‘कुत्तों को दूर रखती है नील की बोतल’ भाई ये तो अंधविश्वास की भी हद है

Posted by Sandeep Suman in Hindi, Society
March 4, 2018

जब इसरो 104 सैटेलाइट एक साथ अंतरिक्ष मे स्थापित कर रहा था, उसी वक्त मेरे पड़ोस के घरों के बाहर एक नई खोज ‘नीली द्रव वाला बोतल’ स्थापित हो रहा था। इक्का-दुक्का घरों के बाहर दिखने वाला ये टोटका धीरे-धीरे कई कस्बों और गांवों तक जा पहुंचा। मेरे जैसे लोग इन्हें कौतूहल से देखते लेकिन इनके बारे में किसी से पूछने की हिम्मत नहीं होती, क्योंकि घर से मनाही थी। हो सकता हो वो कोई टोटका वगैरह हो और मेरा सवाल करना उन्हें अच्छा ना लगे।

एक दिन गांव (जमालपुर, ज़िला- मुंगेर, बिहार) जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो वहां भी कुछ ऐसा ही नजारा था। जब मैं छोटा था तो ऐसा नजारा तब देखने को मिला था जब दिल्ली में ‘काले बंदर’ के आतंक से अफवाहों का बाजार गर्म था और लोग दरवाजे पर गोबर से कुछ आकृतियां बनाकर काले बंदर को दूर रखने की कोशिशों में लगे थे।

अब कितने दिनों तक यह जिज्ञासा अंदर दबाए रखता, आखिरकार मेरा सब्र जबाब दे गया और मैंने अपने पड़ोसी से सवाल पूछ ही लिया।

उन्होंने बड़े आश्चर्य से मुझे देखते हुए कहा, “तुमका नहीं मालूम? अरे ई बहुत कामे के चीज़ है, जबसे ई घर के बाहर लगाए है तब से कोई कुकुर नहीं फटकता है इहां और ना पोटी करता है।” यानि वो जो नीली बोतल थी वो कोई आम बोतल नही थी, वो कुकूर यानी कुत्ते को दूर रखने वाला यंत्र था जो कुत्ते को ना केवल घर से दूर रखता था बल्कि घर के बाहर मल-मूत्र त्याग करने से भी रोकता था।

विज्ञान में पढ़ा था कि कुत्ते रंगों की पहचान नहीं कर सकते, किन्तु पता नही ये नीला रंग कैसे पहचान जाते हैं। मेरे पड़ोसी का यह भी दावा था कि जबसे उन्होंने ये लगाया है, किसी कुत्ते ने उनके घर के बाहर मल त्याग नहीं किया है, इस हिसाब से तो यह गजब की खोज थी। काश कि इंसानों पर भी ये यंत्र कार्य नहीं करता, वरना सरकार लोगों में शौचालय बनाने को बढ़ावा देने के लिए खेतों और रेल की पटरियों में इन्हें स्थापित कर देती और इस खोज के लिए नोबल पुरस्कार भी पा जाती

बहुत पता करने पर भी पता नहीं चल पाया कि इस यंत्र की खोज कब और कहां हुई, लेकिन लोगों की माने तो इसकी शुरुआत बंगाल से हुई जो धीरे-धीरे बिहार और उड़ीसा के गांव-कस्बों तक जा पहुंची। इस टोटके ने तो बाजार में ‘उजाला’ जैसी कंपनियों की बिक्री बढ़ा दी, अब सफेदी में कम घर के बाहर टंगे बोतलों पर ज्यादा नील नज़र आता था।

लोगों के बीच कौतुहल और अफवाह का बाज़ार अलग गर्म और पशु प्रेमियों की चिंता तो अलग थी ही। दो दिन बाद ही सुबह-सुबह पड़ोसी के कुत्ते को गाली देने की आवाज़ आई।

मैं समझ गया कि कुकूर ने उनकी इस खोज को धता बताते हुए नोबल प्राइज़ की उम्मीद खत्म कर दी है और अब धीरे-धीरे ‘नीले द्रव वाले बोतल यंत्र’ का पतन प्रारंभ हो गया है। फिर भी कुछ लोग इस उम्मीद के साथ उस यंत्र के साथ कायम हैं कि ये काम करेगा और एक दिन वो इस खोज को सफल बनाएंगे।

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