आपसी कलह में फंसे क्षेत्रीय दलों के लिए आसान नहीं है संयुक्त विपक्ष की राह

Posted by Nayan Kumar Jha in Hindi, Politics
March 9, 2018

त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में भाजपा की सरकार बनने से एक बार फिर विपक्ष की तंद्रा टूटी है। विपक्षी एकता की बातों को पूर्वोत्तर की हार ने ऑक्सीजन देने का काम किया है।

अब फिर कुछ दिनों तक तमाम बीजेपी विरोधी पार्टियों को एक साथ करने की कोशिशें होंगी। पर इन कोशिशों की तीव्रता वैसी ही होगी जैसे न्यू ईयर पर लिया गया कोई रेज़ोल्यूशन।

जिस तरह न्यू ईयर रेज़ोल्यूशन लेने वालों को जनवरी के तीसरे सप्ताह बीतते-बीतते बस इतना याद रह जाता है कि इस वर्ष खुद को बेहतर करने के लिए हमने कुछ प्रतिज्ञा ली थी, ऐसा ही कमज़ोर सा भरोसा दिखता है विपक्षी एकता की बात करने वाले इन नेताओं में।

2014 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद से कुल 21 राज्यों में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। 21 राज्यों में से भाजपा 14 राज्यों में सत्ता पाने में सफल रही है। कॉंग्रेस सिर्फ 2 प्रदेशों में शासन अपने नाम कर पाई है। साल 2014 में कॉंग्रेस की 13 राज्यों में सरकार थी। कॉंग्रेस इन 13 राज्यों में से कहीं भी फिर से शासन पाने में नाकाम रही है। वर्तमान में पार्टी की सिर्फ तीन राज्यों में सरकारे हैं, जिसमें पंजाब और कर्नाटक प्रमुख हैं। कर्नाटक भी संभवतः अगले महीने चुनावी समर में जाने वाला है। कॉंग्रेस दक्षिण के इस बड़े राज्य में हर हाल में गद्दी वापस पाना चाहेगी।

कॉंग्रेस समेत विपक्षी पार्टियों की लगातार भाजपा के हाथों पराजय ने एक बार फिर से देश में कॉंग्रेस के साथ मिलकर एक मजबूत विपक्ष बनाने की बातें तेज़ कर दी हैं। पर इस विपक्षी एकता की राह में बहुत दुश्वारियां हैं, इसे हमें बारीकी से समझना होगा।

यह सही है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद भाजपा और कॉंग्रेस की सीटों को अलग करने के बाद भी लगभग 217 सीटों पर क्षेत्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों ने चुनाव जीते हैं। ऐसे में एक संघर्षशील तीसरे मोर्चे की कल्पना करने में कोई मुश्किल नहीं है। पर क्षेत्रीय पार्टियों की आपसी प्रतिद्वंदिता इस कल्पना को पलीता लगा जाती हैं। मसलन तमिलनाडु में डीएमके और आईडीएमके का राज्य में आपसी सहमति से चुनाव लड़ना बहुत मुश्किल है। कम्युनिस्ट पार्टी बंगाल में कॉंग्रेस से गठबंधन करना चाहती है, पर केरल में दोनों एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं। बिहार में महागठबंधन एक असफल प्रयोग रहा। ये सारे तीसरे मोर्चे या कॉंग्रेस के नेतृत्व वाले मज़बूत विपक्ष के राह में ऐसे रोड़े हैं, जिसका हटना असंभव सा लगता है।

ऊपर लिखी बातों पर गौर करते हुए जब हम तेलुगु देशम पार्टी के एनडीए से अलग होने और यूपी के लोकसभा उपचुनाव में मायावती द्वारा समाजवादी पार्टी को सपोर्ट करने के फैसले के बाद दिमाग में तीसरे मोर्चे की बात सोचते हैं, तो ये बहुत अधिक खयाली सा लगता है।

विपक्षी खेमे को राष्ट्रीय स्तर पर एक होने के लिए प्रदेश स्तर पर राजनीतिक त्याग करने होंगे। अगर यह त्याग करने में विपक्षी रणबांकुरे सफल होते हैं, तो संयुक्त विपक्ष को अमलीजामा पहनाया जा सकता है, लेकिन यह डगर आसान नहीं है।

इसे एक उदाहरण से समझिये। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी सीताराम येचुरी ने जनवरी में पार्टी की केंद्रीय कमिटी की बैठक में कॉंग्रेस पार्टी से राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन का प्रस्ताव पेश किया था। पर इस प्रस्ताव के विरोध में पार्टी के ही पूर्व जनरल सेक्रेटरी प्रकाश करात आ गए। आखिर में प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।

अब जब एक पार्टी के ही अंदर प्रस्तावों पर सहमति नहीं है, फिर दर्जनों पार्टियों के बीच आपसी सामंजस्य की हम कितनी उम्मीद पाल सकते हैं? इसलिए ही मौजूदा समय में एक संयुक्त विपक्ष की बात करना, न्यू ईयर रेजोल्यूशन सा लगता है।

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