता है कि वह अपनी हैसियत के हिसाब से महिला को गुजारा-भत्ता दे. महिला को अपने पति से समुचित भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार है. वैवाहिक विवादों से संबंधित मामलों में सीआरपीसी, हिंदू मैरिज ऐक्ट, हिंदू अडॉप्शन ऐंड मेंटिनेंस ऐक्ट और घरेलू हिंसा कानून के तहत के कोई पत्नी अपने पति से गुजारा भत्ता की मांग कर सकती है.
अगर पति ने अपनी स्व-अर्जित संपत्ति के संबंध में कोई वसीयत बनायी हो, तो उसके मरने के बाद उसकी पत्नी को वसीयत के मुताबिक संपत्ति में हिस्सा मिलता है, लेकिन पुश्तैनी संपत्ति के मामले में पति को अपनी पत्नी के फेवर में वसीयत करने का अधिकार नहीं है. अगर पति ने कोई वसीयत नहीं बनायी हो और उसकी मौत हो जाये, तो पत्नी को उसकी खुद की अर्जित संपत्ति में आधा हिस्सा मिलता है, लेकिन पैतृक संपत्ति में वह दावा नहीं कर सकती.

3. पति के साथ अनबन होने की स्थिति में
अगर पति-पत्नी के बीच किसी बात को लेकर अनबन हो जाये और पत्नी पति से अपने और अपने बच्चों के लिए गुजारा भत्ता चाहे, तो वह सीआरपीसी की धारा-125 के तहत गुजारा भत्ता की मांग कर सकती है. साथ ही हिंदू अडॉप्शन ऐंड मेंटेनेंस ऐक्ट की धारा-18 के तहत तथा घरेलू हिंसा कानून के तहत भी वह गुजारा भत्ता की मांग कर सकती है. अगर पति और पत्नी के बीच तलाक का केस चल रहा हो, तो पत्नी हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा-24 के तहत पति से गुजारा भत्ता मांग सकती है.
पति-पत्नी में तलाक हो जाने की स्थिति में तलाक के वक्त जो मुआवजा राशि तय होती है, वह भी पति की सैलरी और उसकी अर्जित संपत्ति के आधार पर ही तय होती है.

4. खुद की संपत्ति पर अधिकार
कोई भी महिला अपने हिस्से में आयी पैतृक संपत्ति और खुद अर्जित संपत्ति को अपनी मर्जी से चाहे तो वह बेच सकती है, किसी अन्य के नाम वसीयत कर सकती है, दान कर सकती है. इसमें कोई दखल नहीं दे सकता. महिला चाहे तो अपने बच्चो को उस संपत्ति से बेदखल भी कर सकती है.

5. घरेलू हिंसा से सुरक्षा
घरेलू हिंसा का मतलब महिलाओं के साथ की जानेवाली किसी भी तरह की शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना से है. शारीरिक प्रताड़ना का अर्थ जहां मारपीट जैसे कृत्यों से हैं, वही मानसिक प्रताड़ना से मतलब है ताना मारना, गाली-गलौज करना या फिर अन्य तरह से भावनात्मक ठेस पहुंचाना. इसके अलावा आर्थिक प्रताड़ना भी इस मामले में कवर होता है. यानी किसी महिला को खर्चा न देना, उसकी सैलरी आदि ले लेना या फिर उसकी नौकरी आदि से संबंधित दस्तावेज को कब्जे में ले लेना भी इस तरह के प्रताड़ना के दायरे में आता है. इन तमाम मामलों के खिलाफ हर महिला (पत्नी/बेटी/मां आदि) आवाज उठा सकती है और घरेलू हिंसा कानून के तहत अपनी शिकायत दर्ज करवा सकती है.महिलाओं को अपने पिता के घर या फिर अपने पति के घर सुरक्षित रखने के लिए डीवी ऐक्ट (डोमेस्टिक वॉयलेंस ऐक्ट) का प्रावधान किया गया है. महिला का कोई भी डोमेस्टिक रिलेटिव इस कानून के दायरे में आता है.

(क्या है डोमेस्टिक रिलेशन की परिभाषा
एक ही छत के नीचे किसी भी रिश्ते के साथ रहने वाली महिला प्रताड़ना की शिकायत कर सकती है. ऐसा हर रिलेशन डोमेस्टिक रिलेशन के दायरे में आयेगा. कोई विवाहित महिला डीवी ऐक्ट के तहत ससुराल पक्ष के किसी भी महिला या पुरुष की शिकायत कर सकती है, बशर्ते वह डोमेस्टिक रिलेशन के दायरे मे आता हो. अगर महिला विवाहित नहीं है और उसके साथ डोमेस्टिक रिलेशन में वॉयलेंस होती है, तो ऐसी स्थिति में वह इसके लिए केवल जिम्मेदार पुरुष को ही प्रतिवादी बना सकती है. अपनी मां, बहन या भाभी को वह इस ऐक्ट के तहत प्रतिवादी नहीं बना सकती.

डीवी एक्ट की धारा-12
इसके तहत महिला मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट की कोर्ट में शिकायत कर सकती है. शिकायत पर सुनवाई के दौरान अदालत प्रोटेक्शन ऑफिसर से रिपोर्ट मांगता है. महिला जहां रहती है या जहां उसके साथ घरेलू हिंसा हुई है या फिर जहां प्रतिवादी रहते हैं, वहां उनके खिलाफ शिकायत की जा सकती है. प्रोटेक्शन ऑफिसर अदालत के सामने पूरी घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन (इंसिडेंट रिपोर्ट) पेश करता है. अदालत उस रिपोर्ट के मद्देनजर प्रतिवादी को समन जारी करता है और प्रतिवादी का पक्ष सुनने के बाद वह आदेश पारित करता है. इस दौरान अदालत महिला को उसी घर में रहने देने, खर्चा देने या फिर उसे प्रोटेक्शन देने का आदेश दे सकती है। अगर अदालत महिला के फेवर में आदेश पारित करती है और प्रतिवादी उस आदेश का पालन नहीं करता है, तो डीवी ऐक्ट-31 के तहत प्रतिवादी पर केस बनता है. इस एक्ट के तहत चलाये गये मुकदमे में दोषी पाये जाने पर एक साल की कैद और 20 हजार रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है. उल्लेखनीय है कि इस एक्ट के तहत दायर मामले गैर-जमानती और कॉग्नेजिबल होते हैं.)

6. लिव-इन रिलेशन में भी डीवी ऐक्ट
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप का मतलब वैसे रिश्ते से है, जिसमें दो बालिग और शादी योग्य स्त्री और पुरुष बिना विवाह किये अपनी मर्जी से एक ही छत के नीचे पति-पत्नी की तरह रहते हों.
यदि दोनों में से कोई भी एक या फिर दोनों पहले से शादीशुदा हों, तो उसे लिव-इन रिलेशनशिप नहीं माना जायेगा. अगर महिला तथा पुरुष दोनों तलाक शुदा हों और अपनी इच्छा से साथ रह रहे हों, तो इसे लिव-इन रिलेशन माना जायेगा.
लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत संरक्षण प्राप्त है और साथ ही उन्हें उचित मुआवजा या गुजारा भत्ता पाने का भी अधिकार है. हालांकि पार्टनर की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति में अधिकार नहीं मिल सकता, लेकिन यदि लिव-इन में रहते हुए पार्टनर ने वसीयत के जरिये अपनी स्व-अर्जित संपत्ति लिव-इन पार्टनर के नाम लिख दी हो, तो मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पार्टनर को मिल जाती है. अगर उसे किसी भी तरह से प्रताड़ित किया जाता है, तो वह उसके खिलाफ इस एक्ट के तहत शिकायत कर सकती है. ऐसे संबंध में रहते हुए उसे राइट-टु-शेल्टर भी मिलता है. यानी कि जब तक यह रिलेशनशिप कायम है, तब तक उसे घर से जबर्दस्ती निकाला नहीं जा सकता, लेकिन संबंध खत्म होने के बाद यह अधिकार खत्म हो जाता है.

7. सेक्शुअल हैरेसमेंट के विरूद्ध प्रोटेक्शन
सेक्शुअल हैरेसमेंट, छेड़छाड़ या फिर रेप जैसे वारदातों के लिए सख्त कानून बनाए गये हैं. महिलाओं के खिलाफ इस तरह के घिनौने अपराध करने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान है. आइपीसी की धारा-375 के तहत महिला के साथ जबरन किये जानेवाले एनल या ओरल सेक्स दोनों को ही रेप माना गया है. प्राइवेट पार्ट के पेनिट्रेशन के अलावा किसी चीज के पेनिट्रेशन को भी इस दायरे में रखा गया है. अगर कोई शख्स किसी महिला के प्राइवेट पार्ट या फिर अन्य तरीके से पेनिट्रेशन करता है, तो उसे भी रेप माना जायेगा.
रेप में न्यूनतम सात साल और अधिकतम उम्रकैद की सजा का प्रावधान है. रेप के वैसे मामले में, जिसमें पीड़िता की मौत हो जाये या वह कोमा में चली जाये या फिर कोई शख्स दोबारा रेप के लिए दोषी पाया जाता है तो वैसे मामले में दोषी के लिए फांसी तक का प्रावधान है.

नये कानून के तहत छेड़छाड़ के मामलों को नये सिरे से परिभाषित करते हुए आइपीसी की धारा-354 को कई सब सेक्शंस में बांटा गया है.
– 354-ए : सेक्शुअल नेचर का कॉन्टैक्ट करना, सेक्शुअल फेवर मांगना आदि को छेड़छाड़ के दायरे में रखा गया है. इसमें दोषी पाये जाने पर अधिकतम 3 साल तक कैद की सजा का प्रावधान है. अगर कोई शख्स किसी महिला पर सेक्शुअल कॉमेंट करता है, तो एक साल तक कैद की सजा का प्रावधान है.
– 354-बी : अगर कोई शख्स महिला के साथ जबर्दस्ती करता है या फिर उसकी मर्जी के विरूद्ध उसके कपड़े उतारता है या उसे इसके लिए मजबूर करता है, तो उसे 3 साल से लेकर 7 साल तक की कैद भुगतनी पड़ सकती है.
– 354-सी : अगर कोई शख्स किसी महिला के प्राइवेट ऐक्ट की तस्वीर लेता है और उसे लोगों के बीच प्रसारित करता है, तो ऐसे मामले में एक साल से 3 साल तक की सजा का प्रावधान है. उसके द्वारा दोबारा ऐसी हरकत किये जाने पर उसे 3 साल से 7 साल तक कैद की सजा हो सकती है.
– 354-डी : अगर कोई शख्स किसी महिला का जबरन पीछा करता है या कॉन्टैक्ट करने की कोशिश करता है, तो ऐसे मामले में दोषी पाये जाने पर उक्त व्यक्ति को 3 साल तक कैद हो सकती है. जिन मामलों में संज्ञेय अपराध यानी 3 साल से ज्यादा की सजा का प्रावधान है, उन मामलों में शिकायती के बयान के आधार पर या फिर पुलिस खुद संज्ञान लेकर केस दर्ज कर सकती है.

8. कार्य स्थल पर सुरक्षा
वर्क प्लेस पर महिलाओं को सेक्शुअल हैरेसमेंट से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में विशाखा गाइडलाइंस जारी किया था.
सुप्रीम कोर्ट की ये गाइडलाइंस देश के तमाम सरकारी व निजी दफ्तरों में अनिवार्य रूप से लागू है. इसके तहत एंप्लॉयर की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह गुनहगार के खिलाफ कार्रवाई करे. इस गाइडलाइंस के अनुसार
– प्रत्येक दफ्तर में एक कंप्लेंट कमिटी होगी, जिसकी प्रमुख महिला होगी.
– कमिटी में आधी से ज्यादा संख्या महिलाओं की होगी.
– हर दफ्तर को साल भर में आई ऐसी शिकायतों और कार्रवाई के बारे में सरकार को रिपोर्ट करना होगा. – इस संबंध में अब तक कोई कानून नहीं है. इस वजह से ये गाइडलाइंस प्रभावी है.

सेक्शुअल हैरेसमेंट के दायरे में छेड़छाड़, गलत नीयत से टच करना, सेक्शुअल फेवर की डिमांड या आग्रह करना, महिला सहकर्मी को पॉर्न दिखाना, अन्य तरह से आपत्तिजनक व्यवहार करना या फिर इशारा करना शामिल है. इन मामलों के अलावा, कोई ऐसा एक्ट जिसे आइपीसी के तहत महिलाओं के विरूद्ध एक अपराध माना गया है, उसकी शिकायत भी यदि किसी महिला कर्मी द्वारा की जाती है, तो एंप्लॉयर की ड्यूटी है कि वह इस मामले में कार्रवाई करते हुए संबंधित अथॉरिटी को रिपोर्ट करे.

9. मेटरनिटी लीव
कामकाजी गर्भवती महिलाओं को संविधान के अनुच्छेद-42 के तहत कुछ विशेषाधिकार दिये गये हैं. वर्ष 1961 में पारित कानून के अनुसार अगर कोई महिला वैसी किसी सरकारी अथवा प्राइवेट नौकरी या फिर किसी फैक्ट्री में कार्यरत हो, जिसकी स्थापना इम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस ऐक्ट-1948 के तहत हुई हो, में काम करती है तो उसे मेटरनिटी बेनिफिट मिलेगा. इसके तहत महिला को 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव मिलती है, जिसे वह अपनी जरूरत के हिसाब से ले सकती है. इस दौरान महिला को वही सैलरी और भत्ता दिया जायेगा जो उसे आखिरी बार दिया गया था. अगर महिला का अबॉर्शन हो जाता है, तो भी उसे इस एक्ट का लाभ मिलेगा. इस कानून के तहत यह प्रावधान है कि अगर महिला प्रेग्नेंसी के कारण या फिर वक्त से पहले बच्चे का जन्म होता है या फिर गर्भपात हो जाता है और इन कारणों से अगर महिला बीमार होती है तो मेडिकल रिपोर्ट आधार पर उसे एक महीने का अतिरिक्त अवकाश मिलता है. इस दौरान भी उसे तमाम वेतन और भत्ते मिलते रहेंगे. इतना ही नहीं डिलिवरी के 15 महीने बाद तक महिला को दफ्तर में रहने के दौरान दो बार नर्सिंग ब्रेक मिलेगा. केन्द्र सरकार ने सुविधा दी है कि सरकारी महिला कर्मचारी, जो मां हैं या बनने वाली हैं तो उन्हें मेटरनिटी पीरियड में विशेष छूट मिलेगी। इसके तहत महिला कर्मचारियों को अब 135 दिन की जगह 180 दिन की मेटरनिटी लीव मिलेगी. इसके अलावा वह अपनी नौकरी के दौरान दो साल (730 दिन) की छुट्टी ले सकेंगी. यह छुट्टी बच्चे के 18 साल के होने तक वे कभी भी ले सकती. हैं. यानी कि बच्चे की बीमारी या पढ़ाई आदि में, जैसी जरूरत हो.
मेटरनिटी लीव के दौरान महिला पर किसी तरह का आरोप लगाकर उसे नौकरी से नहीं निकाला जा सकता. अगर महिला का एम्प्लॉयर इस बेनिफिट से उसे वंचित करने की कोशिश करता है, तो महिला इसके खिलाफ सीधे कोर्ट में शिकायत दर्ज कर जा सकती है और दोषी को एक साल तक कैद की सजा हो सकती है.

10. अबॉर्शन के संबंध में कानूनी कवच
अबॉर्शन के लिए महिला की सहमति हेाना अनिवार्य है. बिना उसकी सहमति के उसका अबॉर्शन नहीं कराया जा सकता. जबरन अबॉर्शन कराये जाने की स्थिति में में दोषी व्यक्ति को उम्रकैद तक की सजा हो सकती है.
हालांकि इसके कुछ अपवाद भी हैं-
जब गर्भ की वजह से महिला की जिंदगी खतरे में हो, तो उसका अबॉर्शनकराया जा सकता है. वर्ष 1971 में इस संबंध में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी ऐक्ट पारित किया गया. इसके तहत यह प्रावधान है कि अगर गर्भ के कारण महिला की जान खतरे में हो या फिर मानसिक और शारीरिक रूप से गंभीर परेशानी पैदा करने वाले हों या गर्भ में पल रहा बच्चा विकलांगता का शिकार हो, तो अबॉर्शन कराया जा सकता है. इसके अलावा, अगर महिला मानसिक या फिर शारीरिक तौर पर इसके लिए सक्षम न हो, तो भी उसका अबॉर्शन कराया जा सकता है. अगर कोई महिला बलात्कार के परिणामस्वरूप गर्भवती हो गयी हो या फिर महिला के साथ ऐसे रिश्तेदार ने संबंध बनाये हों, जो कि वर्जित संबंध की श्रेणी में आते हों और इस कारण महिला गर्भवती हो गयी हो, तो उसका अबॉर्शन कराया जा सकता है.

11. दहेज निरोधक कानून अगर किसी महिला को उसके ससुराल में दहेज के लिए मानसिक, शारीरिक या फिर अन्य तरह से प्रताड़ित किया जाता है, तो वह आइपीसी की धारा 498-ए के तहत केस दर्ज कर सकती है. इसे गैर जमानती संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा गया है. दहेज के लिए ससुराल में प्रताड़ित करने वाले तमाम लोगों को आरोपी बनाया जा सकता है. इस मामले में दोषी पाए जाने पर अधिकतम 3 साल तक कैद की सजा का प्रावधान है. अगर शादीशुदा महिला की शादी के 7 साल के दौरान संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो जाती है, तो पुलिस आइपीसी की धारा 304-बी के तहत केस दर्ज करती है.
वर्ष 1961 के दहेज निरोधक कानून रिफॉर्मेटिव कानून की धारा-8 के अनुसार दहेज देना और लेना दोनों को ही संज्ञेय अपराध माना गया है. दहेज देने के मामले में धारा-3 के तहत मामला दर्ज हो सकता है और इस धारा के तहत जुर्म साबित होने पर न्यूनतम 5 साल कैद की सजा का प्रावधान है. वहीं धारा-4 के अनुसार शादी से पहले अगर वर पक्ष द्वारा दहेज की मांग की जाती है, तब भी इस धारा के तहत केस दर्ज हो सकता है.

12. स्त्रीधन पर महिला का अधिकार
किसी महिला को शादी के वक्त उपहार स्वरूप जो कुछ भी मिलता है, वह सब स्त्री धन के दायरे में आता है. उस पर सिर्फ और सिर्फ उस महिला का हक होता है. वर-वधू को कॉमन यूज की तमाम चीजें भी स्त्रीधन के दायरे में आती हैं. अगर ससुराल पक्ष द्वारा महिला के स्त्रीधन को अपने पास रखा गया हो, तो महिला इसके खिलाफ आइपीसी की धारा-406 (अमानत में खयानत) की भी शिकायत कर सकती है. इसके तहत कोर्ट के आदेश से महिला को अपना स्त्रीधन वापस मिल सकता है.

13. मुफ्त कानूनी सहायता
अगर कोई महिला किसी केस में आरोपी है, तो उसे मुफ्त कानूनी सहायता प्राप्त करने का अधिकार है. उसे न्यायालय द्वारा सरकारी खर्चे पर वकील दिया जायेगा. हर महिला को यह अधिकार मिला हुआ है, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो. पुलिस महिला की गिरफ्तारी के बाद कानूनी सहायता कमिटी से संपर्क करेगी और महिला की गिरफ्तारी के बारे में उन्हें सूचित करेगी. लीगल ऐड कमिटी महिला को मुफ्त कानूनी सलाह देगी.

14. पुलिस हिरासत संबंधी विशेषाधिकार

किसी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले पुलिस हिरासत में नहीं ले सकती. किसी महिला की तलाशी केवल महिला पुलिसकर्मी ही ले सकती है. अगर महिला को कभी लॉकअप में रखने की नौबत आती है, तो उसके लिए अलग से व्यवस्था की जायेगी. बिना वॉरंट गिरफ्तार महिला को तुरंत उसकी गिरफ्तारी का कारण बताना और उसे उसके जमानत संबंधी अधिकार के बारे में अनिवार्य है. गिरफ्तार महिला के निकट संबंधी को सूचित करना पुलिस की ड्यूटी है. साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार जिस जज के सामने महिला को पहली बार पेश किया जा रहा हो, उस जज को चाहिए कि वह महिला से पूछे कि उसे पुलिस हिरासत में कोई बुरा बर्ताव तो नहीं झेलना पड़ा.

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