क्यों, कैसे और कब शुरू हुआ सीरिया का गृहयुद्ध और कौन है गुनहगार

Posted by saurabh kumar in GlobeScope, Hindi, Human Rights
March 19, 2018

संख्या, किसी भी स्थिति का अंदाज़ा लगाने के लिए सबसे सटीक और असंवेदनशील तरीका होता है। और यदि संख्या बेगुनाहों की मौत का हो तो सिहरन लाजिमी है। सीरिया में पिछले सात साल से गृहयुद्ध जारी है। बेगुनाह मारे जा रहे हैं, राहत शिविरों में भोजन के बदले सेक्स मांगा जा रहा है, हॉस्पिटल के ऊपर बमबारी हो रही है। न ही सीरिया के राष्ट्रपति अल असद गद्दी छोड़ने को तैयार हैं, न ही विरोधी गुट हार मानने को तैयार है।आखिर सीरिया इस खतरनाक मोड़ पर पहुंचा कैसे?

2011 में ट्यूनीशिया से शुरू हुआ अरब स्प्रिंग कमोबेश पूरे मिडिल ईस्ट को अपनी लपेट में ले चुका था। जिसकी आंच सीरिया भी पहुंची.बशर अल असद 2000 से सीरिया के राष्ट्रपति हैं. उससे पहले उनके पिता हाफिज अल असद 29 साल तक सीरिया के राष्ट्रपति रहे। बशर अल असद के शासनकाल में सीरिया की  स्थिति काफी खराब हो गई .गरीबी,बेरोजगारी, लोगों के पास कोई अधिकार नहीं था। 2007 से 2010 तक सीरिया में भयानक अकाल पड़ा,लोग भोजन के लिए तरसने लगे.रोजगार की तलाश में लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन करने लगे।

बशर अल असद के खिलाफ सड़क पर लोग

2011 में तत्कालीन परिस्थिति से आजिज आकर और अरब स्प्रिंग से प्रभावित होकर लोग सड़कों पर निकलने लगे। जनता लोकतंत्र के समर्थन में आवाज़ बुलंद करने लगी, बशर अल असद के विरोध में नारा लगाने लगी।

तानाशाह बशर अल असद को ये रास नहीं आया। वे सेना की सहायता से आंदोलन कुचलने लगे। विदेशी, एक्सट्रीमिस्ट मदद और सेना के विद्रोहियों के सहयोग से आंदोलानकारी ने भी हथियार का जुगाड़ कर लिया।

कुछ दिन बाद आंदोलनकारी भी हथियारों से लैस होकर हिंसा करने लगे। इस तरह सीरिया के गृहयुद्ध की शुरुवात हुई। जुलाई 2011 में सीरिया की आर्मी से अलग होकर कुछ जवान ने फ्री सीरियन आर्मी नाम का एक संगठन बनाया जिसका लक्ष्य अल असद को सत्ता से बेदखल करना था। ये एक मॉडरेट विचारधारा का ग्रुप था।

सीरिया में  काफी एक्सट्रीमिस्ट ग्रुप बनने लगा, जिसका लक्ष्य अल असद को बेदखल करना और इस्लामिक राष्ट्र बनाना था। जिसको मदद करने दुनिया भर से एक्सट्रेमिस्ट सीरिया आने लगे। 2012 में इनलोगों ने नुसरा फ्रंट बनाया जो कि अलकायदा का सीरिया ब्रांच था। ये भी इस्लामिक राष्ट्र स्थापित करना चाहता था। इसके अलावा भी काफी छोटे छोटे विद्रोही गुट सक्रिय था। इन गुटों ने सीरिया के शहरों पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया।

अल असद शिया हैं और वहां की बहुसंख्यक आबादी सुन्नी है। वहां की बहुसंख्यक सुन्नी आबादी की मांगों को दबा दिया जाता था। सऊदी अरब, कतर, तुर्की जैसे सुन्नी बहुल देश किसी भी तरीके से अल असद को बेदखल करना चाहते थे। इसके लिए वो एक्सट्रीमिस्ट को सपोर्ट करने लगे। चूंकि अल असद शिया हैं और ईरान एक शिया देश है, इसीलिए ईरान असद को हर किस्म की मदद करने लगा। हिज़्बुल्लाह, जो कि लेबनान में सक्रिय शिया चरमपंथी संगठन है और जिसका लक्ष्य इज़रायल का खात्मा है, असद की मदद करने लगा। इस तरह राजनीतिक मांगों को लेकर शुरू हुआ आंदोलन साम्प्रदायिक हो गया।

2013 में  अल असद ने  केमिकल अटैक कर दिया, जिसमें कम से कम 750 लोग मारे गए और हज़ारों घायल हो गए। हालांकि उन्होंने कभी इसे स्वीकार नहीं किया। इस अटैक के बाद पूरी दुनिया की निगाह सीरिया की ओर गई कि किस तरह वहां बेगुनाह मारे जा रहे हैं।

अल असद पर अंतरराष्ट्रीय दबाब बढ़ने लगा, लेकिन ईरान असद को सपोर्ट करता रहा। तब अमेरिका के राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा, सीरिया में सेना भेजना चाहते थे लेकिन अफगानिस्तान और इराक में हश्र देख चुके सीनेट ने  ऐसा करने से मना कर दिया। अब यहां रूस की एंट्री होती है। रूस अल असद को केमिकल हथियार अंतरराष्ट्रीय संस्था ओपीसीडब्ल्यू को देने के लिए तैयार करता है। यह संस्था दुनिया भर में रासायनिक हथियारों को खत्म करने के लिए काम करती है। ओपीसीडब्ल्यू को पहले किए गए काम और सीरिया  में रासायनिक हथियार को खत्म करने के लिए किए गए प्रयास की वजह से 2013 में शान्ति का नोबेल भी मिला।

इधर इराक और सीरिया के बॉर्डर इलाके में ISIS (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) काफी तेज़ी से फैल रहा था। 2014 में अबु बकर अल बगदादी ने मोसुल,जो कि इराक का एक शहर है,में खुद को खलीफा घोषित किया। इसका लक्ष्य इस्लामिक शरिया लागू करना था, यह भी असद का विरोधी है। यह सीरिया में कुर्द और फ्री सीरियन आर्मी पर  हमला करने लगा।

सीरिया का रक्का शहर जो कि अभी तक विरोधी गुट के कब्ज़े में था उसपर इसने कब्ज़ा जमा लिया। शुरू में यह सीरिया में नुसरा फ्रंट के साथ था लेकिन बाद में नुसरा फ्रंट ने इसपर अत्यधिक क्रूर होने का इल्ज़ाम लगाया और अलग हो गया। इसने भी सीरिया के शहरों पर कब्ज़ा करना शुरू किया। एक बार फिर यह इराक की ओर लौटा जहां इसने मोसुल जैसे शहर पर कब्ज़ा किया। हालांकि बाद में इन्होंने अपना नाम ISIS से IS कर लिया। तर्क दिया कि हमने इराक और सीरिया का फर्क मिटा दिया है और इस्लामिक स्टेट स्थापित कर दिया।

इराक युद्ध के बाद अमेरिकी सेना पूरी तरह इराक से नहीं गई है, अमेरिका यह सब देख रहा था। अमेरिका भी असद का  विरोधी है, अमेरिका ने कई बार यूनाइटेड नेशंस सेक्योरिटी कॉउन्सिल(यू.एन. एस. सी.) में असद के खिलाफ प्रस्ताव ला चुका है लेकिन रूस वीटो लगा देता था।इधर IS के उदय से भी अमेरिका चिंतित था क्योंकि इसका घोषित लक्ष्य अमेरिका को भी खत्म करना था।

इराक और अफगानिस्तान युद्ध के बाद अमेरिका थोड़ा संभला हुआ था, लेकिन  वह सीरिया को नज़रअंदाज़ भी नहीं कर सकता था। क्योंकि सीरिया के पास काफी तेल है और रूस उससे दोस्ती बढ़ा रहा था। मिडिल ईस्ट में प्रभाव बनाये रखने के लिए अमेरिका को सीरिया की ज़रूरत थी। अमेरिका इस बार अपनी सेना ज़मीन पर भेजने के बजाय विद्रोही गुट के मॉडरेट और कुर्दों को अपना समर्थन देने लगा।

कुर्द अपने लिए अलग देश की मांग करते हैं, इनकी भाषा, संस्कृति बाकियों से अलग है। इराक में सद्दाम हुसैन ने इनपर भयानक जुर्म किया था, और कुर्दों ने भी सद्दाम हुसैन को खत्म करने में अमेरिका की काफी मदद की थी। सीरिया गृहयुद्ध में अमेरिका, कुर्द को ट्रेनिंग देने लगा ताकि उसे अपनी सेना भी ना भेजनी पड़े और वर्चस्व भी बना रहे। इससे कुर्दों को भी लगता है कि यदि उसने अमेरिका की मदद की तो अमेरिका उन्हें अलग देश बनाने में मदद करेगा। 2015  में अमेरिका ने आईएस और अन्य जिहादी संगठन के खिलाफ एयर स्ट्राइक किया।लेकिन कहा जाता है कि वैसे जिहादी संगठन, जिससे अल असद को फायदा हो सकता था उनपर स्ट्राइक करने से अमेरिका ने परहेज़ किया।

अमेरिका कुर्द को हर तरीके से ट्रेनिंग देने लगा। कुर्द उतरी सीरिया में मुख्य तौर पर है। जब सीरिया की सेना दक्षिणी भाग में विद्रोहियों से लड़ रही थी तब कुर्द ने रोजवा में खुद को स्वायत घोषित कर दिया। इराक में कुर्दिस्तान कुर्दों के लिए एक स्वायत्त राज्य है। तुर्की में भी काफी संख्या में कुर्द रहते हैं। कुर्द खुद के लिए अलग कुर्दिस्तान देश की मांग करते हैं। वाईपीजी सीरिया और इराक के कुर्दों की मिलिशिया है वहीं पीकेके तुर्की और इराक के कुर्दों की मिलिशिया है। बगदादी की असर को कम करने में कुर्दों ने अमेरिका का काफी मदद किया।

तुर्की अमेरिका का काफी करीबी है। अमेरिका ने ही 1952 में उसे नाटो में शामिल कराया। तुर्की भी असद का विरोधी है, तुर्की में भी कुर्द अलग देश की मांग करते हैं। तुर्की सीरिया के कुर्द पर हमला करता है क्योंकि उसे लगता है यदि इराक या सीरिया में अलग कुर्दिस्तान बन गया तो तुर्की के कुर्द भी प्रेरित हो जाएंगे। तो इस तरह अमेरिका कुर्द और तुर्की के बीच फंसा हुआ है। अमेरिका तुर्की पर खामोश है, उसे डर है कि कहीं उसे नाटो सदस्य पर ही हथियार न उठाना पड़े। कुर्द पर IS भी हमला करता है, वो इन्हें सही मुसलमान नहीं मानता है।

असद की एक बड़ी ताकत रूस है। अल असद और व्लादिमीर पुतिन दोनों 2000 से राष्ट्रपति हैं। सोवियत संघ के विघटन से पहले सीरिया और रूस काफी करीब था, रूस का सीरिया में एक नौसैनिक अड्डा भी है। फिर कुछ समय के लिए दोनों के संबंधों में ठहराव आया। पुतिन सत्ता संभालने के बाद इसे सुधारना चाहते थे। पुतिन ने सेना का काफी विस्तार किया। वो फिर  से दुनिया के सामने रूस की अहमियत बताना चाहते थे। मिडिल ईस्ट के देशों के बीच पुतिन ने अच्छे संबंध बनाए। 2011 में गद्दाफी के हटने के बाद रूस थोड़ा परेशान हुआ, क्योंकि रूस और गद्दाफी के बीच हथियारों की डील हुई थी जो पूरी नहीं हो सकी।

अब फिर से मिडिल ईस्ट में प्रवेश करने के लिए रूस को एक ज़रिया चाहिए था। सीरिया यह मौका दे रहा था, इससे उसके विस्तारित सेना को भी परखने का मौका मिल रहा था। अमेरिका का भी विरोध हो जाएगा, और मिडिल ईस्ट में एंट्री भी हो जाएगी जिससे उसे हथियार वगैरह बेचने में सहूलियत होगी।

रूस और चीन शुरू में केवल डिप्लोमेटिक मदद ही किया करता था। चीन हालांकि आज भी डिप्लोमेसी में ही मदद करता है। जब रूस ने देखा कि किस तरह असद के खिलाफ अमेरिका ट्रेनिंग दे रहा है, वह असद के लिए छतरी बन गया। 2013 में केमिकल अटैक के वक्त उसने ही असद को केमिकल हथियार समर्पित करने के लिए राज़ी किया। उसके बाद रूस असद को हर तरीके से मदद करने लगा। 2015 में रूस की सेना जिहादी संगठन पर बम बरसाने लगी। हालांकि कहा जाता है कि उसने उसी संगठन को विशेष तौर पर निशाना बनाया जो असद का विरोधी है।

पिछले कुछ दिनों में ही सीरिया में 500 लोग मारे गए हैं। लोग इलाज नहीं करा पा रहे हैं, हॉस्पिटल, स्कूल रहने के लिए घर नहीं है। करीब 60 लाख लोगों को शहर बदलना पड़ा है। 50 लाख दूसरे देश में शरणार्थी हैं, करीब पांच लाख लोग मारे जा चुके हैं। यानी आधी से ज़्यादा आबादी गृहयुद्ध से बुरी तरह प्रभावित है। फिर भी कोई पक्ष मानने को तैयार नहीं है। कहा जा रहा है कि सीरिया पहले जैसा कभी नहीं हो पाएगा। उसकी सांस्कृतिक विरासत को चरमपंथ नष्ट कर रहा है। बच्चे के लिए स्कूल नहीं है, लोग भूखे रह रहे हैं। यूनाइटेड नेशंस मदद कर रहा है लेकिन उसकी अपनी सीमाएं है।

शांति स्थापित करने की कई बार कोशिश हुई। लेकिन इतने सारे ग्रुप को एक पेज पर नहीं लाया जा सका। सबके अपने-अपने हित हैं। उम्मीद है कभी अपने हित को दरकिनार रखते हुए ये सब बर्बाद होती जिंदगियों के बारे में भी सोचेंगे।


सौरभ Youth Ki Awaaz के फरवरी-मार्च 2018 बैच के ट्रेनी हैं।

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