एक जासूस पर हमले से पुतिन पर क्यों तिलमिला गया है अमेरिका और इंग्लैंड

Posted by Amritanshu Yadav in GlobeScope, Hindi, Politics
March 17, 2018

संयुक्त राज्य अमेरिका, नाटो तथा उनके सहयोगी राष्ट्र आजकल हरकत मे हैं। रूस के राष्ट्रपति पुतिन के हाव भाव लगातार आक्रामक हैं और सोवियत संघ तथा शीत युद्ध के दौर की यादें ताज़ा करा रहे हैं। 4 मार्च को, ब्रिटेन में रह रहे एक पूर्व रुसी-ब्रितानी खुफिया अधिकारी तथा उनकी बेटी पर सोवियत संघ के दौर के एक रासायनिक नर्व एजेंट ‘नोविचोक’ के इस्तेमाल से जानलेवा हमला किया गया है। इसके बाद से पश्चिम के देशों की सियासत गरमाई हुई है।

ब्रिटेन में हुए हमले के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने पहली बार रूस पर हमला बोला है तथा यूरोप के 3 सबसे मज़बूत देश ब्रिटेन, फ्रांस तथा जर्मनी ने अमेरिका के साथ मिलकर रूस के खिलाफ एक सामरिक मोर्चेबंदी करने का प्रयास किया है। आगामी 18 मार्च को रूस में होने वाले आम चुनाव में पुतिन की जीत लगभग तय मानी जा रही है और इसी के साथ आगामी छः वर्षों तक पुतिन के सत्ता में बने रहने का रास्ता साफ हो जायेगा।

व्लादिमीर पुतिन और रूस की ज्यादतियों पर चुप्पी साधे रहने के लिए लगातार आलोचनाओं का सामना करने वाले अमेरिका के बड़बोले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आखिरकार रूस के खिलाफ अपनी चुप्पी तोड़ दी है। व्हाइट हाउस द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में 2016 के अमेरिकी चुनाव तथा उसी वर्ष वैश्विक स्तर पर रूस द्वारा किये गये साइबर हमले के जवाब में तकरीबन डेढ़ वर्षों बाद 25 रुसी संस्थानों और व्यक्तियों पर अमेरिकी प्रतिबंध लगाया गया है। इसके अलावा अमेरिका ने ब्रिटेन, फ्रांस एवं जर्मनी के साथ मिलकर ब्रिटेन में रह रहे पूर्व रूसी जासूस के खिलाफ हुई रासायनिक हमले के संबंध में साझा बयान जारी कर इसको रूस द्वारा प्रायोजित बताकर इसकी निंदा की है।

पश्चिमी देशों के मध्य एक अधिनायकवादी शासक के रूप में शुमार हो चुके रूसी राष्ट्रपति पुतिन के ऊपर फ्रांस तथा ब्रिटेन के दक्षिणपंथी समूहों को सहयोग देकर नाटो को कमज़ोर करने के आरोप लगातार लगते रहे हैं। लेकिन पुतिन ने इस बार सीधे तौर पर नाटो के प्रमुख सहयोगी राष्ट्र एवं सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य ब्रिटेन की सीमा के भीतर रह रहे अपने एक ‘शत्रु’ पर हमला करके उसको चुनौती दी है।

ब्रिटेन के छोटे शहर सलिस्बरी  में रह रहे भूतपूर्व रुसी-ब्रितानी खुफिया अधिकारी पर रासायनिक हमले के बाद अब तक वहां की बेहद कमज़ोर समझी जाने वाली प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने इसके लिये सीधे तौर पर रूस को ज़िम्मेदार ठहराते हुए आक्रामक रुख अख्तियार किया है।उन्होंने रुसी षडयंत्र में शामिल होने के आरोप में लंदन में रह रहे 23 रुसी राजनायकों को बर्खास्त कर दिया है तथा एक हफ्ते के भीतर लंदन छोड़ने का आदेश दिया है। ब्रिटेन ने मामले की गंभीरता देखते हुए तत्काल ही संयुक्त राज्य सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाकर रूस पर कार्रवाई की मांग की है लेकिन रूस इस मामले को रूस में आयोजित आगामी फुटबाल विश्वकप को लेकर अपने खिलाफ एक दुष्प्रचार बता रहा है।

पश्चिम देशों के लिए हमले से भी ज़्यादा खतरनाक है इस आरोप के बाद रूस की प्रक्रिया। आरोपों से सरासर इंकार कर रहे पुतिन ने हालिया राष्ट्र के नाम पर अपने संबोधन में कहा था कि वो अपने दुश्मनों को दुनिया से खोज-खोज कर दण्डित करेंगे। रूस के पूर्व एजेंट पर रूस को धोखा देकर ब्रिटेन को खुफिया जानकारी बेचने का आरोप था। सुरक्षा परिषद की बैठक में अपने ऊपर लगे गंभीर आरोपों पर सफाई देने के बजाय रूसी प्रतिनिधि ने खुफिया अधिकारी पर हुए हमले में रुसी नर्व एजेंट के इस्तेमाल होने की बात को सिरे से खारिज कर दिया और ब्रिटेन का मज़ाक उड़ाते हुए उसकी तुलना प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक सर आर्थर कॉनन डॉयल की जासूसी श्रृंखला ‘शेरलॉक होम्स’ के अभागे इंस्पेक्टर ‘लेस्त्रदे’ से की है।

इसके अलावा ब्रिटेन तथा अन्य पश्चिम देशों द्वारा अपने ऊपर लगाये जा रहे आरोपों पर सफाई देने के बजाय रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने ब्रिटेन प्रधानमंत्री द्वारा संसद में दिए गये आक्रामक भाषण को एक ‘सर्कस शो’ करा दिया है। पुतिन अपने ऊपर लग रहे सभी आरोपों से बेफिक्र नज़र आ रहे हैं तथा रूस चुनाव में अपनी जीत को लेकर आश्वसत हैं। पश्चिम देशों की बेचैनी वहां की हालिया राजनीतिक परिघटनाओं से फैली निराशा के बीच पुतिन की चुनौतियों के कारण भी है.

पश्चिम देशों की निराशा

हालिया दौर में तमाम पश्चिमी देश अकल्पनीय और असंभावित राजनीतिक घटनाओं का गवाह बन रहे हैं। 2016 के अमेरिकी चुनाव तथा उसके बाद वैश्विक रूप से धुर दक्षिणपंथी सरकारों का उदय एक अकल्पनीय परिघटना है। यूरोप मुस्लिम तथा शरणार्थी विरोधी जनभावनाओं से तेज़ी से ग्रसित हुआ है। ब्रेग्ज़िट ने राजनीतिक विचारकों को निराश करने का काम किया है। ब्रेग्ज़िट के बाद ब्रिटिश सरकार से डेविड कैमरून के इस्तीफे के बाद से ब्रिटेन सरकार लगातार संकट में है और थेरेसा मे की सरकार में उनके ही मंत्रिमंडल के सदस्य उनके खिलाफ बगावत को तैयार रहते हैं। थेरेसा मे की सरकार को द्वित्तीय विश्वयुद्ध के बाद की सबसे कमज़ोर ब्रिटिश प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जाता है।

हालिया दौर में इटली के चुनाव ने भी यूरोपियन यूनियन विरोधी सरकार को ही सबसे ज़्यादा मत प्रदान किये हैं। यूरोपियन यूनियन के अभी और विखंडित होने की पर्याप्त संभावनाएं हैं। अमेरिका के शीर्ष अधिकारी ट्रम्प की योजनाओं के कारण अपना इस्तीफा दे रहे हैं। इस्पात और एल्युमीनियम के आयात पर डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा टैरिफ बढाने को लेकर चीन अमेरिका को ट्रेड वार की धमकी दे रहा है। एक और ट्रेड वार की बढ़ती संभावानाओं के बीच अमेरिका तथा पूरी दुनिया के व्यवसायी इससे बचने के रास्ते तलाश रहे हैं। धुर दक्षिणपंथी सरकारों के निर्णय अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं और इसी के बीच रूस के राष्ट्रपति बेखौफ नज़र आ रहे हैं।

बेखौफ पुतिन और पश्चिम के लिए नयी रूसी चुनौतियां

रूस लगातार पश्चिम देशों की संप्रभुता पर हमला कर रहा है। कई राजनीतिक वैज्ञानिक धुर दक्षिणपंथ की हालिया सफलताओं के पीछे पुतिन का हाथ मान रहे हैं। पुतिन के ऊपर फ्रांस, ब्रिटेन समेत कई यूरोपीय देशों की दक्षिणपंथी पार्टियों को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं। खतरनाक ढंग से उन्होंने 2016 के अमेरिकी चुनाव में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। 2016 में ही उनपर ब्रिटेन में पानी तथा बिजली आपूर्ति करने वाले परमाणु रिएक्टर पर हमला करके उन्हें बंद करने और नागरिक आपूर्ति को बाधित करने के आरोप लगे हैं। 2008 में जॉर्जिया में रूसी हमले के बाद से पुतिन लगातार मज़बूत होते गये हैं। 2009 से पुतिन ने अपनी सेना का नये सिरे से विस्तार करने शुरू किया है। अपनी आर्थिक विफलताओं और 2014 के आर्थिक संकट के बाद पुतिन रूस के पुरोत्थान को अपना हथियार बनाये हुए हैं।

अमेरिकी रुसी लेखिका एवं पत्रकार माशा गेस्सेन ने अपनी किताब ‘The future is history – how totalitarianism reclaimed russia’ (भविष्य अतीत है – कैसे अधिनायकवाद ने रूस को फिर से ग्रसित कर लिया) में पुतिन के कारनामों का पूरा ज़िक्र किया है और समसामयिक रूस को सोवियत संघ के तानाशाह साम्यवादी शासन के समान आंका है। व्लादिमीर पुतिन 1999 में कार्यवाहक राष्ट्रपति और 2000 में राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद से लगातार मज़बूत होते गए हैं। पुतिन ने कुछ वर्षों में प्रेस की स्वतंत्रता को धीरे-धीरे छीन लिया है। 2004 में पुतिन के पहले कार्यकाल के दौरान ही रूसी सरकार के खिलाफ मुखर होकर लिखने वाली पत्रकार अन्ना पोलितकोवस्काया की नृशंस हत्या हो गयी थी।

नाटो की मज़बूत शक्तियों की संप्रभुता पर हमला करने वाले पुतिन, सीरिया में आम नागरिको की हत्या, क्रिमिया पर अधिग्रहण की वैश्विक आलोचना के बाद भी बेखौफ तरीके से आगे बढ़ रहे हैं। पुतिन के ऊपर किसी भी प्रकार का कोई दबाव नहीं असर कर रहा है। क्रीमिया में रूसी अधिग्रहण के चलते G8 से 2014 को बर्खास्त किये जाने के बाद रूस ने अपनी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के बजाय जुलाई 2017 को G8 छोड़ने का निर्णय कर लिया है जो वैश्विक प्रतिबंधों से उसकी बेपरवाही का प्रतीक है।

पश्चिमी राष्ट्रों के लिए पुतिन 90 के दशक के पहले की पुरानी समस्या लेकर आ रहे हैं। पश्चिमी राष्ट्रों की आंतरिक संप्रभुता पर हमला करके पुतिन उनके खिलाफ एक अघोषित युद्ध छेड़ चुके हैं। ब्रिटेन के जासूस पर किया गया जानलेवा हमला रासायनिक युद्ध के भयावाह दौर की यादें ताज़ा करा रहा है। पुतिन के 2024 तक राष्ट्रपति बने रहने की पूरी संभावनाओं के बीच पुतिन हर रोज़ और अधिक ताकतवर होते जा रहे हैं तथा रूसी नागरिकों से रूस के पुराने गौरव के उत्थान को सच्चाई में तब्दील करते हुए शीत युद्ध वाले दौर की आहट का एहसास करा रहे हैं।

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