वो कौन सी इज़्जत है जिसके चक्कर में मां-बाप बाल यौन हिंसा पर चुप हो जाते हैं

हमारी संस्कृति एवं धर्म के रुढ़िवादी विचारों के कारण बच्चों के मानवीय अधिकारों का उल्लंघन होता है। इसका पता तक समाज को नहीं चलता है। हमने जो धारणाये बना रखी है कि घर के सदस्यों के साथ बच्चे सुरक्षित हैं, परन्तु अधिकतर बाल यौन हिंसा परिचित व्यक्ति के द्वारा ही की जाती है। रुढ़िवादी समाज में बच्चों के बाल यौन हिंसा को स्वीकृति है, परन्तु अलग यौनिकता का होना स्वीकार नहीं है।

हमारे समाज में बाल यौन हिंसा होती है परन्तु इस पर बात नहीं की जाती है, क्योंकि यह इज्ज़त का सवाल है। कोई भी माता-पिता अपने बच्चे के यौन हिंसा के बारे में बात नहीं करना चाहते हैं, इसी कारण बच्चों को अवसर ही नहीं दिया जाता है कि वह बता सके अपने माता-पिता को कि वह किस पीड़ा से जूझ रहे हैं। यह सिलसिला बरसों तक चलता रहता है और खामोशी कायम रहती है। घर परिवार की इज्ज़त बनी रहती है। आखिर समाज में इज्ज़त को कायम रखने के लिए बच्चे को बलि चढ़ाना पड़ रहा है।

पिंकी वीरानी ने अपनी पुस्तक ‘बिटर चॉकलेट: चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज़ इन इंडिया’ में बाल यौन हिंसा की प्रवृत्ति एवं इसके कारण को बताया है। उनके अनुसार पृतिसत्ता की मानसिकता यह रही है कि पुरुष, बच्चे और स्त्री को सुरक्षा मुहय्या करने का भ्रम भी रचता है और यह मान कर चलता है कि उनका हक भी बनता है कि शोषण करे। इसी कारण घर के सदस्य ही बच्चों का यौन शोषण करते हैं। बच्चों का असहाय व मूक होना उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है।

बच्चों का यौन शोषण करने वाले लोग हर बार कोई मानसिक बीमारी का शिकार नहीं होते है, वह अपनी कामवासना की तृप्ति के लिए ऐसी अमानवीय वारदातों को अंजाम देते हैं। अल्फ्रेड किन्से ने सन 1948 में इस तथ्य को बताया है कि पुरुष के विनाशकारी कामुक प्रवृत्ति का उत्कर्ष, बाल यौन हिंसा करना है। पुरुष को बच्चों के साथ सेक्स करने से संतृप्ति मिलती है। इसलिए अपने बचाव के लिए अभियुक्त अपने ही घर के बच्चे को इसका शिकार बनाता है।

‘मैं हिजड़ा, मैं लक्ष्मी’ आत्मकथा की रचनाकार लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी जब बाल यौन हिंसा का शिकार बने उन्हें यह भी पता नहीं था कि असल में उनके साथ हो क्या रहा है। हमारे रुढ़िवादी समाज ने बच्चों को इससे बचाने के लिए कोई भी रास्ते खुले नहीं छोड़े हैं। बच्चे इसका विरोध तभी करते हैं जब उन्हें पता चलता है कि उनके साथ गलत हो रहा है। लक्ष्मी ने अपनी आत्मकथा में बड़े साहस से इस बात को रखा है। कई सालों तक उन्हें यौन हिंसा का शिकार बनना पड़ा। इस यातना की पीड़ा को वह स्पष्ट करते हुए लिखते हैं

“उसने जब मेरे अन्दर घुसेड़ा तो मुझे बहुत तकलीफ हुई और चक्कर आ गया …बहुत तकलीफ हो रही थी …शारीरिक, और मानसिक भी, फिर भी मैंने किसी को कुछ नहीं बताया, तब भी नहीं और उसके बाद भी नहीं। सब कुछ सहन करता रहा ,मन ही मन कुढ़ता और घुटता रहा।”

इस प्रकार बच्चे खामोशी में अपना जीवन नरक बना लेते हैं। किसको बताएं यह सब कुछ करने वाले घर के पुरुष सदस्य ही हैं। पिंकी वीरानी ने इन वारदातों का सामाजिक अध्ययन करके यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि बाल यौन हिंसा के मूल तीन कारण है।

1.पितृसत्ता (patriarchy)

2.सत्ता (power)

3.प्रवेशन (penetration)

अपनी घर की आबरू और इज्ज़त बचाने के लिए खामोस रहना रुढ़िवादी समाज में एक परंपरा है। बच्चे को बड़ों का आदर करना चाहिए। यह सामाजिक नैतिकता हमारी परम्परा का हिस्सा है, परन्तु बड़ों के गुणों का आदर करना और अपने बाल अधिकार का सम्मान करना बच्चों को सिखाया नहीं जाता है। जब नैतिकता एकांगी हो जाती है तब पुरुष को इन बच्चो पर झपटने का अवसर मिल जाता है। इज्ज़त का बोझ मात्र इन बच्चों पर लादा जाता है, समाज में माता-पिता आपने स्वार्थ हेतु बच्चों के बाल अधिकार का सम्मान नहीं करते हैं। इस प्रकार की स्वार्थपरक खामेशी का अंजाम बच्चों को जीवन भर झेलना पड़ता है। हमारी भौंडी नैतिकता के अनुसार बच्चों को आपनी यौन हिंसा की बात माता-पिता को ना बता पाना भी एक नैतिकता है। बाल यौन हिंसा की बढ़ती वारदातों के पीछे खामोशी और इज्ज़त दोनों मानसिकताए काम करती है।

लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के लिए अपनी पीड़ा को माता-पिता से बता ना पाने के पीछे विश्वास और डर दोनों तत्त्व काम करते हैं। एक माता-पिता विश्वास कर पाएंगे अपने बच्चे पर, दूसरा अभियुक्त से डर। यह बातें उसे खामोश कर देती हैं। पिंकी वीरानी के अनुसार खामोश रहने की सामाजिक व्यवस्था बाल यौन हिंसा को प्रश्रय देती है। इससे अभियुक्त का पलड़ा भारी हो जाता है। उन्हें ऐसी वारदातों को अंजाम देने के लिए प्रेरणा देता है।

हमारी राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक प्रवृत्तियां इस प्रकार के बाल यौन हिंसा को दरकिनार करती हैं। यह परिस्थितियां ऐसे माहौल को जन्म देती है जहा अभियुक्त बच्चों को अपना शिकार बनाता है।

लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को इस यौन हिंसा के खिलाफ लड़ने का साहस पहले पहल नहीं था। उन्होंने आत्महत्या करने की कोशिश की थी। बाद में उन्होंने ज़िंदगी से लड़ना सीखा यह सीख भी उन्हें आपनी आत्महत्या के प्रयास से मिली। बाल यौन हिंसा के रोकथाम के लिए लक्ष्मी ने साहस से काम लिया, जो भी उनके साथ ऐसा करना चाहता है उसका विरोध किया है।

समाज में बाल यौन हिंसा के प्रति लोगों को जागृत करने के लिए लक्ष्मी ने अपने इस अनुभव को साक्षात्कार द्वारा साझा किया है। किसी के भी मानवीय अधिकार के लिए कानून बनने से पहले साहित्य में इस समस्या को प्रस्तुत किया गया है। इस साहित्य के आधार पर ही कानून बनता है। लक्ष्मी की तरह कई साहसी व्यक्तियों ने अपनी इस दर्दनाक पीड़ा को व्यक्त करने का साहस दिखाया है। पिंकी वीरानी ने देश की कई लोगों की इस पीड़ा को अपनी पुस्तक ‘बिटर चॉकलेट’ चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज़ इन इंडिया में प्रस्तुत किया है।

If you are a survivor, parent or guardian who wants to seek help for child sexual abuse, or know someone who might, you can dial 1098 for CHILDLINE (a 24-hour national helpline) or email them at dial1098@childlineindia.org.in. You can also call NGO Arpan on their helpline 091-98190-86444, for counselling support.

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