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केवल उपलब्धियों की खुशफहमी में कैद नहीं किया जा सकता है ‘महिला दिवस’

आठ मार्च इतिहास की जड़ में तलाशी गई एक उपज है, अन्य ऐतिहासिक दिवसों से अलग ‘महिला दिवस’ की परंपरा उपलब्धियों के जश्न मनाने का दिन कम, उपलब्धियों के लिए जोश जगाने, कार्य योजना बनाने और समानता के लिए संकल्प लेने का अधिक है। महिला दिवस की प्रासंगिकता इसलिए चुनौती भरी है, क्योंकि पूर्वाग्रहों की जड़ और पुरुष सत्तावादी मानसिकता के सामने महिलाएं आज भी आत्मसम्मान के लिए संघर्षरत हैं।

आधी आबादी के जीवन संघर्ष के महत्वपूर्ण चरणों का ब्यौरा, पुरुषों के समांतर पहले की तरह आज भी कम ही देखने को मिलता है। महिलाओं को देवी कहकर पूजने वाले देश भारत में महिलाओं का जीवन सामान्य कभी नहीं रहा, गरिमा और सम्मान के तमाम दावों के साथ सांस्कृतिक स्तर पर महिलाओं का शोषण जारी रहा। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि हर वर्ग की बहुत सारी महिलाओं ने अपने संघर्ष से राष्ट्र के निर्माण और विकास में अपनी भूमिका का निर्वाह किया, जो आधुनिक भारत में जारी भी है।

हर दौर में सभ्यता-संस्कृति को सहेजने का काम कई गुमनाम महिलाओं ने सहजता से किया है। फिर भी दिनोंदिन हो रहे बदलावों के बीच महिलाओं को जब कभी भी याद किया गया तो उनको भावुकता के दायरे में निपटा दिया गया।

बीसवीं सदी को महिलाओं के हक में अत्यंत महत्वपूर्ण सदी के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें पुरुष-वर्चस्व के औचित्य पर प्रश्न लगाने का काम शुरू हुआ। जनतंत्रीय विचारधार के विकास के साथ जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे विचारक सामने आए। पहली बार मिल ने व्यक्ति स्वतंत्रता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए महिलाओं के लिए व्यक्ति का दर्जा प्राप्त होने की वकालत की।

मिल की अवधारणा के बाद विचारकों का एक ऐसा वर्ग तैयार हुआ, जिसने महिलाओं के हक में सच को सच कहने का साहस दिखाया। धीरे-धीरे महिलाओं के स्थिति का आरोपित कवच उतरने लगा। सिमोन द बोउवार ने ‘द सेकेण्ड सेक्स’ के माध्यम से पुरुष के ऐतिहासिक षड्यंत्र की पोल खोल दी।

कई महिलाओं के बेबाक लेखन ने पीढ़ियों की वर्चस्व साजिश का कच्चा चिट्ठा समाज की हथेली पर रख दिया। इन महिला लेखिकाओं ने अपने समग्र चिंतन से एक विस्तृत निष्कर्ष दिया।

मानव इतिहास में जर, जोरु और ज़मीन तमाम झगड़ों की जड़ है। विडम्बना यह है कि वस्तुओं की इस समान्य सूची में भी महिलाओं की स्थिति हमेशा ‘कुजात’ की रही। बाकि दो चीज़ें (जर यानि धन या सोना और ज़मीन) अधिपत्य के क्रम में स्वामित्व-परिवर्तन के कारण अपवित्र नहीं होती, जबकि औरत की नज़र ‘परपुरुष’ पर ही जाते ही या परपुरुष के स्पर्श मात्र से वह अपवित्र होती रही है।

बदलाव की तमाम कोशिशों में भी अवरोधों के अनेक दायरे हैं। मसलन आधी आबादी, आदर्श महिला की घातक परछाई से पहले की तरह आज भी मुक्त नहीं है। बाज़ार उसकी छवि का दोहन कर ले तो सही, पर अगर इस छवि की खुदमुख्तारी वह स्वयं करे तो चरित्र को तार-तार करने वाले शब्दों के साथ कई तुगलकी फरमान तैयार रहते हैं।

ज़हनी तौर पर बदलाव सिर्फ रहन-सहन, बोल-चाल और आर्थिक स्थिति में कुछ हद तक आया है, सामाजिक मानसिकता अभी भी पुरातनपंथी मनोवृत्ति से जकड़ी हुई है।

इसलिए ही, कहीं महिलाएं हिजाब से मुक्ति के लिए आवाज़ बुलंद कर रही हैं तो कहीं मूलभूत अधिकारों के लिए। समानता और स्वतंत्रता के लिए आधी आबादी का संघर्ष निरंतर जारी है।

आज आधी आबादी की मौजूदगी बाज़ार के उतार-चढ़ाव को तय कर रही है, फिर चाहे टीआरपी हो या किसी भी प्रोडक्ट को लोकप्रिय बनाने में महिलाओं की भूमिका। बेस्ट शॉपर्स से लेकर फूड बाज़ार तक को गतिशील बनाए रखने में महिलाओं की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। पिछले कुछ दशकों में शहरी ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में भी आधी आबादी की भागीदारी ने अलहदा मिसाल पेश की है। जाहिर है रसोई से बोर्डरूम तक के सफर में महिलाओं ने ऐतिहासिक आंकड़ों को उलट कर शीर्षासन करा दिया है।

इतिहास गवाह है कि औद्योगिक क्रांति के समय ही नहीं, पहले और दूसरे विश्व युद्ध के समय भी महिलाओं की भागीदारी ने कामगार वर्ग की कमी को न सिर्फ पूरा किया बल्कि महिलाएं अपने अधिकारों और हकूक के लिए जागृत भी हुई।

सस्ते और लचीले कामगार की ज़रूरतों को महिलाओं ने हर आर्थिक बदलाव में, अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों के साथ पूरा किया है।

जीडीपी के विकास का सपना पालने वाला कोई भी मुल्क, महिलाओं की दोहरी उत्पादन क्षमता को नजरअंदाज नहीं कर सकता है। कमोबेश हर देश में महिलाओं के हितों के लिए सख्त कानून भी बने हैं, जिसने महिलाओं की सामाजिक स्थिति को सहज भी किया है। लेकिन समाजिक मानसिकता अभी भी लोकतांत्रिक मूल्यों के सामने उकड़ू होकर बैठी हुई है।

आज महिलाओं को अपनी ज़िंदगी का सच अपने उत्थान-पतन के भीतरी सच से जोड़कर देखना भी होगा और समाज को दिखाना होगा, तभी गुलाबी खुशफहमियों के रिबन में बंधे महिला दिवस की ब्रैंडिंग से आधी आबादी की अंतरात्माएं मुक्त हो सकेंगी। कामयाबी की राह पर बढ़ने के लिए आधी आबादी को मिसाल बनना है या पीड़ित, यह पूरी तरह से उस पर निर्भर है।

प्रशांत प्रत्युष Youth Ki Awaaz के फरवरी-मार्च 2018 बैच के इंटर्न हैं।

फोटो अभार: flickr

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