हेलो कहां जा रहे हम

Posted by Eklavya India Parivar
March 5, 2018

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अगर हम वर्तमान काल की मानव सभ्यता की बात करें तो हम कह सकते हैं कि यह बहुत ही विकसित और विचारशील है हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हमने सब कुछ पा लिया है लेकिन हम कोशिश कर रहे हैं आज हम हर फिल्ड मे एक संतुष्टि जनक उपलब्धि पा चुके हैं जहां हमने एक तरफ शुक्षम स्तर को समझने के लिए ऑणु विज्ञान तथा स्ट्रिंग थ्योरी का प्रतिपादन किया है वहीं दूसरी तरफ बड़े स्तर पर इस ब्रह्मांड तथा इस प्राकृत को समझने के लिए हमने बहुत सारी अंतरिक्ष यात्राएं की है और बड़े-बड़े आकाशगंगाओं तथा नए-नए तारों और धरती सापेक्ष ग्रह की खोज की है हमारे प्रयास और भी सफल हो सकता था अगर हम अपने आप को केवल मनुष्य मानकर धर्म, जाति, क्षेत्र और रंग भेद से ऊपर उठकर केवल विज्ञानवाद का समर्थन किया होता हालांकि हमारे भारत देश ने भी विज्ञान वाद और बहुत सारे विकास के क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है लेकिन हमारा यह योगदान श्रेष्ठतम योगदान नहीं है इसका कारण यह है कि हम भारतीय विभिन्न तरह के अंधविश्वास कुरीतियां धर्म जात में उलझे हुए थे हालांकि अब इन कुरीतियों कुप्रथाओं का असर कम हो गया है लेकिन हम यह नहीं कह सकते यह खत्म हो गया है क्योंकि आज भी मंदिर में चढ़ावे से पुत्र प्राप्ति धन संपत्ति खुशहाली आदि पाने का दावा किया जाता है आज भी भूकंप आने को देवी का कहर बताया जाता है आज भी गाय के नाम पर लोगों को मारा जाता है आज भी हिंदू मुस्लिम का नाम सुनकर हमारे रोए खड़े हो जाते हैं और हमारे जज्बात जाग जाते हैं आज भी अंतरजातीय विवाह लगभग न के बराबर है आज भी बिल्ली के रास्ता काट जाने पर हम रास्ता पार नहीं करते हैं आज भी हम अच्छा काम करने के लिए मंगलवार को खोजते हैं आज भी हम अपनी अलग पहचान बनाने के लिए टोपी और दाढ़ी का इस्तेमाल करते हैं आज भी हम अपनी अलग पहचान बनाने के लिए कलावा और भगवा का इस्तेमाल करते हैं आखिर यह मानसिक गुलामी क्यों, क्या हमें अपने आप पर विश्वास नहीं है मेरे यह सब बोलने का यहां यह मतलब नहीं है कि आप उस रचयिता को ना माने जो धर्म से परे है और जिसका धर्म से कोई मतलब नहीं है क्योंकि बुरे समय में उसकी याद सबको आती है खैर शायद इसके खत्म ना होने का एक कारण यह भी है कि हम अपने जज्बाती जिंदगी को त्याग कर तार्किक जीवन नहीं अपना रहे हैं हम बहस करते हैं कि गाय हमारी माता है हम बहस करते हैं कि औरतों को बुर्का पहनकर रहना चाहिए हम बहस करते हैं कि यह पत्थर हमारा भगवान है हम बहस करते हैं कि यह दलित है यह ठाकुर है या ब्राह्मण हैं क्या क्षत्रिय है या वैश्य और जब तर्क की बात की जाती है तो बोला जाता है कि यह हमारे धर्म ग्रंथों में लिखा है अब यह सोचने वाली बात है कि इन धर्म ग्रंथों को किसी मनुष्य ने लिखा होगा जो शायद उस समय के हिसाब से कोई दूसरा मतलब रखती होगी और उस समय के हिसाब से हो सकता है सही होगी लेकिन अब उन धर्म ग्रंथों के सिद्धांतों समाज में लागू करना बिल्कुल उचित नहीं है हमने इस समय के हिसाब से जो धर्म ग्रंथ लिखा है वह है हमारा संविधान जो हमारे लिए सर्वोपरि होना चाहिए

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