माँ! क्या मुझसे ज़्यादा अहमियत इस समाज की है, जिसका वजूद ही झूठा है?

Posted by Sharda Dahiya in Hindi, Sexism And Patriarchy, Society
March 3, 2018

मेरी माँ को समाज की सबसे ज़्यादा चिंता रहती है। ‘कहीं कोई कुछ कह ना दे कि फलां की लड़की ने ये कर दिया या ऐसा कुछ कह दिया।’ हमारी माओं को ये क्यों लगता है कि समाज को खुश करके रखो और अपने बच्चों पर बंदिशें कसते रहो, जिससे हमारे अपने ही बच्चे दब्बू बन जाएं और समाज पहले से भी ज़्यादा ताकतवर?

माँ अक्सर बच्चे को अपने हिस्से की हर चीज़ दे देती है, खाने-पीने की चीज़ों से लेकर अपने जीवन तक का आधा हिस्सा वो बच्चे को सौंप देती है ताकि उसका बच्चा ताकतवर बने, मगर वही माँ समाज का डर दिखाकर बच्चे के दब्बू होने की नींव क्यों डालती है? कभी सुबह की वॉक पर अकेले जाने की आज्ञा नहीं देती क्योंकि कल को कुछ हो गया तो दुनिया क्या कहेगी, समाज क्या कहेगा?

माँ, मेरी प्यारी माँ, जब हम ज़िंदगी को अपने तरीके से जीने का अधिकार मांगते हैं तो आप देने में आनाकानी क्यूं करती हैं?

जींस मत पहनो, लड़कों को दोस्त मत बनाओ, प्रेम विवाह की सोचना भी मत और इंटरकास्ट तो संभव ही नहीं है। लेकिन क्यूं?

अरे माँ का ये समाज नाराज़ हो जाएगा ना और फिर वो दो-चार लोग क्या कहेंगे? समाज में उनकी इज्ज़त खराब हो जाएगी। समाज उनको ताने देगा कि ये वही है जिसकी बेटी ने प्रेम विवाह किया या ये वही है जिसकी बेटी ने इंटरकास्ट शादी की है। बिल्कुल माँ मैं आपकी बात समझ गई। मैं भी कल को मेरी बेटी या बेटा पैदा ही नहीं करूंगी, क्यों मैं उसे ऐसी दुनिया में लेकर आऊं जहां उनके खुलकर सांस लेने तक पर पाबंदी है!

इतनी ज़हरीली दुनिया में क्यों अपनी बेटी को खड़ा करूं, जहां हर कदम पर उसका रास्ता वो समाज रोककर खड़ा होगा, जिसका अपना कोई वजूद नहीं है। मेरी बेटी अपनी मर्जी का खा नहीं पाएगी, खुलकर हंस नहीं पाएगी, अपनी मर्जी से जी नहीं पाएगी तो क्यों लेकर आना उसे इस दुनिया में! आप नहीं बदल सकते, ना आपके समाज के नियम बदल सकते हैं तो चलो हम ही बदल जाते हैं, जनरेशन को ही रोक लेते हैं यहीं! आप और

आपका समाज जब अपने अंश के लिए ही नहीं बदल सकता, उसकी खुशी के लिए नहीं झुक सकता तो इस बदलाव की पहल तो हम लोग कर ही लेते हैं।

समाज की बदनामी के डर से हमने अपनी ज़िंदगी काट ली है या काट लेंगे लेकिन कम से कम आने वाली पीढ़ी को तो इस जहन्नुम से मुक्त करके चले जाएंगे।

माँ! याद है एक बार बुआ ने ये कहा था कि मैं जींस क्यों पहनती हूं और एक बार मामी ने ये बोल दिया था कि इतनी बड़ी होकर कैप्री पहनना अच्छा थोड़े ही लगता है। आप मामी को तब सुनाकर आई थी और बुआ को भी आपने जवाब दिया था कि मेरे बच्चे जिसमे खुश हैं, वही पहनने के लिए आज़ाद हैं। मामा के घर कितने दिन नहीं गई थी आप। तो अब, जब आपके बच्चों की खुशी के आगे ये फालतू के रस्मों रिवाजों वाला समाज आ रहा है तो आप क्यूं इस समाज को नहीं सुनाती या क्यूं आप इस समाज से टकराने को तैयार नहीं हैं?

क्यों आज मुझे लड़की होने के कारण डर लगा रहता है कि घर से बाहर पैर रख दिया तो माँ क्या कहेगी, भाई क्या कहेंगे या सास को क्यों नहीं कुछ कह पाई? क्यों पति के अत्याचार का विरोध नहीं पाई? क्या अब आप भी यही सब चाहती हैं? वो भी समाज के उन चार लोगों की खातिर जिनका असल वजूद ही क्षितिज जैसा होता है।

माँ आप हमारी खुशी के लिए सारी दुनिया से टकरा जाती हैं ना, तो हमेशा ये उम्मीद क्यूं रखती हैं कि आपका समाज ‘साफ-सुथरा’ रहे और आपके ही अंश घुटते रहें?

क्यों आप कह देती हैं दीदी को कि कोई नहीं दुनिया की रीत ही यही है, कर ले एडजस्ट। क्यों आप हमेशा इस बात का इंतजार करती हैं कि दीदी पर हाथ उठे और तब ही आप प्रतिकार करें?

इंटरकास्ट शादी पर आप दुनिया को, इस समाज को साफ रखने की सलाह अपने बच्चे को देते हुए कहती हैं कि अपनी ही कास्ट में कर ले नहीं तो दुनिया कल मुझे ही कहेगी। कल को अपनी कास्ट वाले के साथ खुश नहीं रही, तब आप किसको कहेंगी? मैं यहां केवल अपनी माँ के लिए ही नहीं लिख रही हूं बल्कि मेरा यह लेख हर उस माँ के लिए है, जिसके लिए समाज उसके अपने बच्चों से भी बढ़कर हो जाता है। माँ, अब भी वक्त है, अहमियत इंसान को दो, चीज़ों को नहीं।

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