धर्म हमारे तर्क करने की शक्ति से इतना डरता क्यों है?

Posted by Shesh Nath Vernwal in Culture-Vulture, Hindi, Society
March 18, 2018

लोग लगातार कह रहे हैं कि हम उनके धर्म पर बात नहीं करें। इससे उनकी भावनाएं आहत होती हैं। किसी को क्या अधिकार है कि किसी व्यक्ति के धर्म पर छिटा-कसी करे? ऐसे लोगों से हमें कुछ कहना है। महोदय! हमें आपके धर्म से कोई आपत्ति नहीं होती, यदि वह आपका व्यक्तिगत मामला होता। हमें आपके धर्म से तब भी कोई आपत्ति नहीं होती, यदि आपके धर्म से दुनिया और समाज में कोई फर्क नहीं पड़ता, पर वास्तव में ऐसा नहीं है।

जब जाति पर बात करो तो पता चलता है कि इसकी उत्पति की जड़ में आपके पवित्र ग्रंथ हैं। महिलाओं की स्थिति पर बात करो, तो पता चलता है कि महिलाओं की दोयम स्थिति के लिए भी सभी धर्म ग्रंथों का योगदान है।

आडम्बर, अंधविश्वास, हवन, छुआछुत, धार्मिक भ्रष्टाचार, ठगी, लोगों को मानसिक रूप से पंगु बनाकर रखना, दंगे आदि सभी बातों की जड़ में आपके यही ग्रंथ हैं। मैं नहीं चाहता कि आपके धर्म की आलोचना करूं, बेवजह आपकी भावना को ठेस पहुंचाऊं, पर आपके धर्म और पवित्र किताबों ने कोई रास्ता नहीं छोड़ा।

इसमें आपकी भी कोई गलती नहीं है, बल्कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है और दिन-ब-दिन इसका रूप और भी विकृत होता जा रहा है। धार्मिक पहचान और धार्मिक चिन्हों के लिए लोग एक दूसरे को मार-काट रहे हैं। शिक्षित-अशिक्षित की बात नहीं है, पढ़े-लिखे, समझदार, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर, अधिकारी, मंत्री, जज आदि सब इसकी चपेट में हैं।

सरकार भी इससे कोई अछूता नहीं है। दरअसल सरकार में बैठे लोग जानबूझकर मार-काट को बढ़ावा दे रहे हैं। कई बार तो वही अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए दंगे की स्थिति भी पैदा कर रहे हैं। कभी गाय मुद्दा होता है, कभी तलाक, कभी भागवद गीता मुद्दा होता है, तो कभी मंदिर-मस्जिद-चर्च की ज़मीन पर कब्ज़ा, कभी बाबरी-मस्जिद, तो कभी राम जन्मभूमि।

..तो भले मानस, आपका धर्म जितना भोला दिखता है, उतना वह है नहीं। उसकी शांति की बातों में ज़हर समाया हुआ है क्योंकि जिस पवित्र किताब में वह शांति की बात करता है, उसी किताब में वह युद्ध की बात भी करता है।

इतिहास गवाह है धर्म नामक वायरस ने जितना लोगों की ज़िंदगी को खतरे में डाला है, उतना तो परमाणु बम भी नहीं। बम एक बार गिरा, फिर सन्नाटा। धर्म का शूल तो रोज़ चुभता है और उससे मानवता का खून रिसता रहता है।

 यदि आप दूसरे धर्म में पैदा हुए होते तो आप उस धर्म विशेष के लिए मरने-मारने की बात कर रहे होते और उसी धर्म की पवित्र किताबों को सीने से लगाये रखते।

वैसे आपका कोई दोष नहीं है, बल्कि आप भी इस दुष्चक्र में फंस गए हैं या समाज ने आपको इसमे फंसा दिया है। जो धर्म चुनने कि स्वतंत्रता आपको अपनी समझदारी और विवेक से नहीं देता, बल्कि जन्म के साथ ही ठप्पा लगा देता है।

आपकी बस एक ही गलती है, और वह यह कि आप इस दुष्चक्र को समझना नहीं चाहते, और न ही इससे निकलना चाहते हैं।आप इससे निकलेंगे, तो कई और भी निकलेंगे। इससे निकलने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है, इस दुष्चक्र की पड़ताल करना और कारण को जानना। इसकी पहली शर्त है अपने आंख से धर्म का चश्मा हटाना और दिमाग पर से पूर्वाग्रह और धर्म नामक ब्रांड के प्रति मोह को त्यागना।

आप इसलिए उस धर्म पर जान दे रहे हैं कि उस धर्म में आप पैदा हो गए और उसकी पवित्र बातों में इसलिए विश्वास करने लगे कि वह आपके ठप्पे से जुड़ा है। ऐसी स्थिति घातक है। ना केवल आपके लिए, बल्कि सम्पूर्ण समाज और मानवता के लिए।

पर जब आप अपना स्वतः ज्ञान, तर्क और विवेक अपनाएंगे, तो पाएंगे कि धार्मिक पहचान और चिन्ह तो कृत्रिम है। आप बेकार में इसे प्राकृतिक मान बैठे थे। जब आप ऐसा करेंगे, तब आपको ज्ञात होगा कि धर्म जिसे आप शांति और कल्याण का मार्ग समझ रहे हैं, दरअसल वही अशांति और मानव त्रासदी की प्रमुख जड़ों में से एक है।

तब आप ही बतायें, हम कैसे आपके धर्म को बख्श देंऔर पवित्र किताबों की आलोचना बंद कर दें? आपकी भावना का ख्याल हमें ज़रूर है, पर उससे ज़्यादा ख्याल हमें मानवता का है, पूरी दुनिया की है। और जो भी हमारे देश, समाज, दुनिया और मानवता के लिए खतरा है, उसपर बात करते एक आपकी कोमल भावनाएं आहत हो जाये, तो कृपया हमें माफ कर दीजियेगा, पर सोचियेगा ज़रूर हमारे बारे में भी। हमारी मजबूरी के बारे में, अपने धर्म से ऊपर उठकर। क्या पता आपकी भावनाएं, आहत होना बंद हो जाएंगी और धर्म-जनित बुराइयों के खात्मे के लिए हमें एक नया साथी मिल जायेगा।

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